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15/03/2009

बेरंग हो गया मन, कैसे खेलते होली-व्यंग्य कविता


पृथ्वी के भ्रुण में पानी की जगह हो गयी पोली ।
पिचकारी में रंग नहीं भरता, कैसे मनायें प्रियतम होली।।

आंखों के जो लोग नूर थे,बन गये अब किरकिरी
बेरंग हो गया मन और नजरें, किसके साथ खेलें होली।।

सामान के सागर बन गये हैं घर, आखें हटती नहीं उससे
नजरों के आगे सोच नहीं जाती जिनकी, कैसे खेलेंगे होली।।

देवर भाभी और जीजा साली की मजाक लगती है पुरानी
एक दिन पर्दा हटता था, पर शर्म भी कहां रही अब भोली ।।

अपने पराये का भेद मिटाकर होली खेलने का मौका कहां रहा
रिश्तों में होने लगे हैं जख्म गहरे, बंद हो जाती बोली।।

रसायनों से मिलकर बन गये सभी रंग कीचड़ जैसे
सुनसान सड़कों पर घूमने से अब डराती है होली।।

दिल का अंधेरा कहीं चेहरे पर नहीं दिख जाये
रंग कहीं बयां न करें असलियत, इसलिये नहीं मनाई होली ।।

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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