लोग है कि मानते नहीं। कहो वह समझते नहीं और हम है कि कहने से बाज नहीं आते। बात केवल इतनी है कि हिंदी में कुछ लेखक जब लय में लिखते हैं कोई न कोई शब्द ऐसा लिख जाता है जो उर्दू का होने के बावजूद हिंदी में सामान्य वार्तालाप के दौरान स्वाभाविक रूप से प्रयोग में होता है। उर्दू के कई शब्दों में नुक्ता लगता है पर हिंदी के लेखकों को चूंकि उर्दू भाषा की जानकारी होती नहीं- और हिंदी में वह लगता भी नहीं-इसलिये वह इस तरफ ध्यान नहीं देते। कुछ लोग इस पर नौकभौं सिकोड़ लेते हैं और छींटाकशी करते हैं।
हिंदी के अनेक मूर्धन्य लेखकों को कहना है कि चूंकि उर्दू के जो शब्द नुक्ते वाले हैं हिंदी में बोलचाल में उसका प्रयोग करते समय स्वर में उसका आभास नहीं होता इसलिये नहीं लगाया तो चलेगा पर कुछ लोग इसी आड़ में अनेक लेखकों का मजाक बनाते हैं। इससे कुछ लेखक तो सह जाते हैं पर कुछ विद्वान लेखक उखड़ कर कहते हैं कि हम तो हिंदी में लिख रहे हैं और वह ऐसी भाषा है जैसी लिखी जाती है वैसी ही बोली जाती है-हम इसका उल्टा भी कह सकते हैं कि जैसी बोली जाती है वैसी लिखी जाती है। एक बात तय रही कि उर्दू के नुक्ते वाले शब्द जब हिंदी में बोले जाते हैं तो वह स्वर में होते नहीं इसलिये उन पर कुछ लेखक नुक्ता नहीं लगाते।
वैसे यह समस्या पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन के समय नहीं थी। उनमें छपी रचनाओं में नुक्ता लगता है कि नहीं कोई नहींे देखता और देखेगा भी कौन भला वहां उसकी सुनने वाला है। अंतर्जाल पर यह समस्या थोड़ी अलग है। यहां ब्लाग लेखकों और पाठकों को टोकने का पूरा अवसर उपलब्ध है। इसलिये कई लोग लेखकों को ध्यान इस तरफ आकृष्ट करते हैं। एक अच्छा खासा पाठ जिसमें विषय वस्तु विचारणीय हो लोग उसे छोड़ केवल नुक्ता ही देखते रह जाते हैं। कई लोग ऐसी सलाहें देते हैं कि ‘भई, आप अमुक प्रकाशन से हिंदी उर्दू शब्द कोष मंगवा लो।’
इस विषय पर अनेक बार विवाद हो चुका है पर मामला जस का तस है। अब कोई कविता लिखने बैठेगा वह अपने भाव देखेगा कि शब्दकोष? अगर शब्दकोष देखने बैठेगा तो उसके भाव तो कहीं का कहीं चले जायेंगे फिर लिखेगा क्या? कुछ विद्वान ऐसी छींटाकशियों को लेखक का मनोबल तोड़ने वाला मानते हैं। हिंदी के लेखकों को तो केवल यह देखना चाहिये कि उनके क्षेत्र मेे बोलचाल की भाषा कैसी हैं। जिन क्षेत्रों में उर्दू का प्रचलन अधिक है वहां के हिंदी के लोग तो सहजता के साथ नुक्ते के ध्यान कर लेते हैं पर अन्य क्षेत्र के लेखकों को इसका अभ्यास नहीं होता। ऐसे क्षेत्रों के लेखकों को अगर पता भी है तो वह लिखते वक्त उनके अभ्यास का भाग नहीं बन पाता। ऐेसे लेखक अगर नुक्ता लगाने बैठे तो वह उर्दू के हर शब्द पर नुक्ता लगाने लगेंगे चाहे भले ही नहीं लगता हो।
इस ब्लाग/पत्रिका के लेखक को अक्सर ऐसी छींटाकशी का सामना करना पड़ता है। एक एक टिप्पणी पर जवाब देना कठिन है फिर यह बात भी है कि जब लिखना ही है तो ऐसी बातों की क्या परवाह नहीं करना। इस लेखक के एक पाठ पर तो जोरदार बहस भी इस विषय पर हुई थी। उस बहस में कुछ मूर्धन्य ब्लाग लेखकों ने बिल्कुल ही नुक्ते का विरोध करते हुए उर्दू की लिपि को ही चुनौती दे डाली। भाषा का धर्म से कोई संबंध नहीं है यह बात इसी बहस में इस लेखक को अनुभव हुई।
हालांकि यह भी सही है कि कुछ लोग उर्दू के अक्षर भी गलत लिख जाते हैं पर वह उनकी भाषा के कारण है या टूल के कारण पता ही नहीं लगता। कृतिदेव का यूनिकोड फोंट तो नुक्ता लगाने से इंकार ही कर देता है ऐसे में उर्दू शब्द के लिये नुक्ते लगाने के लिये अलग से टूल पर जाना अव्यवसायिक ब्लागर के लिये बेकार का प्रयास है-खासतौर से जब वह उसके बारे में निश्चित न हो।
जिन लोगों को उर्दू से हमदर्दी हो उनको यह समझ लेना चाहिये कि हिंदी का दायरा व्यापक है और कई क्षेत्रों में उर्दू शब्द हैं पर हिंदी के कारण है कि न कि उसके साहित्य के कारण। ऐसे में यह छींटाकशी कर वह अपनी विद्वता का प्रदर्शन न करें तो बेहतर है क्योंकि उनकी विद्वता को चुनौती देने वाले ऐसे ब्लाग लेखक भी कम नहीं हैं जो दोनों भाषाओं की गहराई की समझ रखते हैं। ऐसे ही ब्लाग लेखक नुक्ता न लगने पर उसके विरोध को प्रभावपूर्ण ढंग से अस्वीकार कर चुके हैं। किसी भाषा का लेखक होने का अर्थ यह नहीं है कि वह उसके व्याकरण का भी पूर्ण ज्ञानी है। किसी पाठ का मूलतत्व उसकी विषय सामग्री होती है न कि भाषा सौंदर्य। अगर विषय वस्तु के साथ भाषा सौंदर्य भी हो तो सोने में सुहागा वाली बात है पर न भी हो तो उसका भाव कम नहीं होता।
जहां तक त्रृटियों का प्रश्न है तो यह एक महत्वपूर्ण बात है कि जब रोमन लिपि से लिखा जाता है तो अनेक शब्दों को तो वैकल्पिक शब्दों से चुनना पड़ता है और अगर कृतिदेव में लिख कर यूनिकोड में बदला जाता है तो वह कई शब्दों में गलती करता है। उसकी तरफ ध्यान नहीं जाने पर वह ऐसे के ऐसे ही चले जाते है-भले ही उसे सही टाईप क्यों नहीं किया गया हो।
ऐसे में लेखकों और पाठकों को काफी सहनशील होना पड़ेगा। एक तो लेखक को अपनी गलतियां बताने पर अपना मानसिक संतुलन बनाये रखना होगा। उर्दू शब्द पर नुक्ता लगाने के मामले में यह स्पष्ट हो चुका है कि वह स्वर में नहीं आता इसलिये न लगायें पर कोई कहता है तो गुस्सा भी न हों। उसी तरह पाठकों को भी थोड़ा धीरज रखना होगा। उन्हें यह समझ लेना चाहिये कि हिंदी के अधिकतर ब्लाग लेखक इंटरनेट को पैसा जेब से वैसे ही देते हैं जैसे कि पाठक। उर्दू प्रेमी हिंदी पाठकों को यह समझना चाहिये कि हिंदी अब किसी एक देश या प्रदेश की भाषा नहीं जो कि उर्दू का व्याकरण लेकर साथ चले। फिर कुछ विद्वान तो यह भी कहते हैं कि जिन हिंदी शब्दों का उर्दू में उपयोग होता है वह यहां की बोली का हिस्सा है जिस पर उर्दू वालों ने नुक्ता लगाकर अपना दिखाने का प्रयास किया। इस विषय पर इतनी बहस होती है जो शायद कभी समाप्त नहीं होने वाली।
सच क्या है? यह तो भाषाई विद्वान जाने क्योंकि कविता,कहानी और आलेख लिखने के लिये भाषा की केवल इतनी आवश्यकता होती है कि जिससे दूसरा पढ़कर उसे समझ सके। अंतर्जाल पर ऐसे भी ब्लाग देखने को मिलेंगेू जो दक्षिण भारतीय हिंदी लेखकों ने लिखे। उनकी भाषा वैसी है जैसी बोलते हैं पर इतनी प्यारी होती है कि पढ़ने पर मजा आता है। उनकी पूरी बात समझ में आती है पर तब यह विचार कतई मन में नहीं आता कि उन्होंने भाषा के व्याकरण का ध्यान क्यों नहीं रखा? हिंदी प्रेमियों के लिये इतना ही बहुत है कि गैर हिंदी भाषी क्षेत्र के लेखक ने बड़े प्यार से हिंदी में अपनी बात रखी। उर्दू प्रेमी हिंदी पाठकों को उनकी तरह ही सहज होना चाहिये।
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यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की सिंधु केसरी-पत्रिका ’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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बहुत बढ़िया पोस्ट लिखी है।
Comment by paramjitbali — 11/12/2008 @ 3:16 am
दीपक जी इसी तर्क के आधार पर संस्कृत के शब्दों की वर्तनी के बारे में आपके क्या विचार हैं? जैसे, वहाँ को कई इलाकों में हुआँ कहते हैं, व्यापार को ब्योपार। तो इनको भी इसी प्रकार लिखने के बारे में आपका क्या मत है?
Comment by आलोक कुमार — 11/12/2008 @ 3:44 am
आपके विचारों से सहमत हूँ।
नुक्ते , देवनागरी के उपर अनावश्यक बोझ हैं; इनसे मुक्ति पाना चाहिये। जब हम पूर्व को पूरब कह/लिख सकते हैं तो नुक्ता कौन बड़ी चीज है?
Comment by Anunad Singh — 14/12/2008 @ 6:21 pm
xClNx5 Thanks for good post
Comment by johnny — 31/12/2008 @ 3:50 am