*** दीपक भारतदीप की हिंदी सरिता-पत्रिका*** mastram Deepak Bharatdeep ki hindi patrika***

24/01/2009

चमचा कभी फरिश्ता नहीं बनता-व्यंग्य कविता

चांदी के बर्तन में खीर खाने के लिये
सोने का चम्मच हाथ में जब मिल जाता है
तब चमचा बनने में क्या हर्ज है
बरसों से इस देश में
पतलों और दोनों में खाने से उकताये लोगों को
इसलिये चमचागिरी में मजा आता है।
झूठन से बची रोटी,चावल और
कई दिनों की बासी सब्जी को
चमकती तश्तरियों में सजा कर पेश दो
मूंह को कौनसी आंख है जो देख पायेगा
पेट में पचा कि नहीं
भला कौन देख पाता है।
वाह री जीभ तेरा खेल
चमचागिरी के शब्द बोलकर कमाई खाने में
तुझे कितना स्वाद आता है।
अपनी कमाई से अधिक मुफ्तखोरी में
तुझे बहुत मजा आता है।
पर याद रखना कितना भी ताजा क्यों न हो खाना
पेट में जाते ही कचड़ा हो जाता है।
हाथों से खेल ले कोई भी बड़ा इंसान
पर चमचा कभी फरिश्ता नहीं बन पाता है।

………………………..

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की सिंधु केसरी-पत्रिका ’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

No Comments Yet »

No comments yet.

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

Leave a comment

Blog at WordPress.com.