तस्वीर के पीछे-व्यंग्य


युद्ध और आंतक पर बहुत सारी सामग्री टीवी चैनलों, समाचार पत्र पत्रिकाओं और अंतर्जाल पर पढ़ने को मिल जाती है। सभी में तमाम तरह के वाद विवाद और प्रतिवाद पढ़ने, देखने और सुनने को मिल जते हैं। मगर ऐसा लगता है कि कुछ छूट रहा है। विद्वान गण केवल जो दिख रहा है या दिखाया जा रहा है उसी पर ही ध्यान केंद्रित किये हुऐ है। अपनी तरफ से न तो कोई उनका अनुमान लगाते हैं और नहीं कोई राय रखते हैं। यह बात केवल हिंदी में दर्ज सामग्री पर हो रही है। इसलिये अंग्रेजी पढ़ने और लिखने वाले शायद इस बात से इतफाक न रखें कि सब कुछ प्रायोजित लग रहा हैं । ऐसा लग रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही सब कुछ ऐसा प्रायोजित किया जा रहा है कि विद्वान लोग उसे देखकर ही लिखते हैं।

इस लेखक को गुरूजी ने जो ज्ञान दिया था। वह यह था कि ‘जो तस्वीर दिखाई जा रही है उसके पीछे जाकर देखो। तस्वीर सामने से आकर्षक होती है इसलिये लोग उसे दिखाते है पर उसके पीछे जो पुट्ठा या कागज होता है वह नहीं दिखाते। अगर तुम लेखक बनना चाहते हो तो किसी समाचार, घटना या दृश्य को देखकर उस पर विचार तो करो पर फिर उसके पीछे क्या है या क्या हो सकता है इस पर भी नजर डालो।’

अब हम जैसा अल्पबुद्धि वाला आदमी जो हमेशा ज्ञान की तलाश में रहता है अगर उसे लगे कि यह बात ज्ञान की तो गांठ से बांध लेता है। सो बांध ली। अपने लिखे पर कई बार हास्यास्पद स्थिति का सामना भी करना पड़ता है। लोग कटाक्ष करते हैं कि ‘यार बहुत गहराई से सोचते हो।’
तब यह बात मजाक लगती है क्योंकि उस सोच में कहीं गहराई नहीं होती । बस! होता है जो सामने दिख रहा है उसके पीछे झांकने की कोशिश भर होती है। युद्ध और आंतक पर पढ़ पढ़ कर हमेशा ऐसा सोचते हैं आखिर कौनसी चीज है जो दिख नहीं रही और दिख रही हो तो फिर उसके पीछे और क्या हो सकता है। अपने साधन सीमित है सो कही उड़कर अमेरिका या इजरायल तो जा नहीं सकते। आम आदमी है सो बड़े संपर्क कुछ बताने के लिये उपलब्ध नहीं है। सो अपना दिमाग चल गया तो बस चल गया।

एक ब्लाग पर एक विद्वान महोदय का लेख पढ़ लिया। इजरायल और फलस्तीन संधर्ष पर था। नाम वगैरह इसलिये नहीं दे रहे क्योंकि जो लिख रहे हैं वह मूर्खतापूर्ण ही लग रहा है। उसमें लिखा गया था कि गाजापट्टी की पंद्रह लाख जनता परेशान है। वहां गरीबी है और उनकेत अपने संगठन हमास में दिलचस्पी न होने के बावजूद आम लोग इजरायल के हमले झेल रहे हैं। उसमें इजरायल और अमेरिका दोनों को कोसा गया है।

हम सोच रहे थे कि आखिर पूरे विश्व में आतंक के विरुद्ध यह दोनों देश ही क्येां आका्रमक होते दिख रहे है? दूसरा कोई होता है तो उनको सांप सूंघ जाता है। सो दिमाग धूमने लगा। अरे यह क्या? हमारी एक बात पर तो नजर गयी नहीं। अमेरिका और इजरायल दोनों आधुनिक हथियारों के निर्माता और विक्रेता हैं। जब अमेरिका की किसी से खटकती है या वह स्वयं ही खटकता है तो पचहत्तर हजार फीट ऊपर से बमबारी करता है। हजारों मील दूर से मिसाइलें फैंकता है। इजरायल भी गाहे बगाहे फलस्तीन पर बरसता है। कहीं यह तो नहीं कि यह अपने लिये हथियारों की प्रयोगशाला चुनते हों। अमेरिका तो इधर उधर परमाणुरहित देश ढूंढता है पर इजरायल को तो स्थाई रूप से प्रयोगशाला मिली हुई है।

शक की गुंजायश पूरी है। उस दिन एक हिंदी में बेवसाइट देखी। उसमें अमेरिका के कुछ प्रोफेसरों ने अपने विचार कुछ इसी तरह दिये थे। उस समय लगा कि वाकई वहां बोलने की आजादी है क्योंकि उनके विचार हमारे देश के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों से मेल खाते हैं। वह अपने ही देश की इराक की नीतियों से संतुष्ट नहीं थे। हमारे देश में देशभक्ति से ओतप्रोत होने के कारण बुद्धिजीवी ऐसे विचार रखने से कतराते हैं और जो रखते हैं तो उनसे लोग नाराज हो जाते है। हालांकि ऐसे नाराज लोगों में हम स्वयं भी होते हैं। उस लेख को पढ़कर लगा कि वाकई किसी के विचार लिखने पर उत्तेजित नहीं होना चाहिए। वैसे विश्व क अनेक विद्वान अमेरिका पर ऐसे आरोप लगाते हैं कि वह युद्ध के लिये वजहें बनाता है।

बहरहाल इन दोनों देशों की ताकत भी कम नहीं है। अपने देश में ही इन दोनों देशों के ढेर सारे समर्थक है। हम तो किसी के न विरोधी हैं न समर्थक पर जो दिख रहा है उसके पीछे जाकर देखते हैं तो पाते हैं कि जो देश हथियार निर्यातक देश हैं उनकी गतिविधियों पर दृष्टिपात करना चाहिये। इजरायल आतंकवाद से प्रभावित अनेक देशों को अपने हथियार और उपकरण बेच रहा है। उसकी तकनीकी क्षमता भी अब काफी प्रसिद्ध हो गयी है। इतनी कि हाल में अखबारों में एक चर्चा पढ़ने को मिली कहीं मृत आंतकवादियों के शव का परीक्षण कर यह बताया जा सकता है कि वह किस देश के किस प्रांत और शहर का है-ऐसी तकनीकी इजरायल ने बनाई है। तय बात है कि वह पहले परीक्षण कर बतायेगा और फिर उसे बेचेगां। अब अगर विश्व में आतंकवाद ही नहीं होगा तो उसके हथियार और तकनीकी कौन खरीदेगा? संभव है कि फलस्तीन में वह इसलिये उग्र होता हो कि पूरे विश्व में उसकी प्रतिक्रिया हो और लोग दूसरी जगह आतंकवाद फैलायें। प्रसंगवश दुनियां में आंतक का पहला शिकार इजरायल ही था और पहला आतंकवादी भी वहीं का था। ओलंपिक में इजरायल के फुटबाल टीम के सात सदस्यों की हत्या करने वाला कार्लोस कभी इजरायल के हाथ नहीं आया या उसने ऐसी कोशिश ही नहीं की-कहना मुश्किल है। मगर उसके बाद हम देख रहे हैं कि अमेरिका हो या इजरायल अपने जिन जाने पहचाने दुश्मनों से लड़ने निकलते हैं वह कभी उनक हाथ नहीं आते पर वह बढ़ते ही जाते हैं और मरते हैं उनके दुश्मनों के अनुयायी-अब वह होते हैं या नहीं यह अलग बात है।

यानि हम उनके दुश्मनों पर भी उतनी ही नजर डालें। उस लेख में चर्चा थी कि हमास ने अपने यहां ईरानी मिसाइलों का जमावड़ा किया और वह इजरायल पर बरसाईं। हमास एक मामूली संगठन है और अगर वह इजरायल पर हमला करता है तो उस पर भी शक तो होगा ही। मारे गये तो आम लोग पर हमास के नेताओं का क्या हुआ? क्या यह आंतकवाद और युद्ध किसी संाठगांठ का नतीजा है। ईरान की तकनीकी कोई अधिक प्रभावी हो ऐसी जानकारी नहीं है। उसकी मिसाइलें लेकर हमास ने अगर इजरायल पर हमला किया तो संदेह होता है कि कहीं दोनों तरफ से कमीशन तो नहीं खाया। एक तरफ ईरान ने कहा हो कि जरा हमारे उत्पाद का उपयोग कर देखो कि उनका क्या प्रभाव होता है। इजरायल तो खैर स्थाई दुश्मन( भले ही उसने फिक्स किया हो) है ही। शक इसलिये होता है कि नये साल में पूरे विश्व में इजरायल की आक्रामता की चर्चा होती रही। हमने कुछ ब्लाग पढे हैं जिनमें तमाम तरह की घटनाओं और दुर्घटनाओं की तारीख पर ही सवाल उठाया जाता है। ऐसा कहने वाले कहते हैं कि आप देखिये यह घटनायें तभी होती हैं जब अमेरिका में सुबह होती है दूसरा यह कि उनका अवकाश निकट होता है। वर्ष पुराना होने और नये पर आने के बीच कुछ ऐसा होता है जो अमेरिका और इजरायल के लोगों में चर्चा का विषय होता है-कहने का मतलब है कि यह ब्लाग लिखने वाले भी पता नहीं क्यों अमेरिका और इजरायल के लोगों को मानसिक खुराक देने के लिये समाचार प्रायोजित करने का संदेह व्यक्त करते हैं।
नहीं यह केाई आरोप नहीं हैं। समझ में यह बात नहीं आती कि आखिर क्या यह युद्ध और आतंक भी कहीं फिक्स तो नहीं होते? क्योंकि यहां जो खलनायक हैं वह अमरत्व प्राप्त कर लेते हैं और कहीं न दिखाई देते हैं न पकड़ाई आते हैं। अगर मर खप भी जायें तो कई वर्षों तक उनके अनुयायी उनको जीवित बताकर माल बटोरते रहेंगे। अगर कोई अन्य देश लड़ने को तैयार होता है तो यह उसकी मदद को भी नहीं जाते भले ही वह हथियार खरीदता हो। कहीं ऐसा तो नहीं यह दिखाते कोई हथियार हों और बेचते कोई और हों। अगर इनसे हथियार खरीदने वाला देश किसी अन्य देश से उलझ गया और हथियार तयशुदा गारंटी के अनुरूप कारगर नहीं हुए तो पोल खुल जाने का खतरा इनको सताता हों। इस देश में पूराने लोगों को आज भी कार्लोस की याद है और वह आखिरी तक फ्रंास में रहा। इजरायल ने उसे वापस लेने का कोई गंभीर प्रयास किया हो ऐसा याद नहीं आतां अमेरिका के शत्रू भी अभी तक पकड़ से बाहर हैं।

कभी कभी तो यह लगता है कि जिस तरह विश्व में पूंजीपति और हथियार कंपनियां ताकतवर है उनके लिये तो एक तरह से अपने व्यवसाय के लिये वास्तविक फिल्में बनाना आवश्यक हैं। इसलिये वह नायक और खलनायक प्रायोजित करती हैं और दुनियां भर के बुद्धिजीवी जो फिल्म नहीं देखते वही उनके लिये समीक्षक हो जाते हैं। कुछ लोग नायक के करतब देखकर ताली बजाते हैं तो कई खलनायक के प्रति सहानुभूति जताते हैं। सैट पर नायक और खलनायक का अभिनय करने के दौरान आपस में लडते हैं फिर एक हो जाते हैं। फिल्मी समीक्षक उनके अभिनय पर समीक्षायें लिखते हैं। अभी अमेरिका में नये नायक का आगमन हो रहा है कुछ विद्वान तो यही कह रहे हैं कि वह भी तयशुदा पटकथा के अनुरूप चले इसलिये ही यह सब हो रहा है। सच क्या है? कोई नहीं जानता। अब हमारा सोच पता नहीं विद्वतापूर्ण है कि मूर्खतापूर्ण यह नहीं जानते पर तस्वीर के पीछे जाकर द्रेखते हैं तो ऐसे ही ख्याल आते हैं।
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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