कौटिल्य दर्शन: शत्रु का विनाश करे वही कुशल राजा कहलाता है (economics of kautilya-arthshastra)


रिपोः शत्रुपरिच्छेदः सहृद्वप्पुविभेनम्।
दुर्गकोषबलयानं कृत्यपक्षेपसंग्रहः।।

राज्य प्रमुख को चाहिये कि वह अपने शत्रु को उसके शत्रु से विनाश की प्रक्रिया को जानने के साथ उसके सहृदयों का भेद,दुर्ग,कोष और शक्ति का ज्ञान प्राप्त करते हुए अपने साथ कर्तव्य पूर्ण करने वाले सहयोगियों का संगह करे।
दूतेनैव नरेंद्रस्तु फुर्वीतारविकर्षणम्।
स्वपक्षे च विजानीयात्तपरदूतविचेष्टितम्
हिंदी में भावार्थ-राजा को चाहिये कि वह अपने दूत के द्वारा ही दूसरे राजा को आकर्षित करे और अपने शत्रु के दूत की चेष्टाओं से उसका मंतव्य समझे।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल पूरी दुनियां के सभी देश आधुनिक और तीव्रगामी हथियारों से सुज्जित हो गये हैं। ऐसे में सीधे युद्ध के बहुत सारे खतरे है। सभी देशों के पास दूर तक मार करने वाली मिसाइलें और राकेट हैं। ऐसे बम हैं कि अगर एक गिर जायें तो पूरा शहर नष्ट हो जाये। 1942 में अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासकी पर गिराये गये बमों की याद आते ही लोग सिहर उठते हैं जबकि उससे कई गुना शक्तिशाली बम अब बन चुके हैं। ऐसे में अब कूटनीति से काम लेने में ही बुद्धिमान लोग ठीक समझते हैं। इसलिये अब वह समय है कि जब अपने शत्रु को उसके शत्रु से नष्ट कराया जाये या उसे अपने ही देश में उलझाया जाये कि वह अपने राज्य पर वक्रदृष्टि न डाल सके। सच बात तो यह है कि कुशल राजा वही है जो अपनी प्रजा पर युद्ध लादने की बजाय अपने शत्रु को उसके राज्य में स्थित शत्रु से नष्ट करने की कूटनीतिक चाल चले। हालांकि सीधे युद्ध में जीतने पर राज्य प्रमुख का सम्मान होता है पर उसके खतरे भी बहुत हैं। कूटनीतिक चाल से शत्रु को पराजित करने में जहां अपनी प्रजा सुरक्षित होती है पर आजकल उसका प्रचार करना संभव नहीं है। अगर कूटनीति से विजय मिल भी जाये तो उसका दावा कोई सार्वजनिक रूप से नहीं कर सकता। इसके बावजूद यह एक सच्चाई है कि बुद्धिमान राज्य प्रमुख वही है जो कूटनीतिक चाल चलते हुए शत्रु राज्य को उसके शत्रुओं के हाथ से पराजित करे।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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