चीन के प्रचार माध्यमों पर तो हंसा जा सकता है-आलेख


इसलिये कहते हैं कि दूसरे के अपमान पर कभी नहीं हंसना चाहिये क्योंकि स्वयं को भी कभी ऐसी स्थिति का सामना करने पर दूसरों का हंसने का अवसर मिल सकता है। चीन के प्रधानमंत्री बेन जियाबाओ पर लंदन के कैम्ब्रिज विश्वविद्याालय में एक कार्यक्रम के दौरान एक व्यक्ति ने उनकी तरफ अपना जूता उछाल दिया। उसने उन पर तानाशाह होने का आरोप लगाया। देखा जाये तो जूता यहां लोकतंत्र की हिमायत में फैंका गया पर लोकतांत्रिक व्यवस्था का सच्चा हिमायती कभी इस तरह जूते फैंकने का समर्थन नहीं करेगा।

इस आलेख का उद्देश्य जूता फैंकने की घटना का समर्थन या विरोध करना नहीं है बल्कि जिस तरह लोग बेहयायी की घटनाओं पर अपनी सुविधानुसार विश्लेषण कर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं उस पर दृष्टिपात करना ही है। कहीं बेहयायी पूर्वक जूता फैंकना उनको सम्राज्यवाद के गाल पर तमाचा जड़ना लगता है तो कहीं उनको लोकतांत्रिक प्रतीक दिखाई देता है। जूता फैंकना गलत है पर कथित रूप से सम्राज्यवाद विरोधी-भले ही वह स्वयं भी कम सम्राज्यवादी नहीं होते-किसी लोकतंात्रिक देश के राष्ट्रप्रमुख पर जूता फैंकने का समर्थन सीधे तो नहीं करते पर जूता फैंकने वाले की भावनाओं पर ध्यान अधिक केंद्रित करते हैं। वर्तमान विश्व के सभ्य समाज में जूता फैंकने की घटना का सीधे समर्थन तो कोई भी कर ही नहीं सकता पर पर कुछ लोगों द्वारा शब्दों की हेराफेरी से उसको सही साबित करने के प्रयास भी कम नहीं होते।

जब कुछ समय पूर्व इराक मेंं अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्जबुश पर जूता फैंका गया था तब चीन के प्रचार माध्यमों ने उसे हाथों हाथ लिया था। चीन के प्रचार माध्यम सरकार के नियंत्रण मेंे हैं और यह संभव नहीं है कि वहां के कर्णधारों की तरफ से इसका इशारा न हो। अंतर्जाल पर हिंदी ब्लाग लेखक अपने पाठों में बताते हैं कि चीन में तो अंतर्जाल पर चीनी भाषा में ब्लाग लिखने वालों को भारी रकम मिलती है और वह अन्य भाषाओं के ब्लाग लेखकों से अधिक आय अर्जित करते हैं क्योंकि सरकार उनको प्रायोजित करती है। मतलब चीन की सरकार ने अंतर्जाल पर भी अपने देश का झंडा फहराने का बंदोबस्त कर लिया हैं। जार्ज बुश पर जूता फैंकने के बारे में चीनी ब्लाग लेखकों की प्रतिक्रिया भी अपने प्रचार माध्यामों से अलग नहीं थी। सीधी भाषा में बात करें तो चीन ने सरकारी तौर पर गैरसरकारी क्षेत्रों को जार्ज बुश पर जुता फैंकने की घटना पर हंसने का अधिकार दिया जिसका खूब उपयोग किया गया गया।

मगर अब क्या हुआ? जो जानकारी विभिन्न समाचार पत्रों से मिली है उससे हैरानी तो नहीं होती पर इतना जरूर कहना है कि ‘भई, दूसरे के अपमान पर हंसना नहीं चाहिये।‘ चीन के किसी भी प्रचार माध्यम में इस घटना का जिक्र नहीं हैं। उनके प्रधानमंत्री पर जूता फैंका गया यह बात वहां किसी ने अपने लोगों के सामने नहीं रखी। मगर कुछ हुआ था इससे छिपाना कठिन था सो ‘भाषण में व्यवधान’ का उल्लेख किया गया। शायद यह भी नहीं होता अगर ब्रिटेन ने माफी नहीं मांगी होती। शायद तब भी वहां के प्रचार माध्यमों ने खामोशी अख्तियार कर ली होती पर चीन ने इस कथित व्यवधान पर ब्रिटेन से कड़ा प्रतिवाद किया था और तभी उसने माफी मांगी यह वहां के लोगों को बताना जरूरी था। ब्रिटेन से विरोध जताने के चीनी प्रयास से वहां की जनता के मन में वहां के कर्णधारों की मजबूत व्यक्तित्व की छबि बनी इसलिये यह प्रसारण जरूरी था। जनता अधिक नाराज न हो इसलिये ब्रिटेन की माफी बतानी भी जरूरी थी। मगर जूता फैंका गया………………..इसे वह छिपा गये। प्रचार माध्यमों पर सरकारी नियंत्रण कितना तगड़ा है यह सभी जानते हैं। इसका मतलब यह है कि जब जार्जबुश के साथ बदतमीजी की गयी और चीनी प्रचार माध्यमों ने उसका खूब मजा लिया उससे यह साफ जाहिर होता है कि सरकारी इशारा उनको इसके लिये प्रेरित कर रहा है। अगर उस समय अमेरिका उससे कहता तो वहां के कर्णधार यही कहते कि यह तो मीडिया है इसकी स्वतंत्रता पर हम रोक नहीं लगाते।
चीन ने चाहे कितनी भी प्रगति की है और वह विश्व में दूसरे देशों से मधुर संबंध बनाना चाहता है पर उस कोई यकीन नहीं करता और करना भी नहीं चाहिये। चीनी प्रचार माध्यम भारत के विरुद्ध विषवमन करते हैं-यह बात अतंर्जाल पर वेबसाइटें और ब्लाग और समाचार पत्र पढ़ने से पता लग जाती है-और जिस तरह उन पर सरकार का नियंत्रण रखती है उससे उनका प्रचार सरकार के मन की बात ही समझी जानी चाहिये। वैसे उम्मीद तो नहीं कि यह बात वहां के प्रचार माध्यमों और बुद्धिजीवियों को समझ में आयेगी कि ‘दूसरे के अपमान पर कभी नहीं हंसना चाहिये क्योंकि अपने साथ वैसा ही व्यवहार आने पर दूसरों को भी हंसने का अवसर मिल सकता है।’ आखिर वह अपने सरकार के नियंत्रण में हैं और इसका मतलब यह है कि सोचने और समझने वाले सीमित संख्या में है और उस पर अमल करने वाले बहुत हैं। चीन में सोचने और समझने का अधिकार केवल राजकीय शक्ति से संपन्न लोगों के पास ही है और बाकी के लोग अपने सोचे और समझे पर थोड़े ही चल सकते हैं।

इसका आशय यह नहीं कि इस जूता फैंकने की घटना का प्रचार कर उसे महत्व दें बल्कि इस तरह की प्रवृत्ति की निंदा सभी को हमेशा करना चाहिये भले ही अपने विरोधी या शत्रू के साथ हो। मुश्किल है कि कुछ लोग इसे समझना नहीं चाहते। बहरहाल चीन के प्रधानमंत्री पर जूता फैंकने की घटना निंदनीय है पर वहां के प्रचार माध्यमों का रवैया ऐसा है जिस पर हंसा जा सकता है।
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यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की सिंधु केसरी-पत्रिका ’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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