आज बैठे ठाले अपने ब्लाग की पैज रैंक देखने का विचार आया तो पता लगा कि एक अन्य ब्लाग/पत्रिका ई7पत्रिका भी चार का अंक प्राप्त कर लोकप्रियता की तरफ अपने कदम बढ़ाने लगा है। वैसे इस लेखक को यह पता नहीं था कि पैज रैंक होता क्या है? कुछ ब्लाग लेखकों ने ही अपने पाठों में लिखा है कि गूगल पैज रैंक चार होना एक अच्छा संकेत माना जाता है। इस तरह इस लेखक के चार ब्लाग/पत्रिकायें लोकप्रियता के गूगल पैज रैंक में चार का अंक प्राप्त कर रही है।
1.हिंदी पत्रिका
2.शब्दलेख सारथी
3.शब्दलेख पत्रिका
4.ई-पत्रिका
दरअसल ब्लाग एक अब एक लोकप्रिय विद्या होती जा रही है। समस्या यह है कि यहां लिखना पैन से कागज पर लिखने जैसा आसान नहीं है कि कहीं पेन मिल गया और कागज उठाया और लिखना शुरु कर दिया। इस लेखक के अनेक मित्र ब्लाग लिखना चाहते हैं। एक दो तो लिख भी रहे हैं। उन लोगों ने इंटरनेट कनेक्शन केवल मनोरंजन के लिये लगवाये या बच्चों ने जिद की। जब वह समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर ब्लाग की चर्चा सुनते हैं और साथ ही अपने इस मित्र और साथी के मुख से भी अपने लिखने की जानकारी पाते हैं तो उनके मन में भी आता है कि वह भी लिखें। उन्होंने ब्लाग भी बनाये हैं पर उनको उसे संचालित करने के तरीके अधिक नहीं मालुम। वह अक्सर इस लेखक से कहते हैं कि ‘भई, किसी दिन घर पर आओ और थोड़ी मदद करो।’ ऐसे कम से आठ दस लोग हैं उनसे वादा तो यह लेखक कर लेता है पर अपने कामकाज के बाद मिलने वाली फुरसत के क्षण अपने इन ब्लाग/पत्रिकाओं के संचालन पर ही व्यय हो जाते हैं और वादे केवल वादे ही रह जाते हैं। ऐसे में मित्रों के ब्लाग बनवाने या उसे संचालित करने के अधिक अच्छे तरीक बताने का समय निकालना भी कठिन लगता है। एक मित्र ने दो दिन पहले ब्लाग बनाया था। कल उसे टिप्पणी भी दी। वह कोई लेखक नहीं है पर उसके मन में लिखने की बहुत इच्छा है। उसने कहा भी कि ‘मैं तुम जैसा लेखक नहीं हूं पर अब लिखने का प्रयास करूंगा। मुझे अधिक तरीके बताने घर आना।’
ऐसा लगता है कि इस देश में हिंदी ब्लाग लेखन का व्यवसायिक स्तर पर कोई अभियान छेड़ा जाना चाहिए जिसका व्यय टेलीफोन कंपनियों को करना चाहिये। उनको अपने कुछ कर्मचारी ब्लाग लेखन सिखाने के लिये प्रत्यक्ष सेवा प्रारंभ करने में लगाना चाहिये जिसके कालांतर में उनको अप्रत्यक्ष आर्थिक लाभ भी होंगे। सच बात तो यह है कि ब्लाग लेखन ही वह जरिया बन सकता है जिससे अंतर्जाल कनेक्शन सतत रह पायेंगे वरना तो यह भी कुछ समय बाद टीवी चैनलों की तरह उबाऊ हो जायेंगे। आदमी में लिखना पढ़ना ही दो ऐसी प्रकियायें हैं जो स्वाभाविक रूप से बनी रहती हैं। अगर वह हिंदी ब्लाग के जरिये नहीं बनी रह सकीं तो हो सकता है कि आगे कनेक्शन कटना शुरू हो जायेंगे। कभी कभी इस लेखक के मन में आता है कि यहां कोई सम्मेलन आयोजित किया जाये पर एक उसके लिये पैसा खर्च करना पड़ेगा दूसरा यह कि अकेले चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।
फिलहाल तो यह लेखक जिज्ञासावश अपने पाठ लिखता जा रहा है। ब्लाग/पत्रिकाओं पर निरंतर पाठकों की आमद बढ़ती जा रही है पर घनात्मक है और गुणात्मक वृद्धि के आसार अभी नहीं लगती क्योंकि इन हिंदी ब्लाग का प्रचार अभी इतना नहीं है। इस प्रचार पर व्यय करने से अभी किसी को व्यवसायिक लाभ नहीं है इसलिये इसकी गति धीमी ही रहने वाली है। ऐसे में इस लेखक के चार ब्लाग अगर गूगल पैज रैंक में चार अंक प्राप्त कर लें तो अच्छी बात है। इस अवसर समस्त पाठकों, ब्लाग लेखकों और मित्रों को बधाई।
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