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प्रचारक महाराज का तंत्र-हिन्दी हास्य व्यंग्य


          प्रचारक महाराज ने अपने सचिव से कहा-‘यह बताओ, इस बार अपने प्रचार तंत्र से आय कम होने का कारण क्या है? इधर हमारे विज्ञापन दाता तो उधर हमारे आका दोनों ही हमसे नाराज चल रहे हैं। उनका कहना है कि इधर हमारे प्रचार युद्ध में मजा नहीं आ रहा है। अपने प्रचारतंत्र का स्तर बनाये रखने के लिये प्रयास करना जरूरी है। तुम अपने अधीनस्थ सभी लोगों को जाकर सचेत करो।’

सचिव ने कहा-‘सर, हम क्या करें? हमारे तंत्र की पूरी कोशिश है कि आम आदमी हमारी पकड़ से बाहर नहीं जाये। अखबार, टीवी चैनल और रेडियो पर नित नित नये मनोरंजन कार्यक्रम कभी प्रेम तो कभी द्वंद्व से सजाकर लगातार प्रस्तुत करते हैं। लेाग अपना सारा समय हमारे प्रचार तंत्र में गुजारते हैं या फिर हमारे उद्घोषकों की सुझायी गयी जगहों में गुजारते हैं। होटल, मॉल और बारों के अपने पास खूब विज्ञापन भी मिलते है। कम से कम एक बात तय है कि आज की युवा या बुढ़ाई गयी पीढ़ी हमारी पकड़ से बाहर नहीं है।’’

प्रचारक महाराज नाराज हो गये और बोले-‘पूरा समाज हमारी पकड़ में है यह तो पता है। उसकी मुक्ति का मार्ग कोई नहीं है यह भी हम जानते हैं पर मुश्किल यह है कि हमारे दाता और आका अगर प्रसन्न नहीं है तो वह हमारे लिये बहुत बुरा है। उनको भी तो एक आम आदमी के रूप में मनोंरजन, सनसनी और कामेडी का मसाला चाहिए। यह सबसे बड़ी बात है। हम समाज सेवकों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और बाहुबलियों का गुणगान करते हैं उससे तो वह खुश हो जाते हैं पर वह मनोरंजन के नये ढंग भी देखना चाहते हैं। उनके लिये प्रकाशनों और प्रसारणों में प्रेम और द्वंद्व के नये नये कार्यक्रम इस तरह सजाओं कि खास आदमी भी हमारे जाल में वैसे ही फंसा रहे जैसे कि आम आदमी।

सचिव बोला-‘अब हम कर भी क्या सकते हैं। क्रिकेट, फिल्म, हास्य और रुदन वाले टीवी धारावाहिकों में रोज नवीनता लाते हैं। कभी क्रिक्रेटर को भी रैम्प पर नचवाते हैं तो आदमियों को नारी वेश में सजाकर कॉमेडी भी करवाते हैं। नारीपात्रों से सैक्सी चुटकुले भी सुनाते हैं। कभी यस बॉस जैसे घरेलू कार्यक्रमों में बदनाम लोग भी सजाते हैं तो कभी नकली अदालतें भी चलवाते हैं।’’

प्रचारक महाराज बोले-‘यह सब बकवास है। दरअसल ऐसे मुद्दे लाओ जिससे समाज में सामूहिक सनसनी फैले। लोग बहस में तर्क कम दें चीखके और चिल्लायें ज्यादा! ऐसा लगे कि जैसे झंगड़ा हो रहा है। लोगों को दूसरों का झगड़ा देखना पसंद है।

सचिव बोला-‘वह तो आतंकवाद के मुद्दे पर हमेशा ही करते हैं। कभी किसी रेलदुर्घटना या जहरीली शराब पीने की घटना के समाचार सनसनी फैलाते हैं तो हम उन पर संवदेनशील बहस भी चलवाते हैं। लोग ऐसे लाते हैं कि जो तर्क कम दें बल्कि चीखें और चिल्लायें ज्यादा, साथ ही नारों को समाज सुधार का मंत्र बताने लगें।’’

प्रचारक महाराज बोले-‘नहीं, तुम समझे नहीं! नये नये प्रकार के झगड़े ले आओ। स्त्री पुरुष अमीर गरीब, पूंजपति मजदूर और शोषक और शोषित वर्ग की जंग में मजा नहीं आता। यह सब पुराना पड़ गया है।

सचिव बोला-‘‘अब झगड़े तो इसी प्रकार के ही हो सकते हैं। यह तो संभव नहीं है कि किसान और क्लर्क के बीच में युद्ध कराया जाये।

प्रचारक महाराज एक उछल गये और बोले-‘वाह, क्या आईडिया दिया है। कितना आकर्षण है इन शब्दों मे, जिसे तुम किसान क्लर्क युद्ध कह रहे हों। हां, करवाओं यह युंद्ध। अपने दाता और आका दोनों ही खुश होंगे क्योंकि इसमें दोनों का कुछ नहीं बिगड़ेगा। हमारे दाता और आका दोनेां ही खुश होंगे। जनता की खुश होगी। नया विषय और नया शीर्षक होगा ‘किसान क्लर्क युद्ध’!’

सचिव ने पूछा-‘मगर क्लर्क कोई हैसियत नहीं रखते। फाइलों पर फैसला तो बड़े लेाग ही लेते हैं। यही बड़े तो हमारी फाइलों से भी दो चार होते हैं। फाईल और धरती के बीच टेबल भी होती है इसलिये क्लर्क और किसान युद्ध नहीं हो सकता।

प्रचारक महाराज एकदम उत्तेजित स्वर में बोले-‘अब तुम खामोश हो जाओ। यहां से जाकर अपने सलाहकार फिक्सर साहब को भेजो। वही अंग्रेज मेरी बात समझेगा। अरे, तुम कुछ विचार नहीं कर सकते। देखो शहरों में अनेक ज्रगह किसानों की जमीन लेकर कॉलोनियां बसाई गयी हैं। इन कालोनियों में बड़े लोग भी रहते पर उनमें क्लर्क यानि मध्यम वर्ग अधिक रहता है। जाओ किसानों में असंतोष फैलाओ फिर क्लर्क भी आंदोलन करेेंगे। दोनो के विवाद पर बहस होगी। इस तरह नयी सनसनी बनेगी। नये मुद्दे पर बहस होगी। अपने विज्ञापन खूब चलेंगे। इससे दाता भी खुश होंगे और आका भी मजे में रहेंगे।

सचिव बोला-‘मगर इस पर पैसा खर्च होगा।’

प्रचारक महाराज बोले-‘मूर्ख कहीं के, पैसे खर्च होंगे तो होने दो। आयेंगे भी तो हमारे पास ही न। अरे, हमसे जमीन और पैसा लेकर कौन कहां जा सकता है! घूम फिरकर आना अपने पास ही है। जितना उनके पास जायेगा उतना खर्च तो आना ही है। कमाने पर भी पैसा खर्च होता है। अगर, हम ऐसा न करें तो सनसनी और मनोरंजन की वैसी सामग्री कहां से आयेगी जो विज्ञापनों के बीच में डाली जा सके। अब तुम जाओ और फिक्सर को बुलाओ।’’

सचिव चला गया और उधर से फिक्सर साहब आ रहा था।

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वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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धनी लोग गरीब और मजदूर की रक्षा न कर अपने लिए खतरे को दावत न दें-मजदूर दिवस पर विशेष हिंदी लेख


         1 मई को मजदूर दिवस पूरे विश्व में बनाया जाता है। भारत में कार्ल मार्क्स के अनुयायी इससे सार्वजनिक समारोह में उल्लास के साथ मनाते है।  आमतौर से वामपंथी और जनवादी विचारधारा से जुड़े बुद्धिमान लोग आज देश के गरीबों के लिये अनेक प्रकार के आयोजन करते हुए विश्व के पूंजीवाद पर जमकर शाब्दिक हमले करते हैं। चूंकि भारत एक श्रमप्रधान देश है इसलिये यहां कार्लमार्क्स के अनुयायी बुद्धिमानों को बहुत भीड़ देखने और सुनने  मिल जाती है। मूलतः कार्ल मार्क्स विश्व में प्रचलित धर्मों का विरोधी था।  वह कभी भारत नहीं आया इसलिये उसका धार्मिक ज्ञान सीमित था। दूसरी बात यह कि वह अध्यात्मिक ज्ञान और धार्मिक विचारधाराओं के अंतर से वह इतना परिचित नहीं था जितना एक आम भारतीय अध्यात्मिक चिंतक होता है।  उसकी नज़र में धर्म एक अफीम की तरह है जो जमकर नशा देता है पर वह यहीं  जान पाया कि पैसा, पद तथा प्रतिष्ठा का नशा भी कम बुरा नहीं है।

      वैसे तो भारतीय अध्यात्मिक चिंत्तक कार्ल मार्क्स की विचाराधारा को भारत के लिये प्रभावहीन मानते हैं पर श्रमकार्य में रत लोगों के प्रति उनकी सहानुभूति होने के कारण मजदूर दिवस मनाना उनको बुरा नहीं लगता।  दरअसल इस अवसर पर भारतीय अध्यात्म में श्रमजीवी, दरिद्र तथा लाचार मनुष्यों को सहारा देने के जो संदेश दिये गये हैं  इस दिन चर्चा का अच्छा अवसर मिलता है।

        श्रीमद्भागवगत गीता में अकुशल श्रम को हेय मानने वालों को तामस बुद्धि का माना गया है।  अकुशल श्रम  हमेशा ही मजदूर के हिस्से में आता है और उसे हेय मानने का अर्थ है कि व्यक्ति की बुद्धि तामसी है।  श्रीमद्भागवत गीता में यह भी कहा गया है कि दूसरे के रोजगार का हरण करने वाला आसुरी प्रवृत्ति का है।  यह मजदूरों के रोजगार सुरक्षा कें लिये महत्वपूर्ण बात है।  समाज में आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक सद्भाव बना रहे इसलिये दान आदि की प्रवृत्ति भी विकसित करने की बात भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में कही गयी है। मूल बात यह कही गयी है कि समाज की रक्षा गरीब तबका शारीरिक शक्ति तथा मध्यम वर्ग अपनी बुद्धि से करता है। उच्च वर्ग का यह दायित्व है कि वह इन दोनों वर्गों की रक्षा करे।

 

          विदुर नीति में अनेक महत्वपूर्ण बातें कही गयी हैं

 

                                               —————————

 

                    सम्पन्नतरमेवाचं दरिद्र भुंजते सदा।

 

                   क्षुत् स्वादुताँ जनपति सा वाद्वेषु सुदुर्लभा।

 

                 हिन्दी में भावार्थ-दरिद्र मनुष्य सदा ही स्वादिष्ट भोजन करते हैं क्योंकि भूख उनके भोजन में स्वाद पैदा करती है। ऐसी भूख धनियों के सर्वथा दुर्लभ है।

 

                    प्रावेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिनं विद्यते।

 

                  जीर्येन्त्यपि हि काष्ठानि दरिद्राणां महीपते।

 

                 हिन्दी में भावार्थ- संसार में धनियों में प्रायः भोजन करने की शक्ति नहीं होती परंतु दरिद्र काष्ट तक पचा जाते हैं।

 

                        ऐश्वमदपापिष्ठा मदाः पानमदादयः।

 

                   ऐश्वर्यमदत्तो हि नावत्तिवा विबुभ्यते।

 

                 हिन्दी में भावार्थ-शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों से भी नशा पैदा होता है पर उनसे बुरा ऐश्वर्य का नशा है। यह नशा आदमी को पथभ्रष्ट कर ही देता है।

      कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन समाज के हर वर्ग का दायित्व वैज्ञानिक ढंग से तय करता है। किसी बाहरी विचाराधारा के अनुसरण की आवश्यकता नहीं है।  एक अध्यात्मिक लेखक के रूप में हम कार्ल मार्क्स के प्रयासों की सराहना करते हैं मगर यह मानते हैं कि कहीं न कहीं उनकी विचाराधारा अव्यवाहारिक है। वह मनुष्य की मनोदशा का अध्ययन नहीं करती।  यही कारण है कि उनकी विचाराधारा के कथित अनुसरण करने के नाम पर अनेक देशों में क्रांतियां हुईं पर वहां कोई बेहतर हालात नहीं बने।  जहां पहले धार्मिक ठेकेदार सक्रिय थे वहां कथित रूप से क्रांति के ठेकेदारों ने साम्यवाद का नारा देकर सत्ता हथियाई।  उनमें अनेक राष्ट्र कालांतर में बिखर गये।  सोवियत संघ में तो कार्ल मार्क्स के अनुयायी लेनिन को पहले देवता का दर्जा मिला पर बाद में उनकी मूर्तियां ही तोड़ डाली गयीं।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार मनुष्य देह में अनेक प्रकृतियां विराजमान हैं।  जिनमें अहंकार सबसे महत्वपूर्ण है।  गरीब हो या अमीर उसमें अहंकार होता है। गरीब को अगर कहीं से धन लेना है तो वह गरीब कहलाने को तैयार होता है पर जहां से कुछ न मिले वहां वह कभी गरीब नहीं कहलाना चाहता।  हर मनुष्य अपना  स्वाभिमान बनाये रखना चाहता है।  यही कारण है कि  मजदूरों और गरीबों के नाम पर सत्ता हथियाने वाले अपने पद का अहंकार नहीं छोड़ पाते। उल्टे तानाशाही के चलते उनके ठाटबाट राजाओं से अधिक हो जाते हैं। साम्यवादी विचारक  पारिवारिक संस्कृति के विरोधी माने जाते हैं पर जहां कार्ल मार्क्स के चेलों ने सत्ता हथियाई है वहां वह अपनी ंपारिवारिक  मोह से मुक्त नहीं हो पाये और जिन सार्वजनिक पदों पर स्वयं विराजे वहां अपने बच्चों लाने का प्रयास कर रहे  हैं।  यही इस बात का प्रमाण है कि कार्ल मार्क्स की बातें कहंी न कहीं  मनुष्य के लिये अव्यवहारिक है।  उनकी विचारधारा धरती पर स्वर्ग  लाने के स्वप्न से अधिक नहीं है।

       इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम समाज के उच्च वर्ग को अपने दायित्वों से मुक्त करना चाहते हैं। कम से कम कार्ल मार्क्स की इस बात के लिये  प्रशंसा करनी तो चाहिये कि उसे विश्व के मजदूरों और गरीबों में चेतना लाने का काम किया।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन स्पष्ट रूप से यह मानता है कि धर का  बंटवारा समाज में अलग अलग रहेगा तो वह यह भी कहता है कि धनिकों को अपनी रक्षा का सार समाज की रक्षा में ढूंढना चाहिये।  उनके हित श्रमवर्ग के हित में ही अंतर्निहित हैं।  भले ही उच्च वर्ग के लोग गरीब को दान न दें पर उसे अपने परिश्रम का उचित प्रतिफल तथा सम्मान देने के साथ ही उसके लिये रोजगार के अवसर बनाये रखने का प्रयास करें।  ऐसा नहीं करेंगे तो वह स्वतः नष्ट हो जायेंगे।

       इस मजदूर दिवस के अवसर पर ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकोको बधाई।

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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कुछ क्रिकेट कुछ फिल्म-हिंदी व्यंग्य चिंत्तन


      कुछ लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि ‘आप कंप्यूटर पर इतना कैसे लिख लेते हैं? हमें कोई इसका जवाब नहीं सूझता।  सच बात तो यह है कि हमारे जैसे लोगों में इधर उधर की फालतु निंदा परनिंदा वाली बातों में समय बरबाद  करने की बजाय स्वस्थ मनोरंजन की चाहत होती है जिसके पूरा न होने पर वह स्वयं ही मनोरंजन का सृजन करने लगते हैं।  जब क्रिकेट की बातें हमारे दिमाग में भरी हुईं होती थीं उस दौर में हमारा लेखन कम हो गया था।  बाद में जब इसमें फिक्सिंग की बातें सामने आयी तो मन उचट गया।  उसी समय इंटरनेट कनेक्शन लिया था और पता नहीं यह ब्लॉगर और वर्डप्रेस के   ब्लॉग हमारे हाथ आ गये।  हमें पता नहीं था कि यह ब्लॉग हमें कहां ले जाने वाले हैं।  यकीनन वह क्रिकेट की जगह ले रहे थे।  यही कारण की इन पर हमारी शुरुआती रचनायें क्रिकेट का मखौल उड़ाने वाली थी।
      सच बात तो  है कि अब तो हम यह मानने लगे हैं कि क्रिकेट कोई खेल नहीं है वरन् यह एक व्यवसाय है।  हमने यह देखा कि जब क्रिकेट का आकर्षण चरम पर था तब अनेक जगह इसका मनोरंजन की तरह वैसे ही आयोजन किया जाता जैसे फिल्मी गानों का आयोजन होता है।  गानों के कार्यक्रम में समस्या यह होती है कि जिसे गाना आता है वही माइक पर गा सकता है और बाकी लोगों को श्रोता बनना पड़ता है।  एसे में दर्शकों को गाना न आने का मलाल तो रहता ही है। क्रिकेट ने यह सुविधा दे दी कि इसे चाहे जो इसे खेल सकता है।  यही कारण है कि कहीं स्त्री- पुरुष, कहीं अधिकारी-कर्मचारी तो कहीं मालिक-नौकर के वर्ग बनाकर अवकाश के दिन मैच होते रहे।  जैसे ही फिक्सिंग के बाद क्रिकेट का आकर्षण कम हुआ यह सब बंद हो गया।
      हमारा मानना है कि क्रिकेट का आकर्षण अब न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है।  अगर अब यह चल रहा है तो केवल टीवी चैनलों की वजह से ही इसका अस्तित्व है।  बाज़ार और प्रचार प्रबंधक मिलकर क्रिकेट को पुनः लोकप्रिय बनाने का प्रयास कर रहे हैं।  इधर एक टीवी चैनल हिन्दी में भी कमेंट्री प्रसारित कर रहा है जो शुद्ध रूप से एक व्यवसायिक प्रयास है।  वरना तो क्रिकेट वाले भला कब हिन्दी बोलते हैं।  क्रिकेट के फिल्म जैसे ही मनोरंजक व्यवसाय होने का प्रमाण यह है कि पर्दे के अभिनेता अभिनेत्रियों जहां कहीं मैदान में इनाम लेते हैं तो  अंग्रेजी में ही बोलते है।  उनकी तरह  मैदान के खिलाड़ी भी  पर्दे पर आकर अंग्रेेजी में बोलते है। जो क्रिकेट में हिट हुआ उसका किसी किसी तरह से फिल्म के साथ नाता जुड़ ही जाता है।  सुपर क्रिकेट स्टार और सुपर फिल्म एक्ट्रेस के बीच इश्क का प्रायोजन कर उसे भी भुनाने के अनेक प्रयास हम देख चुके हैं।
       बाज़ार के उत्पाद बेचने के लिये फिल्म के अभिनेता और अभिनेत्रियों के साथ क्रिकेट के खिलाड़ी भी पर्दे पर उतरते हैं।  प्रचार प्रबंधक भी इनके साथ ऐसे ही जुड़े रहते हैं जैसे कि यह उनके अपने नायक हों।  क्रिकेट के मैदान पर कंपनियों के विज्ञापन बोर्ड पूरी कहानी बयान करते हैं। इसे समझने वाला कोई पाठक अर्थशास्त्री होना चाहिये।  जब बीसीसीआई की क्रिकेट टीम कभी कभी लगातार हारने लगती है तब कुछ आम क्रिकेट प्रेमी चिल्लाते हैं कि ‘उस खिलाड़ी को हटा दो’, ’उसे कप्तानी से हटा दो’ या ‘‘इस बॉलर को टीम में क्यों नहीं लिया, उस बल्लेबाज को क्यों रख लिया’, तब हमें हसंी आती है।  अब इन आलोचकों को यह कौन समझाये कि अगर क्रिकेट के खिलाड़ियों का चयन आम लोगों की दृष्टि से होगा तो कंपनियों के उत्पाद कौन खरीदेगा और कौन बेचेगा? कोई खिलाड़ी अगर किसी विज्ञापन में बना हुआ है और टीम से हटा दिया जाये तो जो उत्पाद का नुक्सान होगा उसे कौन भरेगा? पता नहीं भारत के आम क्रिकेट प्रेमियों को यह कैसा भ्रम है कि क्रिकेट खेल उनकी वजह से चल रहा है? भले ही कुछ क्रिकेट खिलाड़ी जो अब विशेषज्ञ बन गये हैं यह दावा करते हैं कि आम आदमी के लिये क्रिकेट खेला जा रहा है पर यह सच नहीं है। हां, कुछ क्रिकेट खिलाड़ी जरूर तारीफ करने लायक हैं जो कि मानते है कि  क्रिकेट खिलाड़ियों को अच्छा खेलना चाहिए ताकि दर्शकों का मनोरंजन हो।  स्पष्टतः वह इस तर्क को ही हवा देते हैं कि यह खेल नहीं वरन् मनोरंजन है। यह अलग बात है कि अगर उनसे कहा जाये कि यह मनोरंजन है खेल नहीं तो वह उखड़ भी सकते हैं।
       भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बिगड़ते हैं तो क्रिकेट में सबसे पहले बिगड़ते हैं।  जब बनाने की बात आती है तो भी क्रिकेट मैच दोबारा खेलने से ही शुरुआत होती है।  भारत में कुछ लोग दावा करते हैं कि क्रिकेट में रिश्ते बढ़ाने से भारत पाकिस्तान की दोस्ती बढ़ेगी।  हैरानी होती है!  यह नुस्खा बीस सालों में पांच दस बार आजमाया जा चुका है पर कभी परिणाम पर खरा नहीं उतरा।  कभी कभी संगीत और फिल्म में भी इस तरह के संपर्क जोड़कर संबंध मधुर करने की  बात कही जाती है।  यह दोनों ऐसे व्यवसाय है जिनमें पैसा खूब है।  जब पाकिस्तान से भारत का रिश्ता खराब होता है तो चोट इन्हीं दो क्षेत्रों में होती है।  पाकिस्तान क्रिकेट टीम के साथ मैच न खेलने के साथ उसके गायकों और हास्य कलाकारों को मुंबई से भगा दिया जाता है।
       हमें इन चीजों से कोई लेना देना नहीं है पर  जब पाकिस्तान इन कदमों से हताश होता नज़र आता है उससे यही लगता है कि कहीं न कहीं उसके यहां के गायकों, नायकों और खिलाड़ियों के अलावा अन्य व्यवसायी भी  इससे लाभान्वित होते हैं।  इससे यह प्रमाण मिलता है कि क्रिकेट और फिल्म एक जैसे ही व्यवसाय है।  ऐसे में अगर बीसीसीआई की टीम कभी पाकिस्तान से हारती है तो वैसे ही अफसोस नहीं होता जैसे किसी फिल्म के पिट जाने पर कोई चिंता नहीं होती।  जीत जाती है तो भी हमें खुशी नहीं होती क्योंकि किसी की फिल्म हिट हो तो हमें क्या मिलता है।  क्रिकेट से हमारा ही नहीं अनेक मित्रों का मोह इतना भंग हुआ है कि अब तो वह क्रिकेट का नाम नहीं लेते पर हम जैसे लेखक के लिये यह भूलना कठिन होता है कि इस खेल ने हमारे पूरे पंद्रह वर्ष बरबाद किये। अगर हम क्रिकेट नहीं देखते तो यकीनन बहुत बड़े लेखक होते।
    पहले इस क्रिकेट ने दुःखी किया तो हमने मैच देखने बंद या कम किये पर अब तो समाचार हो या मनोरंजन चैनल वह कहीं न कहीं क्रिकेट का विज्ञापन कर रहा है।  पहले हम इच्छा से देखते थे पर अब यह जबरन हम पर थोपा जा रहा है।  पाकिस्तान से दोस्ती का तो नाम भर है, टीवी चैनलों के  विज्ञापन देखें तो पता चलेगा कि दुश्मनी को भुनाया जा रहा है।  ऐसे में चिढ आती है तब ऐसे व्यंग्य लिखने का मन करता है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

http://rajlekh.blogspot.com
 

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बड़े बोल-हिंदी कविता


बड़े बोल
अपने ही जाल में फंसा देते हैं,
जो बोले वह रोए
बाकी जग को हंसा देते हैं।
कहें दीपक बापू
प्राण शक्ति अधिक नहीं है जिनमें
वही बड़े सपने दिखाते  हैं,
चमकदार ख्वाबों से
अपनी किस्मत लिखते हैं,
मगर ज़मीन पर बिखरे कांटो के सच
उनको गर्दिश में धंसा देते हैं।

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लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior

नारों का व्यापार-हिंदी शायरी



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जमाने को बदल देने का नारा
वह रोज  सुनायेंगे,
कुछ गीत और गजलें
बस यूं ही  गुनगुनायेंगे।
कहें दीपक बापू
खुद कभी बदलने का प्रयास करते नहीं,
नियमों की जंजीरों से बंधें उनके हाथ
लाचारी जताते
वादे करते कभी नहीं थकते
किसी की झोली आस से भरते नहीं,
बहता रहेगा समय अपनी चाल से
लोग भूलेंगे, उनके घर भरेंगे माल से
इसी तरह वह नारों को हमेशा भुनायेंगे।

 

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior


http://dpkraj.blogspot.com

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लिखना और बोलना प्रभावी बनाने के लिये अध्ययन जरूरी-विशिष्ट हिन्दी रविवारीय लेख


                     अनेक लोगों का मन करता है कि वह कुछ लिखें।  कुछ लोग शेरो शायरी कर दूसरे को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। कुछ लोग अंग्रेजी कहावतों को सुनाकर यह कोशिश करते हैं कि सामने वाला आदमी उनकी बुद्धि का लोहा माने।  वैसे अपनी बात कहने में तुलसीकृत रामचरित मानस  का अध्ययन करने वालों का जवाब नहीं है।  खास अवसरों पर वह उसके दोहे सुनाकर अपने गहन अध्ययन को प्रमाणित कर देते हैं पर उसमें उनका स्वरचित कुछ नहीं होता।  समाज पर प्रभाव तो वही डाल सकता है जो स्वयं रचनाकार हो।  वैसे आजकल शेरो शायरी कर अपनी बात का प्रभावपूर्ण ढंग से कहने का रिवाज चल पड़ा है पर यह हमारे पारंपरिक वार्तालाप का कोई स्थाई भांग नहीं है। कई विषयों पर कबीर, रहीम और तुलसी की रचनायें इतना प्रभाव रखती हैं कि उनके उद्धरण उर्दू की शायरी से बेहतर प्रभावी रहते हैं।  इन सबके बावजूद यह सच्चाई है कि आदमी का मन स्वरचना की अभिव्यक्ति के लिये तड़पता है।  लिखना और बोलना  सहज लगता है   पर वह उनके दूसरे को मस्तिष्क और हªदय को अंदर तक प्रभावित कर दे ऐसी बात लिखना  या बोलना आसान नहीं है। प्रभावी लेखन और वार्तालाप के लिये आवचश्यक है कि हम दूसरे का लिखा धीरज से पढ़ें और कही गयी बात सुने।

ब्लॉग लेखन के प्रारंभिक दौर में अनेक पाठकों ने हमसे पूछा कि आप इतना लिख कैसे लेते हैं? इसका सीधा जवाब तो यह था कि हम पढ़ते बहुत हैं पर किसी को दिया नहीं!  सोचते कि अपने हर राज को बांटना जरूरी नहीं है।  सच्चाई यह है कि   जितना ज्यादा पढ़ोगे उतना ही ज्यादा लिखोगे।  जितना अच्छा सुनोगे उतना अच्छा बोलोगे।  तय बात है कि अपनी प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिये पुस्तक प्रेम और बेहतर संगत का होना जरूरी है।  मूर्खों में बैठकर गल्तियां न करना सीखा जा सकता है पर बुद्धिमानों की संगत में बिना गल्तियां किये काम करने की  मिलने वाली प्रेरणा ही असली ही शक्ति होती है।

इधर जब फेसबुक पर अपने निजी तथा सार्वजनिक संपर्क वाले लोगों को देखते हैं तो उनके अंदर अपनी अभिव्यक्ति की कभी शांत न होने वाली भूख साफ दिखाई देती है।  उनके पास कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा है। उन्होंने फेसबुक पर खाते खोल लिये हैं।  मोबाइल से फोटो खींचकर उसमें डाल देते हैं।  दूसरे की पठनीय और दर्शनीय सामग्री अपने फेसबुक पर लाने के लिये उन्हें शेयर करना पड़ता है।  कई लोग तो ऐसे हैं जो शेयर करते समय एक शब्द भी नहीं लिखते। लिखते भी है तो रोमन में हिन्दी लिखकर अपनी भूख शांत करते हैं।  ऐसे में उनकी अभिव्यक्ति की भूख साफ दिखती है। भूख और प्यास की व्याकुलता हमने स्वयं भी झेली है पर खुशी होती है यह देखकर अभिव्यक्ति के लिये कभी तड़पना नहीं पड़ता।  हिन्दी और अंग्रेजी टाईप का शैक्षणिक काल में ज्ञान प्राप्त किया और तीस वर्ष पहले कंप्यूटर से ही अपनी जिंदगी शुरु की थी।  इसलिये वर्तमान समय में बिना हिचक इंटरनेट पर लिख लेते हैं।  लिखने के विषय का टोटा नहीं रहा पर अध्यात्मिक विषयों की पुस्तकें पढ़कर चिंत्तन लिखते हुए जीवन का ज्ञान स्वतः ही आता रहा।  हमारे अध्यात्मिक विषयों पर लिखे गये पाठों को देखकर पाठक सोचते हैं कि यह कोई पुराना ज्ञानी है पर सच्चाई यह है कि लिखते लिखते ही बहुत सारा ज्ञान आ गया है।

इस ज्ञान साधना ने जीवन के प्रति विश्वास दिया पर व्यंग्य विद्या कोे छीन लिया।  अनेक बार व्यंग्य लिखने का मन करता है पर कहीं न कहीं ज्ञान उसमें बाधा बन जाता है।  व्यंग्य विषय गंभीरता के रंग में डूब जाता है।  अपने ही बचपन गुजारने के बाद जवानी में परे हुए लोगों के फेसबुक देखते हैं।  उनको हम ढूंढते हैं पर वह भुलाये बैठे है।  हम उनके पास अपने मित्र बनने का कोई प्रस्ताव नहीं भेजते।  इसका कारण यह है कि अनेक बार वह हमारे व्यंग्यों और चिंत्तनों का हिस्सा बने हैं।  दूसरी बात यह कि हमारे लेखकीय और पाठकीय संस्कारों से न उनका कोई वास्ता है और न ही हमारी इच्छा है कि वह हमसे बिना हृदय के फेसबुक से  जुड़ें।

हम अपने उन बिछड़े लोगों का एबीसी समूह बनाकर बात करते हैं। इनमें हम बी नाम से हैं।   हम अपने ही शहर में रहे पर ए और सी बाहर जाकर बसे हैं।  इंटरनेट पर फुरसत के समय बहुत दिन तक  ए नाम के व्यक्ति का फेसबुक ढूंढा पर मिला नहीं।  अब दो महीने उन्होंने बनाया तो हमारे दृष्टिपथ में आ गया। सी की स्थिति यह थी कि उनकी पत्नी का फेसबुक  मिला। उन पर सी का फोटो क्या  नाम तक नहीं था।  चेहरे से पहचाना कि यह जान पहचान वाली भद्र महिला है।  परसों  उस पर  सी का फोटो देखने को मिला।  अपनी बेटी और दामाद के साथ सी और उसकी पत्नी ने फोटो खिंचवाया और फेसबुक  पर डाला।  ए और उसके  बेटे और बहु का फेसबुक रोज देखते हैं।

उस दिन ए का फोन बहुत दिन बाद आया।  उसे किसी दूसरे आदमी का फोन नंबर चाहिये था।  उस समय उसके बेटे के फेसबुक को ही देख रहे थे जो अधिक सक्रिय है।  हमने उसे नहीं बताया कि क्या कर रहे हैं।  संभावना यह  भी है कि सी से भी अगले सप्ताह उसके शहर आने पर मुलाकात होगी पर उससे फेसबुक की चर्चा बिल्कुल नहीं करेंगे।  दरअसल इसका कारण यह है कि हमारा लिखा देखकर लोग पूछते हैं कि इसका तुम्हें मिलता क्या है?

यहां हम स्वयं को ही प्रभाहीन अनुभव करते हैं।  यह कहते हुए शर्म आती है कि हम फोकटिया हैं। लिखने का अभ्यास इतना है कि एक हजार शब्दों का लेख हम बीस मिनट में सोचते हुए लिख देते हैं।  यह सहज इसलिये होता है कि हमारी दृष्टि हमेशा समय मिलते ही पठनीय सामग्री पर चली जाती है।  यह आवश्यक है कि उसे देखकर ही हम कुछ लिखें पर कहीं न लिखने की प्रेरणा उससे ही मिलती है।  ए और सी के साथ  उनके परिवार  के सदस्यों के फेसबुक देखकर लगता है कि हम भाग्यशाली हैं कि लिखने की शक्ति मिली है।  हालांकि इसमें अच्छा पढ़ने और सुनने का भी योगदान है।

लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior


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विचारों की जगह विवाद का प्रतीक बनता जयपुर साहित्य सम्मेलन-हिंदी सम्पादकीय लेख


        जयपुर में कोई साहित्य सम्मेलन हो रहा है।  यह सम्मेलन पिछली बार भी हुआ था।  आमतौर से हमारे देश में साहित्य सम्मेलन हुआ ही करते हैं।  ऐसे साहित्य सम्मेलन हिन्दी साहित्यकारों की ही देन हैं।  ऐसा लगता है कि साहित्य और कवि सम्मेलन की  पंरपरा हिन्दी भाषा से पनपी है। एक तरह से यह विश्व को हिन्दी भाषी साहित्यकारों और कवियों की ऐसी देन है जिस पर अन्य भाषा के लोग भी चलना चाहेंगे।  हमने हिन्दी के अलावा किसी अन्य भाषा के कवि सम्मेलन या साहित्यकार सम्मेलन नहीं सुने हैं इसलिये ऐसा लिख रहे हैं।  हालांकि हिन्दी भाषा में भी वही साहित्यकार माने जाते हैं,  जिनकी किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं या फिर समाचार पत्र पत्रिका  वगैरह में काम करते हैं।  जो लोग कभी कभार प्रकाशित होते हैं फिल्म में काम करने वाला ऐसे  अतिरिक्त कलाकार की तरह माना जाता है जिसे कहीं बुलाया नहीं जाता।

       इधर इंटरनेट पर ब्लॉग आ गया है तो हमें अपने बीस ब्लॉग पत्रिका की तरह लगते हैं।  प्रत्येक ब्लॉग में इतनी रचनायें है कि वह एक किताब ही बन गयी है।  यह अलग बात है कि किसी प्रकाशक के अधीन नहीं है। हम जैसे स्वांत लेखक के लिये जहां यह अच्छी बात है वहीं प्रशंसक पाठकों को यह जानकर निराशा भी होती है कि हमारी एक साहित्यकार के रूप में कोई छवि नहीं है।  हम यहां अपने लिये कोई मान्यता नहीं मांग रहे हैं हम तो हिन्दी के कथित कर्णधारों को स्पष्ट बता रहे हैं कि अब इंटरनेट की वजह से अपनी सोच में बदलाव लायें।   हमें न मानो पर ब्लॉग लेखकों को साहित्यकार की तरह समझो।  उन्हें साहित्यकार सम्मेलनों में बुलाओ वरना तुम्हारे साहित्यकार सम्मेलन उपस्थित दर्शक और श्रोताओं के सामने पुरातनपंथी कार्यक्रम लगते हैं।  इंटरनेट पर स्वयं लिखने वाले लोगों को जब आम लोगों के सामने खड़ा करोगे तभी तुम्हारे कार्यक्रमों की छवि बनेगी।

     जयपुर के जिस सम्मेलन की बात हम कर रहे हैं उसमें किसी ब्लॉग साहित्यकार का नाम न देखकर ऐसा लगता है जैसे कि यह कोई भूले बिसरे साहित्यकारों की आपसी उठक बैठक है।  दूसरी बात यह भी पता नहीं चलती कि इस सम्मेलन की प्रमुख भाषा क्या है?  शायद अंग्रेजी  है तभी इंटरनेट के हिन्दी ब्लॉग इस पर कुछ नहीं लिख रहे।  प्रचार माध्यम भी इसकी खबर तभी देते हैं जब वहां से कोई विवादास्पद विषय उठकर सामने आता है।  जहां तक हम समझ पाये हैं वह यह कि यह कुंठित   उलटपंथी साहित्यकारों का सम्मेलन है।  पिछली बार इसमें सलमान रुशदी को बुलाकर विवाद खड़ा किया गया।  इस बार एक  बंगाली साहित्यकारा ने नक्सलादियों के सपने देखने के हक पर बयान देकर सनसनी खेज खबर बनायी तो अब एक महानुभाव ने भ्रष्टाचार में कुछ खास वर्गों के लोगों को जिम्मेदार बताकर बवाल खड़ा कर दिया।  एक महारथी ने तो भारतीय धर्मों को ही कटघरे में खड़ा किया।   ऐसे अजीबोगरीब बयान देखकर लगता नहीं कि ऐसे साहित्यकार कोई विचारवान भी हैं।

           इससे हमें साफ लग रहा है कि पश्चिम बंगाल से अब परायापन अनुभव कर रहे कुछ बुद्धिमान लोगों ने अपना ठिकाना अब जयपुर बना लिया है।   दावा तो यह हो रहा है कि महान साहित्यकारों को वहां बुलाया गया है पर उनके विचार कहीं भी उसका प्रमाण नहीं देते।  आजादी के बाद धनपतियों, पदवानों और प्रचार प्रबंधकों की कृपा से अनेक लिपिकीय नुमा लोग भी प्रतिष्ठित साहित्यकार कहलाने लगे हैं। लिपिकीयनुमा हमने इसलिये कहा क्योंकि किसी कहानी को  जस का तस उठाकर कागज पर रख देना या फुरसत हो तो  उपन्यास ही लिख डालना हमें सहज लगता है।  निष्कर्ष प्रस्तुत करना या कोई संदेश डालने की कला वाला ही हमें लेखक लगता है।

       दूसरी बात हमें यह लगती है कि अगर हम कोई रचना करते हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि जो कहें वह अपना मौलिक हो। दूसरे के संदेशों का संवाहक बनने वाला लेखक एक तरह से लिपिक ही होता है। हम अपनी सोच को स्पष्ट रूप से रखें न कि अपने शब्द दूसरे की सोच में खोट निकालने पर खर्च करें।   इतना ही नहीं जिस विषय पर लिखें उसके बारे में हमारी स्वयं की राय स्पष्ट होना चाहिये।  अपने विषय के मूलतत्वों को समझे बिना अपनी राय नहीं रखी जा सकती।  जिन उलटपंथियों ने इस साहित्यकार सम्मेलन में भाग लिया है वह स्पष्ट रूप से भारतीय अध्यात्म के विरोधी हैं।  खासतौर से मनुस्मृति के बारे में उनकी राय अत्यंत नकारात्मक है।  उनका मानना है कि मनुस्मृति निम्न वर्ग और नारियों की विरोधी है।  हम उनकी बात थोड़ी के देर के लिये मान भी लेते हैं पर इससे क्या समूची मनुस्मृति को विस्मृत किया जाये?  उसमें भ्रष्टाचार, धर्म के नाम पर पाखंड और नारियों के प्रति अनाचार की जो निंदा की गयी उस पर यह लोग कभी ध्यान क्यों नहीं देते?

        जयपुर में साहित्य सम्मेलन हो रहा है पर उत्तर भारत में उसको कोई महत्व नहीं दे रहा। यह इस आयोजन का नकारात्मक पक्ष है।  एक आम लेखक के रूप में हम जैसे लेखक अगर इस साहित्य सम्मेलन में अरुचि दिखा रहे हैं तो कहीं न कहीं इसके पीछे आयोजन की पृष्ठभूमि और क्रियाकलाप ही हैं।  आखिरी बात यह है कि भारतीय समाज को समझने के लिये लंबी चौड़ी बहस की आवश्यकता नहीं है।  केवल सांसरिक विषयों की बात करेंगे तो यहां कई कहानियां मिलेंगी। इन कहानियों के पात्रों के चरित्र पर बहस करने से कोई निष्कर्ष नहीं निकलता।  भारतीय समाज को वही समझ सकता है जो यहां के अध्यात्म को जानता है।  देश में गरीबी है पर सारे गरीब भीख नहीं मांगते।  स्त्रियों से अन्याय होता है पर सभी सरेआम रोने नहीं आती।  अमीर अनाचार करते हैं पर सभी क्रूरतम नहीं होते।  भारत में जब तक साहित्य अध्यात्म के पक्ष से नहीं जुड़ेगा तब जनप्रिय नहीं बन पायेगा। ऐसे में जयपुर जैसे साहित्यकार सम्मेलन में भाग ले रहे साहित्यकार  विदेशी विचाराधाराओं से  प्रतिबद्धता के कारण कोई अनोखी  बात नहीं कह पाते।  यही कारण है कि   अपनी किसी सकारात्मक पहल करने की नाकामी के चलते  विवादों की वजह से सम्मेलन को प्रचार दिलाने का एक सोचा समझा प्रयास करते हैं।  बाद में माफी मांगें य मुकरें यह अलग बात है।  यह सोचा समझा रवैया अपनाना साहित्यकार की छवि के प्रतिकूल है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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मानव का मन उसे भटकाता है-हिन्दू अध्यात्मिक चिंत्तन


                 मूलतः हिन्दू धर्मधर्म को एक धर्म नहीं बल्कि एक जीवन पद्धति माना जाता है।  जब हम हिन्दू समाज की बात करें तो यह बात ध्यान रखना चाहिए कि उसके धर्म ग्रंथों में कहीं भी धर्म का कोई नाम नहीं दिया गया। कहते हैं कि सनातन धर्म से ही हिन्दू धर्म बना है पर यह नाम भी कहीं नहीं मिलता।  दरअसल हम जिन भारतीय ग्रंथों को धार्मिक कहते हैं वह अध्यात्मिक हैं जिसमें तत्वज्ञान के साथ ही सांसरिक विषयों से भी संबंधित  ज्ञान-विज्ञान का  व्यापक वर्णन मिलता है।  यह अलग बात है कि उसमें तत्वज्ञान का सर्वाधिक महत्व है।

चूंकि मानव का एक मन है। वह उसे भटकाता है इसलिये अनेक बातें मनोरंजक ढंग से कही गयी हैं जिनका संदेश अनेक प्रकार की कहानियों में मिलता है। वही तत्वज्ञान के भी उनमें दर्शन होते हैं पर उसके साथ कहानियां नहीं होती।  यह अलग बात है कि अगर कोई मनुष्य इस तत्वज्ञान का समझ ले तो वह मनोरंजन का मोहताज नहीं होता क्योंकि हर क्षण वह जीवन का आनंद लेता है।  मनोरंजन की आयु क्षणिक होती है। एक विषय से मनुष्य ऊबता है तो दूसरे में रमने की उसमें इच्छा बलवती होती है।  विषयों में लिप्त व्यक्ति केवल उनसे ही मनोरंजन पाता है जबकि तत्वज्ञानी बिना लिप्त हुए आनंदित रहता है।  उसे कभी ऊब नहीं होती।

भारतीय अध्यात्म का सार श्रीमद्भागवत गीता में सारगर्भित ढंग से व्यक्त किया गया है।  उसमें कोई सांसरिक विषय नहीं पर सारे संसार की समझ उसे पढ़ने पर स्वतः आ जाती है। स्थिति यह हो जाती है कि किसी विषय में निरंतर लिप्त होने वाला आदमी अपने कार्य में इतना ज्ञानी नहीं होता जितना तत्वज्ञानी दूर बैठकर सारा सत्य जान लेता है। कर्म तथा गुण के तत्व का जानने वाले ज्ञानी हर प्रकार की क्रिया के परिणाम को सहजता से जान लेते हैं।  आम आदमी इसे सिद्धि मानते हैं पर तत्वाज्ञानियों के लिये यह ज्ञान और विज्ञान का विषय अत्यंत सहज हो जाता है।  वह अपने सिद्ध होने का दावा नहीं करते न ही किसी चमत्कार का प्रदर्शन करते हैं। धर्म उनके लिये कोई मनुष्य से परे दिखने वाला कोई विषय नहीं बल्कि चरित्र और व्यवहार का प्रमाण देने वाला एक संकेतक होता है।

पश्चिम में अनेक धर्म प्रचलित हैं पर भारत भूमि से संबंध रखने वाले धर्मों में अध्यात्म की ऐसी जानकारियां हैं जिनका वैज्ञानिक महत्व है पर अंग्रेजी के प्रभाव में फंसे भारतीय समाज ने उसे भुला दिया है।  यह अलग बात है कि यहां के लोगों में अभी भी उसकी स्मृतियां शेष हैं जिस कारण यदाकदा सच्चे साधु संतों के दर्शन हो जाते हैं। इन साधु संतों को न प्रचार से मतलब है न ही शिष्यों के संग्रह में रुचि  होती है। इस कारण लोग उनके संपर्क में नहीं आते।  इसकी वजह से धर्म प्रचार का व्यवसायिक उपयोग करने वालो संत का रूप धरकर उनके पास पहुंच जाते हैं।  इस व्यवसायिक प्रचारकों को नाम तथा नामा दोनों ही मिलता है।  अगर तत्वज्ञान की दृष्टि से देखें तो इन प्रचारकों का कोई दोष नहीं है। आम आदमी का भी दोष नहीं क्योंकि उसके पास तत्वज्ञान का अभाव है। अगर हमारे समाज में श्रीमद्भागवत गीता का पाठ्य पुस्तकों में आम प्रचलन होता तो शायद यह स्थिति नहीं होती। हालांकि यह भी केवल अनुमान है क्योंकि देखा तो यह भी जाता है कि श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान देने वाले संत भी उसमें वर्णित धर्म व्यवहार से परे ही प्रतीत होते हैं।

सच बात तो यह है कि लोग मनोरंजन के लिये मोहताज हैं और उनको बहलाने वाले धर्म, कला, फिल्म, राजनीति तथा शिक्षा के क्षेत्र में अलग व्यवसायिक प्रवृत्तियों वाले कुछ चालाक लोग सक्रिय है। अनेक जगह तो धर्म के नाम भी ऐसी गतिविधियां दिखने को मिलती हैं जिनका धर्म से कोई संबंध नहीं होता।  जिन धुनों की गीतों के लिये उपयोग किया जाता है धर्मभीरुओं के भरमाने के लिये उन्हीं पर भजन बनाये जाते हैं। संगीत मानव मन की कमजोरी तो धर्म भी मजबूरी  है उसका शिकार आम आदमी किस तरह हो सकता है इसे मनोरंजन के व्यापारी अच्छी तरह जानते हैं।  यह मनोरंजन अधिक देर नहीं टिकता। इसके विपरीत तत्वज्ञानी संसार की इन्हीं गतिविधियों पर हमेशा हंसते हुए आनंद लेते हैं।  सांसरिक आदमी मनोरंजन में लिप्त फिल्म और टीवी के साथ संगीत  में लीन होकर अपना उद्धार ढूंढता है तो ज्ञानी उसे देखकर हंसता है।  आम आदमी कल्पित कहानियों में कभी हास्य तो कभी गंभीर कभी वीभत्स तो कभी श्रृंगार रस की नदी में  बहकर मनोरंजन करता है तो ज्ञानी उसके भटकाव की असली कहानी का आनंद उठाता है।  एक सांसरिक मनुष्य और ज्ञानी में बस अंतर इतना ही है कि एक मनोरंजन के लिये बाहर साधन ढूंढता है जो क्षणिक और अप्रभावी होता है तो दूसरा अपने अंदर से ही प्राप्त कर आनंद स्थापित कर अपनी शक्ति और ज्ञान दोनों ही बढ़ाता है।

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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कागजों में फ़रिश्ते-हिंदी व्यंग्य कविता



कभी वह वह जोर से रोते
कभी हंसे जाते हैं,
सामने पर्दे पर चलते दृश्य देखकर
उनके ख्याल भी बदल जाते हैं।
कहें दीपक बापू
लेते हैं वह मुस्कराने के भी दाम
आंसु भी कौड़ियों के भाव नहीं बहाते
अपनी हर अदा पर लेते कभी दान कभी चंदा
ज़माने का भला का दावा भी कर जाते,
बेसहारों को दर्द बांटने रहो
मशहूर होने का ख्याल छोड़कर
अब दुनियां का दस्तूर बन गया
करते हैं जो लोग जज़्बातों का व्यापार
कागजों में फरिश्तों की तरह
अपना नाम भी वही लिखा पाते हैं।
————————————————–
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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आम आदमी के नाम का सहारा-हिंदी व्यंग्य


       आम आदमी अब एक लोकप्रिय प्रचलित शब्द हो गया है।  जो लोग राजनीति, साहित्य, कला, फिल्म, पत्रकारिता, आर्थिक कार्य और समाज सेवा में शिखर पुरुष न होकर आम आदमी की तरह सक्रिय हैं उन्हें इस बात पर प्रसन्न नहीं होना चाहिए कि उनकी इज्जत बढ़ रही है क्योंकि उनका आम आदमी होना मतलब भीड़ में भेड़ की तरह ही है।  हां, एक बात जरूर अच्छी हो गयी है कि अब देश में गरीब, बेरोजगार, बीमार, नारी, बच्चा आदि शब्दों में समाज बांटकर नहीं बल्कि आम आदमी की तरह छांटा जा रहा है।  वैसे कुछ लोग जो टीवी के पर्दे पर लगातार दिखने के साथ ही अखबारों में चमक  रहे हैं उनको आम आदमी का दावा नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे प्रचार माध्यमों की खास आदमी के नाम से लाभ उठाने की मौलिक प्रवृत्ति बदल नहीं रही। अगर वह किसी कथित आम आदमी के नाम को चमका रहे हैं तो केवल इसलिये कि उनके बयानों पर बहस का समय विज्ञापन प्रसारण में  अच्छी  तरह पास होता रहा है।
         सच बात तो यह है कि हर आम आदमी  समाज के सामने खास होकर चमकना चाहता है। हाथ तो हर कोई मारता है पर जो आम आदमी में गरीब, बीमार, बेरोजगार  तथा  अशिक्षित जैसी संज्ञायें लगाकर भेद करते हुए उनके कल्याण के नारे लगाने के साथ ही नारी उद्धार की बात करता है उनको ही खास बनने का सौभाग्य प्राप्त हो्रता है।  अब लगता है कि आम आदमी का कल्याण करने का नारा भी कामयाब होता दिख रहा है।
        उस दिन अकविराज दीपक बापू सड़क पर  टहल रहे थे। एक आदमी ने पीछे आया और  नमस्ते की तो वह चौंक गये।  उन्होंने भी हाथ जोड़कर उसका अभिवादन किया।  आदमी  ने कहा‘‘ क्या बात है आज अपना पुराना फटीचर स्कूटर कहां छोड़ दिया?’’
           दीपक बापू चौंक गये फिर बोले-‘‘हमने आपको पहचाना नहीं।  हम जैसे आम आदमी के साथ आप इस तरह बात कर रहे हैं जैसे कि बरसों से परिचित हैं।’’
           वह आदमी उनके पास आया और उन्हें घूरकर देखने लगा फिर बोला-‘माफ कीजिऐ, मैंने आपको फंदेबाज समझ लिया। वह मेरा दोस्त है और आपको गौर से नहीं देखा इसलिये लगा कि कहीं आप हैं।  आपने अभी यह कहा कि आप आदमी हैं, पर कभी आपको टीवी पर नहीं देखा।’’
         दीपक बापू हंसे और बोले-‘‘आपकी बात सुनकर हैरानी हो रही है।  एक तो आपने पुराने फटीचर स्कूटर की बात की उसे सुनकर मुझे लगा कि आप शायद परिचित हैं पर पता लगा कि मेरे जैसा भी कोई आम आदमी है जिसे आप जानते हैं।  रही बात टीवी पर दिखने की तो भई उनके पर्दे पर हमारे जैसे आम आदमियों के लिये भला कोई जगह है? इस तरह तो मैंने भी कभी आपको टीवी पर नहीं देखा। आप भी आम आदमी ही है न?’’
      वह आदमी बोला-‘‘मुझे कैसे देखेंगे? मैं तो नौकरी करता हूं!  आजकल टीवी पर आम आदमी की बहुत चर्चा है सोचा शायद कभी आप वहां पर अवतरित हुए हों!  आजकल आम आदमी टीवी पर ही दिखते हैं।’’
        दीपक बापू हंसकर बोले-‘‘हां, हम भी देख रहे हैं पर वही  लोग पर्दे पर अपने को आम  आदमी  की तरह चमका सकते हैं जिन पर खास लोगों का आशीर्वाद हो।  आप और हम जैसे आम आदमी तो इसी तरह सड़कों पर घूमेंगे।’’
          वह आदमी बोला-‘‘क्या बात कर रहे हें? मैं आम आदमी नहीं नौकरीपेशा आदमी हूं।  किसी ने सुन लिया तो मेरी शामत भी आ सकती है। यह आम आदमी की पदवी आप अपने पास ही रख लीजिऐ।’’
      वह तो चला गया पर दीपक बापू थोड़ा चौंक गये।  आम आदमी का मतलब क्या बेरोजगार, लाचार, गरीब और कम पढ़ा लिखा होना ही है?  सच बात तो यह है कि समाज को एक पूरी इकाई मानकर बरगलाना बहुत कठिन काम है इसलिये गरीब-अमीर, व्यापारी-बेरोजगार, स्त्री-पुरुष, तथा स्वस्थ-बीमार का भेद कर कल्याण करने के नारे लगते हैं।  इसका कारण यह है कि छोटे वर्ग के आदमी को यह खुशफहमी रहती है कि बड़े वर्ग से लेकर उसका पेट भरा जायेगा।  यह होता नहीं है।  अभी तक आम आदमी को लेकर कोई वर्ग नहीं बना था।  अमीर, पुरुष, और शिक्षित वर्ग में कोई भी आम आदमी नहीं हो सकता है यह भ्रम फैलाया गया है।  वह वर्ग जो अपनी मेहनत से कमा कर परिवार का पेट भरता है उसका तो दोहन करना ही है पर जो उसके घर में जो बेरोजगार पुत्र या पुत्री, गृहस्थ कर्म में रत स्त्री और घर में रहने वाले बड़े बुजुर्ग का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने के लिये उनके भले के नारे लगते रहे।  कमाऊ पुरुष एक तरह से राक्षस माना गया जो अपने पर आश्रित लोगों का शोषण करने के साथ उपेक्षा का भाव रखता है।  सड़क, कार्यालय या दुकान पर वह जो परेशानियां झेलता है उसकी चर्चा कहीं नहीं होती।
        वह उपेक्षित आम आदमी था। न ऐसे लोग कभी भले करने के नारों पर भटकते हैं न ही उसे यकीन था कि कोई उसके साथ है।  अब जबसे आम आदमी का नाम टीवी पर आने लगा है उससे सभी चौंक गये हैं।  इधर अंतर्जाल पर भी लाखों आम आदमी मौजूद है।  उनके ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर पर खाते हैं पर केवल खाताधारी है। उनको लेखक, कवि, कार्टूनिस्ट और पत्रकार का दर्जा प्राप्त नहीं है। जिनको मिला है वह खास लोगो की कृपा है।  ऐसा लगता है कि पहले गरीब, बेरोजगार, बीमार, बुजुर्ग और महिलाओं के कल्याण का नारा अब बोरियत भरा हो गया लगा है इसलिये प्रचार माध्यमों ने आम आदमी बनाये हैं।  अपने आम आदमी!  जिनके ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर पर खाते हैं पर उनको वैसा ही सम्मान मिल रहा है जिसे कि अभिनय, राजनीति, फिल्म, टीवी और समाचार पत्रों के शिखर पुरुषों को प्राप्त है।  खास लोग अगर इंटरनेट पर अपने छींकने की खबर भी रख दें तो वह टीवी पर दिखाई जाती है।  आम आदमी जो शब्दिक प्रहार कर रहा है उसकी चर्चा कोई नहीं कर रहा। यह आम आदमी नाम जहाज प्रचार के समंदर में केवल उन्हीं को पार लगायेगा जो कि खास आदमी से आशीर्वाद लेकर उसमें चढ़ेंगे।  ऐसे में दीपक बापू जो स्वयं को आम आदमी कहते थे अब कहने लगे हैं कि हम तो ‘‘शुद्ध आम आदमी है।’’
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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