आखिर कब तक यह आर्थिक मंदी रहेगी-आलेख


कहने को किसी भी देश के शेयर बाजारों के सूचकांक को उसकी आर्थिक ताकत का परिचायक माना जाता है पर कई लोग इसका समर्थन नहीं करते क्योंकि आम आदमी के जीवन यापन के लिये जो वस्तुऐं कृषि के माध्यम से प्राप्त होती हैं उसका इससे अधिक संबंध नहीं होता। अन्य देशों की बात छोड़ कर अगर भारत की बात की जाये तो आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था को कृषि उन्मुख माना जाता है। भले ही प्रचार माध्यम शेयर बाजारों के उतरा चढ़ाव पर लंबी चौड़ी बहसें कर रहे हों पर यह सच सभी जानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था का इससे अधिक लेना देना नहीं हैं। उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी से से कई लोगों को रोजगार मिला है पर फिर भी देश में भारी बेरोजगारी है और उसके बावजूद यह देश अपनी कृषि के सहारे चल रहा है।
भारत के शेयर बाज़ार में मंदी या कई लोगों के चैन को छीन लिया है और जिन छोटे लोगों ने अपनी बड़ी बचतों (यह अलग बात है कि बड़े लोगों के हिसाब से वह भी छोटी होती है) को इनमें अधिक लाभ से लगा दिया था वह भी अब ट्रस्ट हैं। हालत यही है कि कई ऐसे लोग भी भी अपने व्यथा कथा कह रहे हैं जिन्होंने अपना विनिवेश चुपचाप कर नक्सा कागज़ एक तरफ रख दिए थे क्योंकि यह उनके लिए एक तरफ रखे गए पैसे की तरह था जिसका कम से कम तात्कालिक रूप से करने वाले नहीं थे।

कई व्यवसायी पुरुषों तथा कामकाजी महिलाओं ने अपने परिवार को जानकारी देने की आवश्यकता अनुभव किये बिना इन म्यूचल फंडों में विनिवेश किया था। पिछले कुछ समय से लोगों का रुझान म्यूचल फंडों में अपनी बचत लगाने की तरफ बढ़ रहा था। कारण था इसमें कुछ कपनियों के भुगतान के तत्काल बाद ही लाभांश के रूप में एक निश्चित रकम की प्राप्ति। म्यूचल फंडों के बेचने वाले एजेंट पुराने साल के लाभांश को नए आवेदनों पर दिलवाने के नाम पर लोगों को इस तरफ खींचते रहे। सच तो यह है कि विनिवेशकों को १५ से २५ प्रतिशत तक की राशि लगाने के तत्काल बाद प्राप्त भी हुई।

इन म्यूचल फंडों में उन लोगों ने भी पैसा लगाया जो शेयर बाजार पर भरोसा नहीं करते थे। फिर इसमें कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के म्यूचल फंडों की उपस्थिति ने भी अन्य कंपनियों के म्यूचल फंडों के प्रति लोगों में विशवास कायम किया। कुल मिलाकर म्यूचल फंडों को इतना आकर्षक बनाया गया जिससे इसके साथ नए विनिवेशक भी जुड़े जो पहला शेयर बाजार से दूर थे। वैसे तो इन म्यूचल फंडों में पैसा उन्ही लोगों ने ही लगाया है जिनके पास बचत की राशि अतिरिक्त रूप में थी और अब बाजार के गिरने से उनको कोई अधिक फर्क नहीं पडा क्योंकि उनकी पाने नियमित आया यथावत है पर वह अपने म्यूचल फंडों से वह जिस प्रकार के अतिरिक्त लाभ की आशा कर रहे थे वह प्राप्त नहीं हुआ। ऐसे विनिवेशक अधिकतर नौकरी पेशा हैं और अतिरिक्त लाभ की आशा पूर्ण न होने से निराश जरूर हैं पर मानसिक रूप से हताश बिलकुल नहीं हैं क्योंकि उनके नियमित खर्चों के भुगतान में उनको कोई परेशानी नहीं है। हाँ जिन लोगों ने इस चक्कर में अपनी नौकरी छोडी या सेवानिवृत्ति के बाद वहां से पैसा धन इन म्यूचल फंडों में लगाया उनके लिए हालत बहुत दु:खदायी हैं।

इसके अलावा जिन लोगों ने अपने छोटे व्यवसाय बंद कर नियमित रूप से इसमें अधिक धन पाने की आशा लगाई उनके लिए यह समय संकट का है। जिन लोगों ने रातों रात अमीर होने की आशा में अपना सब कुछ दाव पर लगा दिया उनके लिए तो हालत बदतर हैं-क्योंकि न तो अब कहीं से कोई उनको लाभांश प्राप्त हो रहा है और न उनके म्यूचल फंडों की पूँजी उतनी है जितनी उन्होंने लगाई थी। जो लाभांश उनको पहले प्राप्त हुआ था उन्होंने अपने रहन सहन का स्तर बढाने में उसे लगा दिया।
अब इस मंदी के बारे में विचार करें तो यह एक कृत्रिम मंदी लगती है क्योंकि आखिर इस देश को औद्योगिक सम्राज्य चंद लोगों के हाथ में ही है और वह सभी मिलकर किसी खास रणनीति के तहत बाजार को अपने हिसाब से चलाने का मादा रखते हैं। जिन लोगों ने अपना अतिरिक्त धन म्यूचल फंडों में लगाया है वह चिंतित अवश्य हैं पर इसके बावजूद वह उनको औने पौने दाम पर बेचने के लिये तैयार नहीं। वह जानते हैं कि आगे पीछे फिर इनके दाम बढ़ने हैं। अगर उनकी पूरी रकम डूब जाती है तो वह इसके लिये तैयार दिखते हैं पर ऐसा नहीं होगा क्योंकि उसके बाद देश के उद्योगपति छोटे निवेशकों का विश्वास हमेशा के लिये खो बैठेंगे और जिनकी इस बाजार में दिलचस्पी हो उन्हें यह समझना चाहिये कि भारत की बैंकों का मुख्य आधार उसके छोटे बचत कर्ता ही रहे हैं-भले ही देश के अर्थशास्त्री उसकी परवाह करते हुए नहीं दिखते।

यह छोटे निवेशक आज के औद्योगिक स्वरूप का आधार हैं। वह अगर लाभांश लेते हैं तो फिर उससे इन्हीं कंपनियों का सामान भी खरीदते हैं। अगर देश के उद्योगपति इस तरह के खेल में अगर उनकी रकम डुबा बैठे तो भविष्य में संकट उनके लिये ही गहराने वाला है-शारीरिक और बौद्धिक श्रम कर कमाने वाला निवेशक तो फिर भी दोबारा कमा लेगा।
अमेरिका की मंदी का भारत में प्रभाव सच कम अफसाना अधिक लगता है। आखिर भारत की कृषि और उद्योग का अपना एक आधार है। उसके निवेशकों पर यहां के जो उद्योग निर्भर हैं उनका तो उबरना कठिन हो सकता है पर जिनके आधार भारत के छोटे निवेशकों पर टिका है वह फिर उबर आयेंगे।

अभी अनेक कंपनियों ने अपने लाभांश की घोषणा नहीं की है। उनके अगर आगे निवेश चाहिये तो यह तो कभी न कभी करना ही होगा और तब बाजार उठेगा। इतिहास में एक बार बाजार जबरदस्त ऊपर उठा था तब किसी के समझ में नहीं आया था पर पोल बाद में खुली थी। उस समय भी कई निवेशक दिवालिया हो गये थे। आज की मंदी भी कम रहस्यमय नहीं है। भारतीय बाजारों मे सामान की खरीद फरोख्त निरंतर हो रही है। किसी कंपनी ने अपने उत्पाद या सेवा का मूल्य कम नहीं किया तब आखिर यह किसी तरह की मंदी को एक सच्चाई कैसे स्वीकारकिया जाये। बाजार में आम उपभोक की वस्तुओं का मूल्य सूचकांक निंरतर बढ़ रहा है तब शेयक बाजार के सूचकांक का गिरना किसी को भी रहस्यमय लग सकता है। इसमें वह बड़े निवेशक अपना फायदा ले सकते हैं जो बेचने के लिये मजबूर निवेशक से उसका निवेश खरीद लेंगे।

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Advertisements
Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: