दिवस बनाता कोई और है, मनाता कोई और है-व्यंग्य hasya vyangya


दिवस बनाता कोई और है और मनाता कोई और है। इस देश में हर रोज कोई न कोई दिवस मनाने की चर्चा होती है। अभी वैंलटाईन डे और महिला दिवस निकले नहीं कि होली आ गयी। होली तो अपने देश का परंपरागत पव है और साल में एक बार आता है। इस पर खूब हंसी ठठ्ठा भी होता है। इस पर्व को आम और खास दोनों ही प्रकार के लोग इस त्यौहार को मनाते हैं। तय बात है कि इसकी चर्चा भी होगी पर हम उन दिवसों की बात कर रहे हैं जिससे सामान्य लोग बेखबर रहते हैं पर बुद्धिजीवी,लेखक और पत्रकार उस पर शोर मचाते हैं।
यह महिला,पुरुष,मित्र और प्रेम दिवस यकीनन भारत की देन नहीं है पर यहां चर्चा उनकी खूब होती है। अपने देश में संगठित लेखक बुद्धिजीवी और पत्रकार दो प्रकार के माने जाते हैं-एक प्रगतिशील और दूसरे पंरपरावादी। जब यह दिवस आते हैं तो यही सबसे अधिक शोर मचाते हैं। एक अनुकूल लिखता और बोलता है दूसरा प्रतिकूल। खूब चर्चा होती है। संगठित होने के कारण उनको प्रचार माध्यमों पर खूब प्रचार मिलता है-आजकल अंतर्जाल पर भी उनके पास ही अधिक हिट होते हैं। वह लोग लिखते हैं इसमें कोई आपत्ति नहीं होना चाहिये वरना हमें पढ़ने के लिये कहां से मिलेगा? उनकी मेहरबानी है जो लिखते और बोलते हैं। मगर फिर भी कुछ बातें हमारे समझ में नहीं आती।

प्रगतिशील वर्ग पश्चिम का धुर विरोधी है। पूरे वर्ष वह उस पश्चिम पर बरसता है। अमेरिका ने यह कर दिया और वह कर दिया। उसे इराक छोड़ना चाहिये। उसे अफगानिस्तान से बाहर जाना चाहिये। वगैरह वगैरह।
मगर पश्चिम द्वारा बनाये गये यह दिवस आते हैं तब महिला,बाल,श्रमिक,और जाने कौन से प्रताडि़त वर्गों के नाम लेकर यही प्रगतिशील वर्ग उसके लिये उमड़ पड़ता है। इसके विपरीत परंपरावादी लेखक जो पूरा वर्ष पश्चिम को विजेता की तरह पेश करते हैं उस दिन अड़ जाते हैं कि यह दिवस हमारे देश के संस्कारों के अनुकूल नहीं है। हमारी परंपरायें अलग हैं। वगैरह वगैरह। प्रगतिशील को बाजार की स्वतंत्रता पसंद नहीं है पर वह इन दिवस को प्रचार देकर उसकी खुलकर मदद करता है। प्रगतिशीलों को पुराने धर्म पसंद नहीं है और ऋषियों और मुनियों को वह पुरातनपंथी मानते हैं पर वैलंटाईन ऋषि में के नाम पर मनाये गये दिवस उन्होंने जितना शोर मचाया वह ठीक उनकी विपरीत चाल का हिस्सा था।

हाल ही में महिला दिवस भी ऐसे ही मना। प्रगतिशीलों ने महिलाओं की आजादी के नारे लगाते हुए जमकर लिखा और बोला। एक आलेख पर नजर पड़ी जिसमें ‘बिने फेरे हम तेरे’ की प्रथा का जमकर विरोध किया गया। कहा गया इससे नारी पर ही संकट आयेगा। प्रगतिशीलों की एक बात समझ में नही आती कि वह आखिर विवाह प्रथा के साथ चिपटे क्यों रहना चाहते हैं जबकि वह उन्हीं प्राचीन धर्मों का हिस्सा है। चलने दीजिये उस प्रथा को जिसमें बिना विवाह किये ही लड़के लड़कियां रहना चाहते हैं। फिर उस प्रथा को जो जोड़े अपना रहे हैं उनमें नारियां भी हैं। वह उन नारियों में ही चेतना क्यों नहीं जगाना चाहते कि ऐसा मत करो-वह यहां भी महिलाओं के अधिकारों के कानूनी संरक्षण की बात कर रहे हैं। वह एक तरफ नारियों को समान अधिकार की बात करते हैं पर दूसरी तरफ उनको यह भी लगता है कि उनमें विवेक शक्ति की कमी है और ‘बिन फेरे हमे तेरे’ की प्रथा से वह अपना भविष्य संकट में डाल सकती है।

दरअसल बात यह है अगर इस देश में बिन फेरे हम तेरे की प्रथा आम हो जाये तो कानून के डंडे के सहारे पुरुष समाज के विरुद्ध अभियान छेड़कर महिलाओं में अपनी छबि बनाने का प्रगतिशीलों के अवसर कम हो जायेंगे। इतने सारे पुरुष आजाद होकर मजे करेंगे तो उनको घास कौन डालेगा?

हम अपने अनुभव से यही समझ पाये है कि इस तरह वर्ग बनाकर लोगों को कल्याण का भ्रम दिखाना अंग्रेजों की शैली है। समाज के टुकड़े कर फिर उसमें एकता लाने का यह तरीका इतना प्राचीन है कि विचारधारा से परे लिखने और बोलने वाले लोग उस पर हास्य व्यंग्य ही लिखते हैं। संपूर्ण समाज का विकास होना चाहिये पर यहां महिला,बालक,मजदूर,व्यापारी, और पता नहीं कितने प्रकार के भेद कर उनका कल्याण करने की बात होती है। हमारे देश में परिवार परंपरा दुनियां में सबसे अधिक शक्तिशाली है। अगर पुरुष को कुछ अतिरिक्त मिलता है तो क्या वह अपनी पत्नी और बच्चों से छिपाकर खाता है? मगर यहां तो यह मान लिया गया जाता है कि पुरुष हमेशा ही स्त्री का शोषक है। स्त्री को नौकरी और धन दो पर पुरुष की आय बढ़े इसका कोई उपचार नहीं करना चाहता। बालकों के लिये धन दो क्योंकि उनके पिता उनके लिये कुछ नहीं करते। कमाने वाले पुरुष-चाहे वह कमाते होेंं या अधिक-शोषक मानकर प्रगतिशील पता नहीं क्या कहना चाहते हैं जबकि आज भी देश की रीढ़ यही पुरुष वर्ग है। अब कुछ लोग कहेंगे कि साहब नारियां भी कमाई के क्षेत्र में आयें। जनाब, अमेरिका की एक संस्था की रिपोर्ट कहती है कि भारत में गृहस्थी का काम करने वाली महिलाओं की कमाई का आंकलन किया जाये तो वह पुरुषों से अधिक है। इसमें सच्चाई भी है। कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ रही है पर उसे लक्ष्य लेकर बढ़ाने की बात करना इस बात का प्रमाण है कि गृहस्थी का काम करने वाली महिलाओं का कमतर आंका जा रहा है। सच बात तो यह है कि इस देश के भविष्य की रक्षा यही गृहस्थी का काम करने वाली महिलायें जिस निष्काम भाव से करती हैं वह मन को मोह लेता है।

बात कहां से निकली कहां तक पहुंच गयी। अंतर्जाल पर लिखते हुए ऐसा ही होता है। इस देश में तमाम तरह के दिवस पहले से ही मनाये जाते हैं और पश्चिम का विरोध करने वालो लोग जब उन दिवसों को यहां भी मनाते हैं तब तो हंसी आना स्वाभाविक है। खासतौर से जब प्रचार माध्यमों और अंतर्जाल पर उन दिवसों पर ढेर सारा मसाला हो पर आमजन में उसकी चर्चा तक नहीं हो। इसका कारण भी है कि अपने देश के लोगों के संस्कार इतने मजबूत हैं कि उनके लिये हर दिन नया होता है। पश्चिम में भला कौन प्रतिदिन धार्मिक स्थान पर जाता है? अपने यहां तो ऐसे लोग भी हैं जो प्रतिदिन सर्वशक्तिमान के दर्शन कर अपना दिन शुरु करते हैं और यही कारण है कि चाहे भले ही बाजार के संरक्षक प्रचार माध्यम जमकर दिवस का नाम सुनाते हों पर आम जनता में उसकी प्रतिक्रिया नहीं होती। हां, नयी पीढ़ी का वह तबका जरूर उनकी जाल में फंसता है जो इश्क मुश्क में चक्कर में रहता है। इन अवसरों पर कार्यक्रम अपने देश में जितने होते हैं शायद ही कहीं होते हों।
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यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
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