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प्रचारक महाराज का तंत्र-हिन्दी हास्य व्यंग्य


          प्रचारक महाराज ने अपने सचिव से कहा-‘यह बताओ, इस बार अपने प्रचार तंत्र से आय कम होने का कारण क्या है? इधर हमारे विज्ञापन दाता तो उधर हमारे आका दोनों ही हमसे नाराज चल रहे हैं। उनका कहना है कि इधर हमारे प्रचार युद्ध में मजा नहीं आ रहा है। अपने प्रचारतंत्र का स्तर बनाये रखने के लिये प्रयास करना जरूरी है। तुम अपने अधीनस्थ सभी लोगों को जाकर सचेत करो।’

सचिव ने कहा-‘सर, हम क्या करें? हमारे तंत्र की पूरी कोशिश है कि आम आदमी हमारी पकड़ से बाहर नहीं जाये। अखबार, टीवी चैनल और रेडियो पर नित नित नये मनोरंजन कार्यक्रम कभी प्रेम तो कभी द्वंद्व से सजाकर लगातार प्रस्तुत करते हैं। लेाग अपना सारा समय हमारे प्रचार तंत्र में गुजारते हैं या फिर हमारे उद्घोषकों की सुझायी गयी जगहों में गुजारते हैं। होटल, मॉल और बारों के अपने पास खूब विज्ञापन भी मिलते है। कम से कम एक बात तय है कि आज की युवा या बुढ़ाई गयी पीढ़ी हमारी पकड़ से बाहर नहीं है।’’

प्रचारक महाराज नाराज हो गये और बोले-‘पूरा समाज हमारी पकड़ में है यह तो पता है। उसकी मुक्ति का मार्ग कोई नहीं है यह भी हम जानते हैं पर मुश्किल यह है कि हमारे दाता और आका अगर प्रसन्न नहीं है तो वह हमारे लिये बहुत बुरा है। उनको भी तो एक आम आदमी के रूप में मनोंरजन, सनसनी और कामेडी का मसाला चाहिए। यह सबसे बड़ी बात है। हम समाज सेवकों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और बाहुबलियों का गुणगान करते हैं उससे तो वह खुश हो जाते हैं पर वह मनोरंजन के नये ढंग भी देखना चाहते हैं। उनके लिये प्रकाशनों और प्रसारणों में प्रेम और द्वंद्व के नये नये कार्यक्रम इस तरह सजाओं कि खास आदमी भी हमारे जाल में वैसे ही फंसा रहे जैसे कि आम आदमी।

सचिव बोला-‘अब हम कर भी क्या सकते हैं। क्रिकेट, फिल्म, हास्य और रुदन वाले टीवी धारावाहिकों में रोज नवीनता लाते हैं। कभी क्रिक्रेटर को भी रैम्प पर नचवाते हैं तो आदमियों को नारी वेश में सजाकर कॉमेडी भी करवाते हैं। नारीपात्रों से सैक्सी चुटकुले भी सुनाते हैं। कभी यस बॉस जैसे घरेलू कार्यक्रमों में बदनाम लोग भी सजाते हैं तो कभी नकली अदालतें भी चलवाते हैं।’’

प्रचारक महाराज बोले-‘यह सब बकवास है। दरअसल ऐसे मुद्दे लाओ जिससे समाज में सामूहिक सनसनी फैले। लोग बहस में तर्क कम दें चीखके और चिल्लायें ज्यादा! ऐसा लगे कि जैसे झंगड़ा हो रहा है। लोगों को दूसरों का झगड़ा देखना पसंद है।

सचिव बोला-‘वह तो आतंकवाद के मुद्दे पर हमेशा ही करते हैं। कभी किसी रेलदुर्घटना या जहरीली शराब पीने की घटना के समाचार सनसनी फैलाते हैं तो हम उन पर संवदेनशील बहस भी चलवाते हैं। लोग ऐसे लाते हैं कि जो तर्क कम दें बल्कि चीखें और चिल्लायें ज्यादा, साथ ही नारों को समाज सुधार का मंत्र बताने लगें।’’

प्रचारक महाराज बोले-‘नहीं, तुम समझे नहीं! नये नये प्रकार के झगड़े ले आओ। स्त्री पुरुष अमीर गरीब, पूंजपति मजदूर और शोषक और शोषित वर्ग की जंग में मजा नहीं आता। यह सब पुराना पड़ गया है।

सचिव बोला-‘‘अब झगड़े तो इसी प्रकार के ही हो सकते हैं। यह तो संभव नहीं है कि किसान और क्लर्क के बीच में युद्ध कराया जाये।

प्रचारक महाराज एक उछल गये और बोले-‘वाह, क्या आईडिया दिया है। कितना आकर्षण है इन शब्दों मे, जिसे तुम किसान क्लर्क युद्ध कह रहे हों। हां, करवाओं यह युंद्ध। अपने दाता और आका दोनों ही खुश होंगे क्योंकि इसमें दोनों का कुछ नहीं बिगड़ेगा। हमारे दाता और आका दोनेां ही खुश होंगे। जनता की खुश होगी। नया विषय और नया शीर्षक होगा ‘किसान क्लर्क युद्ध’!’

सचिव ने पूछा-‘मगर क्लर्क कोई हैसियत नहीं रखते। फाइलों पर फैसला तो बड़े लेाग ही लेते हैं। यही बड़े तो हमारी फाइलों से भी दो चार होते हैं। फाईल और धरती के बीच टेबल भी होती है इसलिये क्लर्क और किसान युद्ध नहीं हो सकता।

प्रचारक महाराज एकदम उत्तेजित स्वर में बोले-‘अब तुम खामोश हो जाओ। यहां से जाकर अपने सलाहकार फिक्सर साहब को भेजो। वही अंग्रेज मेरी बात समझेगा। अरे, तुम कुछ विचार नहीं कर सकते। देखो शहरों में अनेक ज्रगह किसानों की जमीन लेकर कॉलोनियां बसाई गयी हैं। इन कालोनियों में बड़े लोग भी रहते पर उनमें क्लर्क यानि मध्यम वर्ग अधिक रहता है। जाओ किसानों में असंतोष फैलाओ फिर क्लर्क भी आंदोलन करेेंगे। दोनो के विवाद पर बहस होगी। इस तरह नयी सनसनी बनेगी। नये मुद्दे पर बहस होगी। अपने विज्ञापन खूब चलेंगे। इससे दाता भी खुश होंगे और आका भी मजे में रहेंगे।

सचिव बोला-‘मगर इस पर पैसा खर्च होगा।’

प्रचारक महाराज बोले-‘मूर्ख कहीं के, पैसे खर्च होंगे तो होने दो। आयेंगे भी तो हमारे पास ही न। अरे, हमसे जमीन और पैसा लेकर कौन कहां जा सकता है! घूम फिरकर आना अपने पास ही है। जितना उनके पास जायेगा उतना खर्च तो आना ही है। कमाने पर भी पैसा खर्च होता है। अगर, हम ऐसा न करें तो सनसनी और मनोरंजन की वैसी सामग्री कहां से आयेगी जो विज्ञापनों के बीच में डाली जा सके। अब तुम जाओ और फिक्सर को बुलाओ।’’

सचिव चला गया और उधर से फिक्सर साहब आ रहा था।

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वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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धनी लोग गरीब और मजदूर की रक्षा न कर अपने लिए खतरे को दावत न दें-मजदूर दिवस पर विशेष हिंदी लेख


         1 मई को मजदूर दिवस पूरे विश्व में बनाया जाता है। भारत में कार्ल मार्क्स के अनुयायी इससे सार्वजनिक समारोह में उल्लास के साथ मनाते है।  आमतौर से वामपंथी और जनवादी विचारधारा से जुड़े बुद्धिमान लोग आज देश के गरीबों के लिये अनेक प्रकार के आयोजन करते हुए विश्व के पूंजीवाद पर जमकर शाब्दिक हमले करते हैं। चूंकि भारत एक श्रमप्रधान देश है इसलिये यहां कार्लमार्क्स के अनुयायी बुद्धिमानों को बहुत भीड़ देखने और सुनने  मिल जाती है। मूलतः कार्ल मार्क्स विश्व में प्रचलित धर्मों का विरोधी था।  वह कभी भारत नहीं आया इसलिये उसका धार्मिक ज्ञान सीमित था। दूसरी बात यह कि वह अध्यात्मिक ज्ञान और धार्मिक विचारधाराओं के अंतर से वह इतना परिचित नहीं था जितना एक आम भारतीय अध्यात्मिक चिंतक होता है।  उसकी नज़र में धर्म एक अफीम की तरह है जो जमकर नशा देता है पर वह यहीं  जान पाया कि पैसा, पद तथा प्रतिष्ठा का नशा भी कम बुरा नहीं है।

      वैसे तो भारतीय अध्यात्मिक चिंत्तक कार्ल मार्क्स की विचाराधारा को भारत के लिये प्रभावहीन मानते हैं पर श्रमकार्य में रत लोगों के प्रति उनकी सहानुभूति होने के कारण मजदूर दिवस मनाना उनको बुरा नहीं लगता।  दरअसल इस अवसर पर भारतीय अध्यात्म में श्रमजीवी, दरिद्र तथा लाचार मनुष्यों को सहारा देने के जो संदेश दिये गये हैं  इस दिन चर्चा का अच्छा अवसर मिलता है।

        श्रीमद्भागवगत गीता में अकुशल श्रम को हेय मानने वालों को तामस बुद्धि का माना गया है।  अकुशल श्रम  हमेशा ही मजदूर के हिस्से में आता है और उसे हेय मानने का अर्थ है कि व्यक्ति की बुद्धि तामसी है।  श्रीमद्भागवत गीता में यह भी कहा गया है कि दूसरे के रोजगार का हरण करने वाला आसुरी प्रवृत्ति का है।  यह मजदूरों के रोजगार सुरक्षा कें लिये महत्वपूर्ण बात है।  समाज में आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक सद्भाव बना रहे इसलिये दान आदि की प्रवृत्ति भी विकसित करने की बात भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में कही गयी है। मूल बात यह कही गयी है कि समाज की रक्षा गरीब तबका शारीरिक शक्ति तथा मध्यम वर्ग अपनी बुद्धि से करता है। उच्च वर्ग का यह दायित्व है कि वह इन दोनों वर्गों की रक्षा करे।

 

          विदुर नीति में अनेक महत्वपूर्ण बातें कही गयी हैं

 

                                               —————————

 

                    सम्पन्नतरमेवाचं दरिद्र भुंजते सदा।

 

                   क्षुत् स्वादुताँ जनपति सा वाद्वेषु सुदुर्लभा।

 

                 हिन्दी में भावार्थ-दरिद्र मनुष्य सदा ही स्वादिष्ट भोजन करते हैं क्योंकि भूख उनके भोजन में स्वाद पैदा करती है। ऐसी भूख धनियों के सर्वथा दुर्लभ है।

 

                    प्रावेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिनं विद्यते।

 

                  जीर्येन्त्यपि हि काष्ठानि दरिद्राणां महीपते।

 

                 हिन्दी में भावार्थ- संसार में धनियों में प्रायः भोजन करने की शक्ति नहीं होती परंतु दरिद्र काष्ट तक पचा जाते हैं।

 

                        ऐश्वमदपापिष्ठा मदाः पानमदादयः।

 

                   ऐश्वर्यमदत्तो हि नावत्तिवा विबुभ्यते।

 

                 हिन्दी में भावार्थ-शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों से भी नशा पैदा होता है पर उनसे बुरा ऐश्वर्य का नशा है। यह नशा आदमी को पथभ्रष्ट कर ही देता है।

      कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन समाज के हर वर्ग का दायित्व वैज्ञानिक ढंग से तय करता है। किसी बाहरी विचाराधारा के अनुसरण की आवश्यकता नहीं है।  एक अध्यात्मिक लेखक के रूप में हम कार्ल मार्क्स के प्रयासों की सराहना करते हैं मगर यह मानते हैं कि कहीं न कहीं उनकी विचाराधारा अव्यवाहारिक है। वह मनुष्य की मनोदशा का अध्ययन नहीं करती।  यही कारण है कि उनकी विचाराधारा के कथित अनुसरण करने के नाम पर अनेक देशों में क्रांतियां हुईं पर वहां कोई बेहतर हालात नहीं बने।  जहां पहले धार्मिक ठेकेदार सक्रिय थे वहां कथित रूप से क्रांति के ठेकेदारों ने साम्यवाद का नारा देकर सत्ता हथियाई।  उनमें अनेक राष्ट्र कालांतर में बिखर गये।  सोवियत संघ में तो कार्ल मार्क्स के अनुयायी लेनिन को पहले देवता का दर्जा मिला पर बाद में उनकी मूर्तियां ही तोड़ डाली गयीं।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार मनुष्य देह में अनेक प्रकृतियां विराजमान हैं।  जिनमें अहंकार सबसे महत्वपूर्ण है।  गरीब हो या अमीर उसमें अहंकार होता है। गरीब को अगर कहीं से धन लेना है तो वह गरीब कहलाने को तैयार होता है पर जहां से कुछ न मिले वहां वह कभी गरीब नहीं कहलाना चाहता।  हर मनुष्य अपना  स्वाभिमान बनाये रखना चाहता है।  यही कारण है कि  मजदूरों और गरीबों के नाम पर सत्ता हथियाने वाले अपने पद का अहंकार नहीं छोड़ पाते। उल्टे तानाशाही के चलते उनके ठाटबाट राजाओं से अधिक हो जाते हैं। साम्यवादी विचारक  पारिवारिक संस्कृति के विरोधी माने जाते हैं पर जहां कार्ल मार्क्स के चेलों ने सत्ता हथियाई है वहां वह अपनी ंपारिवारिक  मोह से मुक्त नहीं हो पाये और जिन सार्वजनिक पदों पर स्वयं विराजे वहां अपने बच्चों लाने का प्रयास कर रहे  हैं।  यही इस बात का प्रमाण है कि कार्ल मार्क्स की बातें कहंी न कहीं  मनुष्य के लिये अव्यवहारिक है।  उनकी विचारधारा धरती पर स्वर्ग  लाने के स्वप्न से अधिक नहीं है।

       इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम समाज के उच्च वर्ग को अपने दायित्वों से मुक्त करना चाहते हैं। कम से कम कार्ल मार्क्स की इस बात के लिये  प्रशंसा करनी तो चाहिये कि उसे विश्व के मजदूरों और गरीबों में चेतना लाने का काम किया।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन स्पष्ट रूप से यह मानता है कि धर का  बंटवारा समाज में अलग अलग रहेगा तो वह यह भी कहता है कि धनिकों को अपनी रक्षा का सार समाज की रक्षा में ढूंढना चाहिये।  उनके हित श्रमवर्ग के हित में ही अंतर्निहित हैं।  भले ही उच्च वर्ग के लोग गरीब को दान न दें पर उसे अपने परिश्रम का उचित प्रतिफल तथा सम्मान देने के साथ ही उसके लिये रोजगार के अवसर बनाये रखने का प्रयास करें।  ऐसा नहीं करेंगे तो वह स्वतः नष्ट हो जायेंगे।

       इस मजदूर दिवस के अवसर पर ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकोको बधाई।

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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कुछ क्रिकेट कुछ फिल्म-हिंदी व्यंग्य चिंत्तन


      कुछ लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि ‘आप कंप्यूटर पर इतना कैसे लिख लेते हैं? हमें कोई इसका जवाब नहीं सूझता।  सच बात तो यह है कि हमारे जैसे लोगों में इधर उधर की फालतु निंदा परनिंदा वाली बातों में समय बरबाद  करने की बजाय स्वस्थ मनोरंजन की चाहत होती है जिसके पूरा न होने पर वह स्वयं ही मनोरंजन का सृजन करने लगते हैं।  जब क्रिकेट की बातें हमारे दिमाग में भरी हुईं होती थीं उस दौर में हमारा लेखन कम हो गया था।  बाद में जब इसमें फिक्सिंग की बातें सामने आयी तो मन उचट गया।  उसी समय इंटरनेट कनेक्शन लिया था और पता नहीं यह ब्लॉगर और वर्डप्रेस के   ब्लॉग हमारे हाथ आ गये।  हमें पता नहीं था कि यह ब्लॉग हमें कहां ले जाने वाले हैं।  यकीनन वह क्रिकेट की जगह ले रहे थे।  यही कारण की इन पर हमारी शुरुआती रचनायें क्रिकेट का मखौल उड़ाने वाली थी।
      सच बात तो  है कि अब तो हम यह मानने लगे हैं कि क्रिकेट कोई खेल नहीं है वरन् यह एक व्यवसाय है।  हमने यह देखा कि जब क्रिकेट का आकर्षण चरम पर था तब अनेक जगह इसका मनोरंजन की तरह वैसे ही आयोजन किया जाता जैसे फिल्मी गानों का आयोजन होता है।  गानों के कार्यक्रम में समस्या यह होती है कि जिसे गाना आता है वही माइक पर गा सकता है और बाकी लोगों को श्रोता बनना पड़ता है।  एसे में दर्शकों को गाना न आने का मलाल तो रहता ही है। क्रिकेट ने यह सुविधा दे दी कि इसे चाहे जो इसे खेल सकता है।  यही कारण है कि कहीं स्त्री- पुरुष, कहीं अधिकारी-कर्मचारी तो कहीं मालिक-नौकर के वर्ग बनाकर अवकाश के दिन मैच होते रहे।  जैसे ही फिक्सिंग के बाद क्रिकेट का आकर्षण कम हुआ यह सब बंद हो गया।
      हमारा मानना है कि क्रिकेट का आकर्षण अब न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है।  अगर अब यह चल रहा है तो केवल टीवी चैनलों की वजह से ही इसका अस्तित्व है।  बाज़ार और प्रचार प्रबंधक मिलकर क्रिकेट को पुनः लोकप्रिय बनाने का प्रयास कर रहे हैं।  इधर एक टीवी चैनल हिन्दी में भी कमेंट्री प्रसारित कर रहा है जो शुद्ध रूप से एक व्यवसायिक प्रयास है।  वरना तो क्रिकेट वाले भला कब हिन्दी बोलते हैं।  क्रिकेट के फिल्म जैसे ही मनोरंजक व्यवसाय होने का प्रमाण यह है कि पर्दे के अभिनेता अभिनेत्रियों जहां कहीं मैदान में इनाम लेते हैं तो  अंग्रेजी में ही बोलते है।  उनकी तरह  मैदान के खिलाड़ी भी  पर्दे पर आकर अंग्रेेजी में बोलते है। जो क्रिकेट में हिट हुआ उसका किसी किसी तरह से फिल्म के साथ नाता जुड़ ही जाता है।  सुपर क्रिकेट स्टार और सुपर फिल्म एक्ट्रेस के बीच इश्क का प्रायोजन कर उसे भी भुनाने के अनेक प्रयास हम देख चुके हैं।
       बाज़ार के उत्पाद बेचने के लिये फिल्म के अभिनेता और अभिनेत्रियों के साथ क्रिकेट के खिलाड़ी भी पर्दे पर उतरते हैं।  प्रचार प्रबंधक भी इनके साथ ऐसे ही जुड़े रहते हैं जैसे कि यह उनके अपने नायक हों।  क्रिकेट के मैदान पर कंपनियों के विज्ञापन बोर्ड पूरी कहानी बयान करते हैं। इसे समझने वाला कोई पाठक अर्थशास्त्री होना चाहिये।  जब बीसीसीआई की क्रिकेट टीम कभी कभी लगातार हारने लगती है तब कुछ आम क्रिकेट प्रेमी चिल्लाते हैं कि ‘उस खिलाड़ी को हटा दो’, ’उसे कप्तानी से हटा दो’ या ‘‘इस बॉलर को टीम में क्यों नहीं लिया, उस बल्लेबाज को क्यों रख लिया’, तब हमें हसंी आती है।  अब इन आलोचकों को यह कौन समझाये कि अगर क्रिकेट के खिलाड़ियों का चयन आम लोगों की दृष्टि से होगा तो कंपनियों के उत्पाद कौन खरीदेगा और कौन बेचेगा? कोई खिलाड़ी अगर किसी विज्ञापन में बना हुआ है और टीम से हटा दिया जाये तो जो उत्पाद का नुक्सान होगा उसे कौन भरेगा? पता नहीं भारत के आम क्रिकेट प्रेमियों को यह कैसा भ्रम है कि क्रिकेट खेल उनकी वजह से चल रहा है? भले ही कुछ क्रिकेट खिलाड़ी जो अब विशेषज्ञ बन गये हैं यह दावा करते हैं कि आम आदमी के लिये क्रिकेट खेला जा रहा है पर यह सच नहीं है। हां, कुछ क्रिकेट खिलाड़ी जरूर तारीफ करने लायक हैं जो कि मानते है कि  क्रिकेट खिलाड़ियों को अच्छा खेलना चाहिए ताकि दर्शकों का मनोरंजन हो।  स्पष्टतः वह इस तर्क को ही हवा देते हैं कि यह खेल नहीं वरन् मनोरंजन है। यह अलग बात है कि अगर उनसे कहा जाये कि यह मनोरंजन है खेल नहीं तो वह उखड़ भी सकते हैं।
       भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बिगड़ते हैं तो क्रिकेट में सबसे पहले बिगड़ते हैं।  जब बनाने की बात आती है तो भी क्रिकेट मैच दोबारा खेलने से ही शुरुआत होती है।  भारत में कुछ लोग दावा करते हैं कि क्रिकेट में रिश्ते बढ़ाने से भारत पाकिस्तान की दोस्ती बढ़ेगी।  हैरानी होती है!  यह नुस्खा बीस सालों में पांच दस बार आजमाया जा चुका है पर कभी परिणाम पर खरा नहीं उतरा।  कभी कभी संगीत और फिल्म में भी इस तरह के संपर्क जोड़कर संबंध मधुर करने की  बात कही जाती है।  यह दोनों ऐसे व्यवसाय है जिनमें पैसा खूब है।  जब पाकिस्तान से भारत का रिश्ता खराब होता है तो चोट इन्हीं दो क्षेत्रों में होती है।  पाकिस्तान क्रिकेट टीम के साथ मैच न खेलने के साथ उसके गायकों और हास्य कलाकारों को मुंबई से भगा दिया जाता है।
       हमें इन चीजों से कोई लेना देना नहीं है पर  जब पाकिस्तान इन कदमों से हताश होता नज़र आता है उससे यही लगता है कि कहीं न कहीं उसके यहां के गायकों, नायकों और खिलाड़ियों के अलावा अन्य व्यवसायी भी  इससे लाभान्वित होते हैं।  इससे यह प्रमाण मिलता है कि क्रिकेट और फिल्म एक जैसे ही व्यवसाय है।  ऐसे में अगर बीसीसीआई की टीम कभी पाकिस्तान से हारती है तो वैसे ही अफसोस नहीं होता जैसे किसी फिल्म के पिट जाने पर कोई चिंता नहीं होती।  जीत जाती है तो भी हमें खुशी नहीं होती क्योंकि किसी की फिल्म हिट हो तो हमें क्या मिलता है।  क्रिकेट से हमारा ही नहीं अनेक मित्रों का मोह इतना भंग हुआ है कि अब तो वह क्रिकेट का नाम नहीं लेते पर हम जैसे लेखक के लिये यह भूलना कठिन होता है कि इस खेल ने हमारे पूरे पंद्रह वर्ष बरबाद किये। अगर हम क्रिकेट नहीं देखते तो यकीनन बहुत बड़े लेखक होते।
    पहले इस क्रिकेट ने दुःखी किया तो हमने मैच देखने बंद या कम किये पर अब तो समाचार हो या मनोरंजन चैनल वह कहीं न कहीं क्रिकेट का विज्ञापन कर रहा है।  पहले हम इच्छा से देखते थे पर अब यह जबरन हम पर थोपा जा रहा है।  पाकिस्तान से दोस्ती का तो नाम भर है, टीवी चैनलों के  विज्ञापन देखें तो पता चलेगा कि दुश्मनी को भुनाया जा रहा है।  ऐसे में चिढ आती है तब ऐसे व्यंग्य लिखने का मन करता है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

http://rajlekh.blogspot.com
 

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भर्तृहरि नीति दर्शन-मदिरा से भरी आंखों को न देखा होता तो संसार पार हो जाता (hindu dharma sandesh-kuleenta,vivek aur kam vasna)


तावन्महत्तवं पाण्डितयं केलीनत्वं विवेकता।
यावज्जवलति नांगेषु हतः पंचेषु पावकः।।
हिन्दी में भावार्थ-
किसी भी मनुष्य में सज्जनता, कुलीनता, तथा विवेक का भाव तभी तक रहता है जब उसके हृदय में कामदेव की ज्वाला नहीं धधकी होती। कामदेव का हमला होने पर पर सारे अच्छे भाव नष्ट हो जाते है।
संसार! तव पर्यन्तपदवी न दवीयसी।
अन्तरा दुस्तराः न स्युर्यदि ते मदिरेक्षणा।।
हिन्दी में भावार्थ-
यहां भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि ‘ओ संसार, तुझे पार पाना कोई कठिन काम नहीं था अगर मदिरा से भरी आखों में न देखा होता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- किसी मनुष्य को देवता नहीं समझना चाहिये क्योंकि पंच तत्वों से बनी इस देह में राक्षस भी रहता है। अगर कोई मनुष्य सात्विक कर्म में लिप्त है तो उसकी परीक्षा लेने का प्रयास भी नहीं करना चाहिए।  श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है कि ‘गुण ही गुणों में बरतते है’, और ‘इंद्रियां ही इंद्रियों बरत रहीं है’। इसका आशय यह है कि इस देह में मौजूद तत्व कब किसे अपने प्रभाव में लाकर मार्ग से भटका दें यह कहना कठिन है। इतना जरूर है कि तत्व ज्ञान इस बात को जानते हैं तो मार्ग से भटकते हैं और भटक जायें तो अपने किये पर पश्चाताप करते हैं इसके विरुद्ध अज्ञानी लोग बजाय पश्चाताप करने के अपनी झूठी सफाई देने लगते हैं।
श्रीमद्भागवत गीता में लिखा हुआ है कि ‘गुण ही गुणों में बरतते है।’ इस सूत्र में बहुत बड़ा विज्ञान दर्शन अंतर्निहित हैं। इस संसार में जितने भी देहधारी जीव हैं सभी को रोटी और काम की भूख का भाव घेरे रहता है अलबत्ता पशु पक्षी कभी इसे छिपाते नहीं पर मनुष्यों में कुछ लोग अपने को सचरित्र दिखने के लिये अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण का झूठा दावा करते है। सच तो यह है कि पंचतत्वों से बनी इस देह मे तन और मन दोनों प्रकार की भूख लगती है। भूख चाहे रोटी की हो या कामवासना की चरम पर आने पर मनुष्य की बुद्धि और विवेक को नष्ट कर देती है। मनुष्य चाहे या नहीं उसे अपनी भूख को शांत रखने का प्रयास करना पड़ता है। जो लोग दिखावा नहीं  करते वह तो सामान्य रूप से रहते हैं पर जिनको इंद्रिय विेजेता दिखना है वह ढेर सार नाटकबाजी करते हैं। देखा यह गया है कि ऐसे ही नाटकबाज धर्म के व्यापार में अधिक लिप्त हैं और उन पर ही यौन शोषण के आरोप लगते हैं क्योंकि वह स्वयं को सिद्ध दिखाने के लिये छिपकर अपनी भूख मिटाने का प्रयास करते हैं और अंतत: उनका रास्ता अपराध की ओर जाता है।
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संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com

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संत कबीर वाणी-परिवार की मर्यादा ने मनुष्य को बिगाड़ दिया (parivar ki maryada-sant kabir wani)


इस संसार में अनेक प्रकार के जीव हैं और सभी के लिये प्रकृति ने भोजन पानी का इंतजाम किया है। मनुष्य भी उनमें एक है पर जितनी बुद्धि उसमें अधिक है उतना ही वह भ्रमित होता है। लोग दावा करते हैं कि वह अपने कर्म से अपना परिवार पाल रहे हैं पर यह नहीं जानते कि वह तो केवल कारण है वरना कर्ता तो परमात्मा ही है। इसी भ्रम में मनुष्य जीवन गुजार लेता है पर उस परमात्मा का स्मरण नहीं करता जिसे उसे मनुष्य योनि प्रदान की है।
कुल करनी के कारनै, हंसा गया बिगोय
तब कुल काको लाजि, चारि पांव का होय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने परिवार की मर्यादा के लिये आदमी ने अपने आपको बिगाड़ लिया वरना वह तो हंस था। उस कुल की मर्यादा का तब क्या होगा जब परमार्थ और सत्संग के बिना जब भविष्य में उसे पशु बनना पड़ेगा।
दुनिया के धोखे मुआ, चल कुटुंब की कानि
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा पसानि
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है यह दुनियां एक धोखा है जिसमें आदमी केवल अपने परिवार के पालन पोषण के लिये हर समय जुटा रहता है। वह इस बात का विचार नहीं करता कि जब उसका शरीर निर्जीव होकर इस धरती पर पड़ा रहेगा तब उसके कुल शान का क्या होगा?
वर्तमान  सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य मन को हंस भी कहा जाता है पर उसे कोई उड़ने दे  तभी उसे  समझा जा सकता है। हर कोई अपने विचार और लक्ष्यों का दायरा संकीर्ण कर लेता है। अपने और परिवार के हित के आगे उसे कुछ नहीं सूझता। कई लोग मन में शांति न होने की बात कहते हैं पर उसके पाने लिये कोई यत्न नहीं करते। मन एकरसता से ऊब जाता है। स्वार्थ सिद्धि में डूबा मन   एकरसता से ऊब जाता है पर बुद्धि परमार्थ के लिए प्रेरित नहीं होती। अगर थोड़ा परमार्थ भी कर लें तो एक सुख का अनुभव होता है। परमार्थ का यह आशय कतई नहीं है कि अपना सर्वस्व लुटा दें बल्कि हम किसी सुपात्र व्यक्ति की सहायता करने के साथ  किसी बेबस का सहारा बने। वैसे लुटाने को लोग लाखों लुटा रहे हैं। अपने परिवार के नाम प्याऊ या किसी मंदिर में बैच या पंखा लगवाकर उस पर अपने परिवार का परिचय अंकित करवा देते हैं और स्वयं ही दानी होने का प्रमाणपत्र ग्रहण करते हैं। इससे मन को शांति नहीं मिलती। दूसरों से दिखावा कर सकते हो पर अपने आप से वह संभव नहीं है। हम हर जगह अपने कुल की परिवार की प्रतिष्ठा लिये घूमते हैं पर अपनी आत्मा से कभी परिचित नहीं होते। इसके लिये जरूरी है कि समय निकालकर भक्ति और संत्संग के कार्यों में बिना किसी दिखावे के निष्काम भाव से सम्मिलित हों। कामना के साथ दान या भक्ति करने से मन को कभी शांति नहीं मिलती। उस पर अगर कुल प्रतिष्ठा किए रक्षा का विचार में में आ जाए तो फिर मनुष्य अपना जीवन ही नारकीय हो जाता है।  दूसरी बात यह ही कि इस संसार का पालनहार तो परमात्मा है तब हम अपने परिवार को पालने का दावा कर सवयं को धोखा देते हैं । 

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मनु स्मृति-धर्मं ही मनुष्य का अनुसरण करता है (manushya aur dharma-hindi sandesh)


मनु स्मृति के अनुसार 
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मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ।
विमुखः बान्धवाः यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति।।
हिन्दी में भावार्थ-
मरे हुए मनुष्य की देह को उसके बंधु लोग मिट्टी का मानकर उसे गाड़ देते हैं या जलती हुई लकड़ियों में छोड़ जाते हैं। उस समय धर्म ही जीव का अनुगमन करता है।


एकःप्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते।
एकोऽनुभुंक्ते सृकृतमेक ज्ञातिर्धर्मस्तिष्ठति केवलः।।
हिन्दी में भावार्थ-
इस संसार में हर मनुष्य अकेले आता और जाता है। उसे अपने अच्छे और बुरे कर्म का फल भी अकेले ही भुगतना है। यह अकाट्य सत्य है।

वर्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या -चाहे कोई अपने को कितना भी समझाये पर सच यह है कि जब तक देह है सभी लोग एक दूसरे के आत्मीय बनते हैं पर जैसे ही इसमें से आत्मा निकल गया वैसे ही यह बंधु बान्धवों के लिये यह देह मिट्टी का ढेला हो जाती है। वह इसे गाड़कर या जलती लकड़ियों में छोड़कर मुंह फेर चले जाते हैं। कहने कहा अभिप्राय यह है कि आदमी इस धरती पर अकेला ही है। वह कर्म करते हुए धन संग्रह यह सोचकर करता है कि वह अपने और परिवार का भला कर रहा है? अनेक लोग तो धन के लोभ में कदाचरण करते हुए भी नहीं हिचकिचाते। अपने साथ परिवार, रिश्तेदार और मित्रों के होने की अनुभूति उनके अंदर यह भाव नहीं आने देती कि वह हर प्रकार के अपराध के लिये अकेले ही जिम्मेदार हैं। आपने देखा होगा कि अनेक लोग भ्रष्टाचार, हत्या, तथा अन्य अपराधों में अकेले ही फंसते हैं और जिनके लिये काम करने का दावा करते हैं वह बाहर ही बैठे रहते हैं। परिवार, रिश्तेदार, या मित्रों में कोई भी आदमी उनके साथ कारावास में नहीं जाता।

अपराध, भ्रष्टाचार तथा कदाचरण से धन कमाने वाले अनेक लोग यह कहते हैं कि अपना परिवार पालने के लिये यह कर रहे हैं पर वह स्वयं को ही धोखा देते हैं। सबका दाता तो परमात्मा है। यहां भला कोई परिवार क्या पालेगा? जो गलत काम कर रहा है वही बदनाम होता है। इसके विपरीत जो भले काम कर अपना धर्म निभाते हैं उनकी छबि अच्छी बनती है। दोनों ही स्थितियों में आदमी जिम्मेदारी स्वयं ही होता है। अगर बुरे काम करेगा तो मरने के बाद वह उसके साथ ही जायेंगे। अच्छा काम किया है तो देहावसान के बाद धर्म साथ चलेगा।
यह एक अंतिम सत्य है कि यहाँ इन्सान अकेला आया है और अकेला ही जाएगा।  हम इस  सत्य को भुलाकर अपने को धोखा देते हैं। 

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हिन्दू धर्म संदेश-अज्ञानी करते हैं स्वर्ग की कल्पना


भर्तृहरि महाराज के अनुसार 
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स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीपण्डितो युवतीः।
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाप्सरसः।।
हिन्दी में भावार्थ-
शास्त्रों का अध्ययन करने वाले कुछ अल्पज्ञानी विद्वान व्यर्थ ही स्त्रियों की निंदा करते हुए लोगों को धोखा देते हैं क्योंकि तपस्या तथा साधना के फलस्वरूप जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है उसमें भी तो अप्सराओं के साथ रमण करने का सुख मिलने की बात कही जाती है।
उन्मतत्तप्रेमसंरम्भादारभन्ते यदंगनाः।
तत्र प्रत्यूहमाधातुं ब्रह्मापि खलु कातरः।
हिन्दी में भावार्थ-
प्रेम में उन्मत होकर युवतियां अपने प्रियतम को पाने के लिये कुछ भी करने लगती हैं। उनके इस कार्य को रोकने का ब्रह्मा भी सामर्थ्य नहीं रखता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-विश्व के अनेक धर्मों की बड़ी बड़ी किताबें लिखी गयी हैं। उन सभी को पढ़ना कठिन है, पर कोई एक भी पढ़ी जाये तो उसमें तमाम तरह की विसंगतियां नज़र आती है। अधिकतर धार्मिक पुस्तकों के रचयिता पुरुष हैं इसलिये स्त्रियों पर नियंत्रण रखने के लिये विशेष रूप से कुछ कुछ लिखा गया है। यह शोध का विषय है कि आखिर सारे धर्म ही स्त्रियों पर नियंत्रण की बात क्यों करते हैं पुरुष को तो एक देवता मानकर प्रस्तुत किया जाता है। सच बात तो यह है कि अगर पुरुष देवता नहंी है तो नारी भी कोई देवी नहीं है। हर मनुष्य परिस्थतियों, संस्कारों और व्यक्तिगत बाध्यताओं के चलते अपना सामाजिक व्यवहार करता है। अब यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे प्रेरणा कैसी मिलती है। अगर प्रेरणास्त्रोत बुरा है तो वह भी बुरा ही करेगा अगर अच्छा है तो वह अच्छे काम में लिप्त हो जायेगा।
दूसरी जो सबसे बड़ी अहम बात है वह यह कि हर पुरुष और स्त्री का व्यवहार तय करने में उसकी आयु का बहुत योगदान होता है। बाल्यकाल तो अल्लहड़पन में बीत जाता है। उसके बाद युवावस्था में स्त्री पुरुष दोनों का मन नयी दुनियां को देखने के लिये लालायित होता है। विपरीत लिंग का आकर्षण उनको जकड़ लेता है। ऐसे में उन पर जो नियंत्रण की बात करते हैं वह या तो बूढ़े हो चुके होते हैं या फिर जिनका जीवन असाध्य कष्टों के बीच गुजर रहा होता है। कभी कभी तो यह लगता है कि दुनियां के अनेक धर्म ग्रंथ बूढ़े लोगों द्वारा ही लिखे या लिखवाये गये हैं क्योंकि उसमें औरतों पर ही नियंत्रण की बात की जाती है पुरुष को तो स्वाभाविक रूप से आत्मनिंयत्रित माना जाता हैं स्त्रियों के लिये मुंह ढंकने, पिता या भाई के साथ ही घर के बाहर निकलने तथा ऊंची आवाज में न बोलने जैसी बातें कहीं जाती हैं। कभी कभी तो लगता है कि युवतियों की युवावस्था अनेक धर्म लेखकों और विद्वानों के बहुत बुरी लगती है। इसलिये अतार्किक और अव्यवाहारिक बातें लिखते हैं। स्त्री हो या पुरुष युवावस्था में स्वाभाविक रूप से हर जीव अनिंयत्रित होता है-मनुष्य ही नहीं पशु पक्षियों में भी काम वासना की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से देखी जाती है। इस पर युवा स्त्रियों पर नियंत्रण की बात तो व्यर्थ ही लगती है क्योंकि अपने प्रियतम को पाने के लिये जो वह करती हैं उसे रोकने का सामर्थ्य तो विधाता भी नहीं रखता। अलबत्ता सभ्य, कुलीन, शिक्षित तथा बुद्धिमान लड़कियां स्वयं पर नियंत्रण रखती हैं इसलिये ही समाज में अभी तक नैतिकता का आधार बना हुआ है। ऐसी लड़कियों को धार्मिक शिक्षक न भी समझायें तो भी वह मर्यादा में रहती हैं पर जो भटकने पर आमादा है उनको रोकना किसी के लिये संभव नहीं है। कम से कम भर्तृहरि महाराज की समझाइश के अनुसार तो स्त्रियों पर सामाजिक नियंत्रण की बात तो करना ही नहीं चाहिए। दूसरी बात यह कि स्वर्ग कि कल्पना वास्तविकता पर आधारित न होकर अज्ञानियों तथा अल्पज्ञानियों की कल्पना मात्र है।
लोगों के मरने के बाद स्वर्ग पाने की इच्छा का चालाक धार्मिक दलालों ने खूब दोहन किया है और वह अपनी कमाई के लिये उनको तमाम तरह के कर्मकांड करने के लिये प्रेरित करते हैं। अतः जिन लोगों को भारतीय अध्यात्म का ज्ञान है उनको इस बात का प्रचार करना चाहिये कि स्वर्ग और नरक केवल एक भ्रम है। अलबत्ता अपने अच्छे कामों से इस धरती पर स्वर्ग भोगा जा सकता है और बुरे कर्मो यही नरक का वातावरण बना देते हैं।
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विदुर दर्शन-सत्य से ही धर्म की रक्षा संभव (satya se hi dharma ki raksha sanbhav)


सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।
मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
सत्य से धर्म, योग से विद्या, सफाई से सुंदरता और सदाचार से कुल की रक्षा होती है। 


पर्जन्यनाथाः पशवो राजानो मन्त्रिबान्धवाः।।
पतयो बान्धवा स्त्रीणां ब्राह्मण वेदबान्धवा।।
हिन्दी में भावार्थ-
पशुओं के सहायक बादल, राजाओं के सहायक मंत्री, स्त्रियों के सहायक पति के साथ बंधु और विद्वानों का सहायक ज्ञान है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में ज्ञान का होना जरूरी है अन्यथा हम अपने पास मौजूद व्यक्तियों, वस्तुओं तथा उपलब्धियों का सही उपयोग नहीं कर सकते। एक बात याद रखना चाहिये कि हमारे साथ जो लोग होते हैं उनका महत्व होता है।  अंधेरे में तीर चलाने से कुछ नहीं होता, इसलिये जीवन के सत्य को समझ लेना चाहिये। राजाओं के सहायक मंत्री होते हैं। इसका आशय साफ है कि अपने मित्र और सलाहकार के चयन में हर आदमी को सतर्कता बरतना चाहिये।
स्त्रियों की स्वतंत्रता बुरी नहीं है पर उन्हें यह समझ लेना चाहिये कि उनकी रक्षा उसके परिवार के पुरुष सदस्य ही कर सकते हैं।  उनको बाहर के व्यक्तियों से यह अपेक्षा नहीं करना चाहिये कि वह उनकी रक्षा करेंगे भले ही चाहे वह कितना भी दावा करें।  हम अक्सर ऐसी वारदातें देखते हैं जिसमें स्त्रियों के साथ धोखा होता है और इनमें अधिकतर उनमें अपने ही  लोग होते हैं। इनमें भी अधिक संख्या उनकी होती है  जो परिवार के बाहर के होने के बावजूद उनसे निकटता प्राप्त करते हैं।  स्त्रियों के मामले में यह भी दिखाई देता है कि उनके साथ विश्वासघात अपने ही करते हैं पर इनमें अधिकतर संख्या  उन लोगों की होती है जो बाहर के होने के साथ  अपने बनने का नाटक हुए   उनको धर्म और चरित्र पथ से भ्रष्ट भी करते हैं।
हम लोगों का यह भ्रम होता है कि बादल हमारे लिये बरस रहे हैं।  जब बादल नहीं बरसते तब तमाम तरह के धार्मिक कर्मकांड किये जाते हैं। बरसते हैं तो धर्म के ठेकेदार अनेक प्रकार के दावे करते हैं जबकि सच्चाई यह है कि बादल धरती पर स्थित पेड़ पौद्यों तथा पशुओं के रक्षक हैं और इसलिये उनका तो बरसना ही है।
आजकल भारतीय योग साधना का प्रचार हो रहा है। दरअसल यह योग साधना न केवल स्वास्थ्य के लिये उपयुक्त है बल्कि उससे हमारी विद्या तथा ज्ञान की रक्षा भी होती है। इसलिये जो लोग चाहते हैं कि उनके बच्चे प्रतिभाशाली हों उन्हें चाहिये कि वह इसके लिये उनको प्रेरित करें।  आजकल कठिन प्रतियोगिता का समय है और ऐसे में योग साधना ही एक ऐसा उपाय दिखती है जिससे उनकी प्रतिभा को सोने जैसी चमक मिल सकती है। सच बात तो यह है कि इस संसार में खुश रहने के लिये योग साधना के अलावा कोई अन्य उपाय है इस पर विश्वास करना कठिन है। 

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विदुर नीति-धर्म का दिखावा करना अहंकार का प्रमाण (dharma aur ahnakar-hindi sandesh)


इन्याध्ययनदानादि तपः सत्यं क्षमा घृणा।
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः समृतः।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर का कहना है कि यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और अलोभ वह गुण है जो धर्म के मार्ग भी हैं। 


तत्र पूर्वचतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते।
उत्तरश्च चतुर्वर्गो नामहात्मसु तिष्ठति।।
हिन्दी में भावार्थ-
इनमें पहले चार का तो अहंकार वश भी पालन किया जाता है जबकि आखिरी चार के मार्ग पर केवल महात्मा लोग ही चल पाते हैं।  


वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ऐसा नहीं है कि किसी मनुष्य में कोई गुण नहीं होता और न ही कोई बिना भला काम किये रह जाता है।  अलबत्ता उसकी मूल प्रकृत्ति के अनुसार ही उसके पुण्य या भले काम का मूल्यांकन भी होता है।  देखा जाये तो दुनियां के अधिकतर लोग अपने  धर्म के अनुसार यज्ञ, अध्ययन, दान और परमात्मा की भक्ति सभी करते हैं पर इनमें कुछ लोग दिखावे के लिये अहंकार वश करते हैं।  उनके मन में कर्तापन का अहंकार इतना होता है कि उसे देखकर हंसी ही आती है।  हमारे देश के प्रसिद्ध संत रविदास जी ने कहा है कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ जिसका आशय यही है कि अगर हृदय पवित्र है तो वहीं भगवान का वास है।  लोग अपने घरों पर रहते हुए हृदय से परमात्मा का स्मरण नहीं कर पाते जिससे उनके मन में विकार एकत्रित होते हैं।  फिर वही लोग  दिल बहलाने के लिये पर्यटन की दृष्टि से धार्मिक यात्राओं पर जाते हैं यह दिखाने के लिये कि वह धार्मिक प्रवृत्ति के हैं।  फिर वहां से आकर सभी के सामने बधारते हैं कि ‘मैंने यह किया’, ‘मैंने वह किया’ या ‘मैंने दान किया’-यह उनकी अहंकार की प्रवृत्ति का परिचायक है। इससे यह भी पता चलता है कि उनके मन का विकार तो गया ही नहीं।
इतना ही नहीं कुछ लोग अक्सर यह भी कहते हैं कि ‘हमारे धर्म के अनुसार यह होता है’, या ‘हमारे धर्म के अनुसार ऐसा होना चाहिये’।  इससे भी आगे बढ़कर वह खान पान, रहन सहन तथा चाल चलन को लेकर अपने धार्मिक ग्रंथों के हवाले देते हैं।  उनका यह अध्ययन एक तरह से अहंकार के इर्दगिर्द आकर सिमट जाता है।  सत्संग चर्चा होना चाहिये पर उसमें अपने आपको भक्त या ज्ञानी साबित करना अहंकार का प्रतीक है।  कहने का तात्पर्य यही है कि यज्ञ, अध्ययन, तप और दान करना ही किसी मनुष्य की धार्मिक प्रवृत्ति होने का प्रमाण नहीं है जब तक उसके व्यवहार में वह अपने क्षमावान, दयालु, सत्यनिष्ठ, और लोभरहित नहीं दिखता।  यह चारों गुण ही आदमी के सात्विक होने का प्रतीक हैं। जिन लोगों के मन में सात्विकता का भाव है वह कभी दिखावा
नहीं करते और उनकी भक्ति का तेज उनके चेहरे पर वैसे ही दिखता है।
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मनुस्मृति-श्रमिक का हाथ सदैव पवित्र रहता है (worker is hollyman-hindu dharma sandesh)


नित्यमास्यं शुचिः स्त्रीणां शकुनि फलपातने।
प्रस्त्रवे च शुचर्वत्सः श्वा मृगग्रहणे शुचिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
नारियों का मुख, फल गिराने के लिये उपयोग  में लाया गया पक्षी, दुग्ध दोहन के समय बछड़ा तथा शिकार पकड़ने के लिये उपयोग में लाया गया कुत्ता पवित्र है।
नित्यं शुद्धः कारुहस्तः पण्ये यच्च प्रसारितम्।
ब्रह्मचारिगतं भैक्ष्यं नित्यं मेध्यमिति स्थितिः।
हिन्दी में भावार्थ-
शास्त्रों के अनुसार कारीगर का हाथ, बाजार में बेचने के लिये रखी गयी वस्तु तथा ब्रह्मचार को दी गयी भिक्षा सदा ही शुद्ध है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में पाश्चात्य सभ्यता के अनुसरण ने लोगों के दिमाग में श्रम की मर्यादा को कम किया है। आधुनिक सुख सुविधाओं के उपभोग करने वाले धनपति मजदूरों और कारीगरों को हेय दृष्टि से देखते हैं। उनके श्रम का मूल्य चुकाते हुए अनेक धनपतियों का मुख सूखने लगता है। जबकि हमारे मनु महाराज के अनुसार कारीगर का हाथ हमेशा ही शुद्ध रहता है। इसका कारण यह है कि वह अपना काम हृदय लगाकर करता है। उसके मन में कोई विकार या तनाव नहीं होता। यह शुद्ध भाव उसके हाथ को हमेशा पवित्र तथा शुद्ध करता रहता है। भले ही सिर पर रेत, सीमेंट या ईंटों को ढोते हुए कोई मजदूर पूरी तरह मिट्टी से ढंक जाता है पर फिर भी वह पवित्र है। उसी तरह मैला ढोले वालों का भले ही कोई अछूत कहे पर यह उनका नजरिया गलत है। मैला ढोले वाले के हाथ भले ही गंदे हो जाते हैं पर उसके हृदय की पवित्रता उनको शुद्ध रखती है।
जो लोग मजदूरों, कारीगरों या मैला ढोले वालों को अशुद्ध समझते है वह बुद्धिहीन है क्योंकि श्रमसाध्य कार्य करना एक तो हरेक के बूते का नहीं होता दूसरे उनको करने वाले अत्यंत पवित्र उद्देश्य से यह करते हैं इसलिये उनके हाथों को अशुद्ध मानना या उनकी देह को अछूत समझना अज्ञानता का प्रमाण है।
यहां बाजार में रखी वस्तु के शुद्ध होने से आशय यह कतई न लें कि हम चाहे जो भी वस्तु रखें वह पवित्र ही होगी। दरअसल इसका यह भी एक आशय है कि आप जो चीज बेचने के लिये रखें वह पवित्र और शुद्ध होना चाहिये। इसके अलावा इस बात का ध्यान रखें कि जो लोग अपने हाथों से कुशल या अकुशल श्रम करते हैं उनको हेय दृष्टि से न देखों तथा उनके परिश्रम का उचित मूल्य चुकायें।

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