मेहनतकश की कलम से-चिंतन आलेख


भूतपूर्व मजदूर की डायरी से-आलेख

जिन लोगों ने जीवन में कभी मजदूरी या मेहनतकश बनकर पैसा नहीं कमाया उनके लिये मेहनत करने वालों का फोटो, फिल्म या कहानियां बहुत रुचिकर होती है। उसी तरह जो मजदूर या मेहनतकश है उसे अमीर लोगों के भवनों, उनकी विलासिता को दिखाने वाले फोटो और फिल्म तथा कहानियां रुचिकर होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि आदमी जिा हाल में रहता है उसके विपरीत स्थिति का विवरण-फोटो, फिल्म और कहानी-उसे पसंद आता है। ऐसे में व्यवसायिक रचनाकार-फिल्म के निर्माता, फोटो ग्राफर और कहानियां लिखने वाले लेखक-इस बात को ध्यान में रखते हैं कि उनको अपने रचना बेचनी कहां है?
भारत में हम देख सकते हैं कि जनसंख्या अधिक होने के कारण गरीब और अमीर दोनों प्रकार के लोग हैं और इसलिये सभी प्रकार के जज्बातों का व्यापार यहां किया जा सकता है। हां, गरीब अधिक है इसलिये यहां मनोरंजक फिल्में और कहानियों का अधिक बोलबाला है और गरीब के भाव बेचने के लिये बाजार छोटा है पर फिर भी कुछ रचनाकार-फिल्म निर्देशक, फोटोग्राफर और साहित्य लेखक-ऐसी रचनायें करते जिसमें गरीब और मजदूर विषया की प्रधानता हो। यह अलग बात है कि वह अपनी रचनायें अंग्रेजी में करते हैं और फिर उनके हिंदी अनुवाद यहां प्रस्तुत किये जाते हैं। एक तीर से दो शिकार-यहां के अमीर और मध्यम वर्ग में भी अपनी पैठ बनायी और विदेशों में इनाम के साथ पैसा बटोरा।
यह पता करना कठिन है कि कौन रचनाकार ऐसा है जिसने अपना जीवन मजदूर के रूप में किया और प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचा पर इतना सत्य है कि वह मनोरंजक प्रधान सामग्री के रचयिता भी उनका लोहा मानते हैं और गरीबी प्रधान सामग्री को कलात्मक मान लेते हैं। गरीब और अमीर का द्वंद्व आज भी बहुत लोकप्रिय है यह अलग बात है कि समाज में उसका प्रभाव अधिक नहीं है क्योंकि उसके लिये दोनों ही पहिये हैं जिनके सहारे वह चलता है।
सवाल यह उठता है कि किसी गरीब और मजदूर प्रधान रचना के प्रति किसी ऐसे व्यक्ति का रुझान क्या हो सकता है जिसने वैसे ही रूप में जीवन व्यतीत किया या अब कर रहा है? इसके अलावा उन रचनाकारों के मन में क्या विचार आता है जो अब गरीब और मजदूर नहीं है?
दोनों के विचारों में अंतर हो सकता है। उनके द्वारा रचित सामग्री के भाव में भी अंतर हो सकता है। कैसे? इस सवाल का ढूंढना है तो किसके पास जायें?
वह आदमी अधिक दूर नहीं था। उसे बस दिल से याद करना था। दिमाग की स्मृतियों से बाहर निकालने के लिये ऐसा करना जरूरी था। भीषण गर्मी में वह घर आया और पसीना सुखाने के बाद अपनी बात कहने को तैयार हो गया। उसे अखबार में छपी वह फोटो दिखानी जिसमें एक अधेड़ स्त्री पुरुष एक खेत में चल रहे हल में बैल की तरह या कहा जाये जगह जुते थे। उसके अधरों पर पहले मुस्कान खेल गयी और फिर वह गंभीर हो गया।

उसने अपना जीवन एक मजदूर के रूप में ही शुरु किया था। नौवीं पास करने के पास करने के बाद उस पर परिवार के लिये कमाने का दबाव पड़ने लगा। इसलिये गर्मी के अवकाश के दिनों में उसे एक जूते की दुकान पर नौकरी करना पड़ी। उसने सोचा कि उसे कुछ पैसा मिल जायेगा तो जेब खर्च चल जायेगा। फिर कमाने की आदत बन जाती है तो फिर आदमी रुकता नहीं है। इसके अलावा शिक्षा समाप्त करने के बाद नौकरी मिल जायेगी-इसकी आशा उसे नहीं थी क्योंकि तब भी देश में बेरोजगारी का वैसा ही प्रकोप था जैसा अभी है।
वहां उसे लगा कि कोई सेल्समेन का काम होगा पर वह थोक की दुकान थी। वहां उसे मजदूर की तरह कार्य करना पड़ा। वहां आर्डर के पर्चे लेकर वह जूते पेटियों में भरता और फिर उनमें कीलें ठोकता। गर्मी में वह धूप में यह काम करता। अपने शरीर की उसे परवाह नहीं थी। कई बार कीलें उसके पंाव में लग जाती थी। वह निम्न मध्यम वर्ग का था इसलिये उसने अपने माता पिता को यह बात नहीं बताई कि वह वहां मजदूर का काम कर रहा है। उसे डर था कि माता पिता यह काम नहीं करने देंगे। काम छोड़ दिया तो उसे समाज में कामचोर या नकारा समझा जायेगा। वेतन मिलता 70 रुपये। इससे उसका स्वयं का पेट भी नहीं भर सकता। फिर उसके कपड़े तो अच्छे ही होते थे और मजदूरी का काम होने के कारण उनका नुक्सान भी अधिक होता था पर उसके माता पिता ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। पिता अपने दम पर ही घर खर्च चला रहे थे। उनका विचार था कि लड़का कुछ सीख रहा है। हालत यह हो गयी कि उसे ठेला चलाकर बाजार में भी दुकानों पर सामान देने जाना पड़ता। वह मूंह छिपाता हुआ जाता कि कोई देख न ले। उसने तीन माह नौकरी की और फिर माध्यमिक मंडल की पढ़ाई में जुट गया।
उसकी परीक्षा देने के बाद फिर एक साल बाद वह फिर उस दुकान पर आया। माध्यमिक परीक्षा में पास होने के बाद भी वहीं वह काम करता रहा। फिर उसने प्रथम वर्ष की पढ़ाई शुरु की और सुबह की बजाय दोपहर को वहां काम पर जाने लगा। अंततः उसने वह नौकरी छोड़ दी।
मगर वह एक लेेखक था। एक मजदूर के रूप में जीते हुए उसने इस बात को भी देख लिया था कि लिखने से कोई उसे रोटी देने वाला नहीं है। मगर वह लिखता क्या था? उसकी पुरानी डायरी क्या कहती है?
अपने शरीर से बहते पसीने की उसने कभी परवाह नहीं की पर वह चाहता था कि उसका उसे पूरा मूल्य मिले। वहां उसने यह भी सीखा कि मेहनत करने वाले को यह समाज हेय दृष्टि से देखता है। वह स्वयं कभी मेहनत ने नहीं घबड़ाया पर वह निराशा था उसका पूरा मूल्य न मिलने से।
दोपहर में जब वह खाना खाने घर जाता तब वह सोने की बजाय अपनी डायरी में शायरियां लिखता। उसकी शायरियों में गरीब, पसीना, मेहनत या शोषण का कोई जिक्र नहीं मिलता। वह दार्शनिक किस्म की कवितायें लिखता। उसके मन में अपने शोषण को लेकर लिखने में कोई रुचि नहीं थी। अवकाश के दिन वह मनोरंजक फिल्म देखने जाता। उस समय अनेक ऐसी फिल्में आयी जिनको कलात्मक कहा गया-उनमें गरीबी और अन्याय शोषण से जुड़ी सामग्री थी-पर वह उनको देखने नहीं गया क्योंकि अखबार में उनकी कहानी पढ़ चुका था। वह जीवन जो स्वयं जी रहा था पर्दे पर देखना उसे पसंद नहीं था। वह चिंतन लिखता पर उसमें भी कभी अपने पसीने का पूरे मूल्य की मांग नहीं होती।
आखिर क्यों? उसने मान लिया था कि यह समाज कभी शोषण मुक्त नहीं हो सकता। हरेक आदमी को अपने जीवन की जंग खुद लड़नी है। अखबारों में वह तमाम तरह के दावे और वादे पढ़ता। गरीबों के लिये चल रहे अभियानों की जानकारी देखता पर जानता था कि उसके मतलब की नहीं है।
वह जीवन पथ पर चलता गया और फिर उसे टेबल कुर्सी पर बैठने का अवसर भी आया और वह भी कलम के साथ। उसने हिंदी टाईपिंग का इम्तहान पास किया। अंग्रेजी की टाईप भी पास की। वह आशाा नहीं कर रहा था कि उसे कभी इनके सहारे कोई रोजगार मिलेगा। उसने वाणिज्य स्नातक की उपाधि भी प्राप्त की।
जीवन ऐसा नहीं चलता जैसे आदमी सोचता है। वह ऐसे रास्तों पर भी चला जाता है जहां से गुजरने की संभावना नगण्य होती है पर जिसकी तैयारी आदमी ने अनजाने में पहले ही अनजाने में कर ली होती है। उसे एक अखबार में कंप्यूटर आपरेटर की नौकरी मिली। टाईपिंग की बदौलत नहीं बल्कि वह अखबारों में कवितायें और कहानियां लिखने की वजह से। इन दोनों माध्यमों से वह कभी आशा भी नहीं करता था। अखबार के दफ्तर में काम करते हुए उसने संपादकीय विभाग में भी कुछ दिन काम किया। वह कलम जिससे वह आशा नहीं कर रहा था काम आयी पर अधिक दिन तक नहीं। बाद में उसने वाणिज्य स्नातक की शिक्षा की बदौलत लेखा का काम प्राप्त किया। अपने संघर्षों के बीच वह अपने लेखक को मरने नहीं देता। सच तो यही लेखक उसे प्रेरित करता था। काम के कारण उसका लेखन कार्य कम हो गया। उसने अखबारों में अपनी रचनायें भेजना कम कर दिया और फिर बंद हो गया। कहा जाये तो स्थानीय स्तर से बाहर प्रकाशन अधिक न होने की वजह से उसका मनोबल खत्म हो गया। एक लंबे समय बाद वह फिर कंप्यूटर पर लौटा। अबकी बार वह अपने लेखन को अभियान बनाने के इरादे से आया।

अधेड़ महिला पुरुष का बैल की तरह हल जोतते देखकर उसने क्या कहा होगा?
यह दर्दनाक दृश्य है। मेहनत करने की जिनकी आदत है वह बुढ़ापे तक कर सकते हैं और करते हैं। मुख्य बात यह है कि उनकी मेहनत का पर्याप्त भुगतान होना चाहिए। कोई काम छोटा नहीं है। प्रेम की तरह मेहनत की भी कोई आयु नहीं होती। पेट में भूख की आग आदमी को गर्मी में सूरज की तपती किरणें में जलते हुए भी मेहनत को बाध्य कर देती है उस पर तरस खाने की जरूरत नहीं है। देखना यह चाहिए कि उनको मेहनताना मिला कि नहीं।
फोटो देखकर उसके मन में पीड़ा थी। इस बात की नहीं कि कोई परिश्रम कर रहा है बल्कि इस बात की कि उसे पूरा मूल्य मिल रहा है कि नहीं। उसके चेहरे पर उभर रही लकीरों से साफ लग रहा था कि वह पीड़ा से अधिक चिंता में था। पूरा मूल्य न मिलने की पीड़ा।
फिर उसने नजरें फेर ली। शायद वह कोई शायरी लिखने वाला था। कोई दार्शनिक या युवा प्रेम की शायरी। उसकी यह कोशिश अपने दर्द या पीड़ा से छिपने के लिये नहीं बल्कि अपने अंदर ही प्रसन्नता और सहजता के भाव भरने के लिये थी जो जीवन संघर्षों से जूझने में बहुत सहायक होती है।
वह बुदबुदाया कि ‘श्रीगीता में कृष्ण भगवान ने कहा है कि अकुशल काम को हेय नहीं समझना चाहिए।’
अपने शुरुआती दिनों में लिखी डायरी आज भी उसके पास है। आज अपनी उन पुरानी रचनाओं पर हंसी आती है पर उनसे यह तो पता लगता है कि उसने अपने दर्द को जिया और पिया उसे कभी अपने लेखन का आधार नहीं बनाया क्योंकि उसका मानना है कि उस जैसे लोग ही इस दर्द और पीड़ा से भरी सामग्री को देखना और पढ़ना नहीं चाहेंगे। वह जैसा पढ़ना चाहता है वैसा ही लिखता है। वह एक भूतपूर्व मजदूर है जो आज भी अपना पसीना बहता देख विचलित नहीं होता।
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यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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