विज्ञापन तय करते हैं कहानी-आलेख


आखिर यह कोई सुनियोजित एजेंडा है या अनजाने में बन गयी सोच कि भारतीय संस्कृति, संस्कारों और धर्मों पर टीवी धारावाहिकों और फिल्मों में ऐसी कहानियां दिखाईं जातीं है जिससे उसका नकारात्मक पक्ष अधिक प्रकट होता है। फिल्मों और धारावाहिकों में अनेक बार लंबे समय तक रोतीं हुई नारी पात्र देखकर अनेक लोगों को इससे इतनी सहानुभूति पैदा होती है कि वह अपने समाज में ही दोष देखने लगते हैं. क्या यह दोष विश्व के अन्य समाजों और उनके भारतीय सदस्यों में नहीं है।

यह ख्याल सभी हिन्दी चैनलों की एकरूपता देखकर लगा जो अधिक से अधिक ऐसे धारावाहिक बना रहे हैं जिनमें ग्रामीण परिवेश वाले अमीरों की मूर्खतापूर्ण तथा अंधविश्वासों में लिप्त हरकतें शामिल होती हैं। कुछ समय पहले शहरी परिवेश वाले अमीरों पर बनी कहानियों पर धारावाहिक बनते थे जिसमें नारियां महंगी साड़ी पहनकर भारतीय धर्म का निर्वाह करते हुए केवल घर का खाना बनाती और बाकी काम नौकरों के हवाले होता था। अब ग्रामीण परिवेश के अमीरों पर भी ऐसी कहानियां बन रही हैं। आखिर यह कौनसा ऐजेंडा है जिसमें भारतीय समाजों को ही बदनाम किया जा रहा है जिनमें नारियां इतनी बेबस दिखाई जाती हैं।
दो आदमियों में उस दिन चर्चा हो रही थी कि क्या औरत इतनी लाचार है जितनी दिखाई जा रही है।
दूसरा शायद विकासवादी धारा का था वह बोला-‘तुम तो शहरी हो तुम्हें क्या पता नारियों पर कितना अत्याचार होता है, खासतौर गरीब महिलाओं पर।’
दूसरे ने कहा-‘पर यहां तो इन धारावाहिकों की चर्चा हो रही है जिसमें इस तरह की अमीर परिवार की औरते दिख रही हैं जिसमें उनको इतना बेबस दिखाया जा रहा है।’
अगर इन धारावाहिकों में औरत का व्यवहार देखा जाये तो ऐसा लगता है कि जैसे वह केवल आदमी की बताई राह पर ही चलती हैं पर क्या वाकई सच है?
इसमें संदेह नहीं है कि हमारे देश में नारियों की दशा बहुत अच्छी नहीं है और उनका संघर्ष अन्य देशों की नारियों से कहीं अधिक होता है पर वह इतनी बेबस नहीं है जितनी इन धारावाहिकों में दिखाई जा रही है।
इससे भी आगे एक सवाल यह है कि इस मामलें में एक चैनल रेटिंग में सबसे आगे हैं और उसकी बराबरी कोई चैनल बरसोंु से नहीं कर पा रहा। अन्य चैनल उस चैनल की बराबरी तो करना चाहते हैं पर ढर्रा उनका वैसा ही है-वह भी उसी तरह के रोने धोने और कथित रूप से सामाजिक धारावाहिक बना रहे हैं। वह आखिर उनससे हटकर कोई अन्य धारावाहिक क्यों नहीं बनाते। ऐजेंडा इसलिये लगता है क्योंकि जब समाचार चैनल खोलो तो एक ही हीरो के जन्म दिन का प्रसारण सभी चैनलों पर एकसाथ होता है। उस समय आप चाहकर भी दूसरा नहीं देख सकते। यही हाल इन सामाजिक धारावाहिकों के प्रसारण का भी है। आप कोई चैनल खोलकर देखें आपको वही सामाजिक मसाला इन धारावाहिकों में सजा दिखेगा जिससे आप इधर उधर भागते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि दिखने को सभी का स्वामित्व अलग हैं पर उनका स्वामी कहीं एक ही है जो उनको यह निर्देश देता है उनसे विज्ञापन वाले प्रबंधक इस बात का ध्यान रखें कि उपभोक्ता या दर्शकों के बीच में स्पर्धा कतई नहीं होना चाहिये। वह हमारी काबू में रहे। यह स्वामी तो विज्ञापन ही हो सकता है। लेदेकर कुछ ही कंपनियां तो हैं जो विज्ञापन देती हैं और उनके प्रबंधक नहीं चाहते होंगे कि कहीं उनका विज्ञापन कम दिखे तो कहीं ज्यादा। उपभोक्ता या दर्शक उनको ही देखता रहे। यह विज्ञापन असली रूप में स्वामी है। अब इसके अलावा अन्य कोई अदृश्य स्वामी हो तो पता नहीं पर इतना तय है कि कोई एक समाचार या घटना पर सभी चैनल जिस तरह टूट पड़ते हैं तब ऐसा ही लगता है जब कोई खबर इतनी महत्वपूर्ण न हो तब तो शक हो ही जाता है। ऐसे में तो यही लगता है कि विज्ञापन स्वामी की जय!
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लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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