नस्लवाद और गुणों का स्वरूप-आलेख


शायद कुछ समाज सुधारकों को यह बुरा लगे पर सच यही है कि इस धरती पर पैदा हर जीव की नस्ल होती है और उसमें कुछ स्वाभाविक गुण जन्मजात होते हैं जिनमें इंसान भी शामिल है। इंसानों में नस्ल होती हैं यही कारण है कि शरीर विज्ञान के विशेषज्ञ अनेक प्रकार के जींसों की मौजूदगी अलग अलग लोगों में अलग अलग रूप से देखते हैं। हां, इतना अवश्य है कि अन्य जीवों से पृथक इंसान अपनी बुद्धि की व्यापकता के कारण अभ्यास से जन्मजात गुणों से प्रथक गुण भी प्राप्त करता है और दुर्गुणों से मुक्ति भी इनसे मिल जाती है।
जींसों के विषय में इस लेखक के मित्र ने लेख लिखा था उसमेें यह बताया गया था कि किस तरह कुछ जातियों के लोग गोरे और कुछ के काले होते हैं। इतना ही नहीं विचार और काम करने की शैलियां और तरीके भी अलग अलग स्थानों पर होने के बावजूद एक जैसे होते हैं जबकि उनका आपस में कोई संपर्क नहीं होता।
अगर कोई गोरा दंपत्ति ऐसे स्थान पर होता है जहां कालों की बहुतायत है उसके बच्चे भी गोरे होते हैं और कहीं काला दंपत्ति अगर गोरा बाहुल्य इलाके मेें हुआ तो उसका बच्चा भी काला होता है। उस मित्र से लेख पर चर्चा हुई थी तब इस लेखक ने उससे पूछा था कि-‘क्या जलवायु और अन्न जल मनुष्य के मूल स्वभाव को प्रभावित नहीं करता?
उसने कहा कि‘-नहीं।’
लेखक ने पूछा-‘क्या तुम्हारे मेरे स्वभाव में अंतर केवल जाति या नस्ल के कारण है या जलवायु भी इसमें शामिल है। वैसे इस समय हम दोनों एक ही स्थान का अन्न जल ग्रहण कर रहे हैं।’
मित्र हंस पड़ा और उसने कहा-‘शायद दोनो कारण से ही अंतर है। जाति और जन्म स्थान अलग अलग होने से हमारे स्वभाव और विचारों में अंतर हो सकता है।’
फिर कुछ देर बाद चुप रहने के बाद वह बोला-‘शिक्षा प्रणाली और धार्मिक साम्यता के कारण हम दोनों कई मसलों पर एक ढंग से सोचते हैं। कई मसलों पर सहमत हों सकते हैं पर अभिव्यक्ति की शैली में अंतर हो सकता है जो शायद जाति, जलवायु और के साथ हमारे वर्तमान जीवन स्तरों से कहीं न कही जरूर प्रभावित होगा।’
वह स्पष्ट जवाब नहीं दे रहा था पर उसने अपने लेख में जातियों की नस्ल को लेकर कहीं दूसरे स्थान से प्रकाशित लेख उठाकर उस पत्रिका में लिखा था जिसमें इस लेखक का व्यंग्य भी था। वह पत्रिका इस लेखक के पास अल्मारी में जमा है और ढूंढने पर वह लेख लिखने का प्रयास किया जायेगा। वह स्वयं उस लेख का महत्व नहीं समझ सका। उस दिन जब उससे उस लेख की तारीख मांगी तो उसने उस लेख का शीर्षक और विषय बताया जो इस लेखक का था। जब भी नस्ल को लेकर कहीं चर्चा होती है उस मित्र का लेख अक्सर याद आता है। उस लेख में नस्ल से मनुष्य की देह और बुद्धि के प्रभावित होने के सिद्धांत की पुष्टि करते हुए भारत के जातिगत ढांचे की सार्थकता प्रमाणित करने का प्रयास उसमें किया गया था पर लेखक स्वयं उसमें अपनी कोई राय नहीं दे सका।
बहरहाल नस्ल का संबंध देह से इसलिये उससे जुड़ी तीनों प्रकृतियां-बुद्धि, मन और अहंकार-प्रभावित होती हैं पर दूसरा सच यह है कि सभी जगह लोगों का स्वभाव एक जैसा नहीं होता। सभी जगह अपराधी नहीं होते तो सभी पुण्यात्मा भी नहीं होते। धोखा, मक्कारी, अपराध और अनावश्यक रूप से दूसरे को सताने की घटनायें सभी जगह होती है तो बचाने वाले भी सभी जगह होते हैं। हम कहते हैं कि अमुक जगह अमुक जाति, भाषा, क्षेत्र या धर्म से जुड़े लोगों पर हमले हो रहे हैं क्योंकि वह बाहर से वहां आये हैं। इसका आशय यह नहीं है कि सभी लोग हमला कर रहे हैं क्योंकि तब यह सवाल उठ सकता है कि स्थानीय लोगों की सहायता के बिना वहां बाहर के लोग कैसे पहुंच सकते हैं। तय बात है कि वहां एक समूह ऐसा भी है जो उनको अपने स्वार्थ की वजह से वहां रोके रहता है और वह ऐसे हमलों को पसंद नहीं करता।
मनुष्य के स्वभाव में कुछ गुण मूल रूप से होते हैं तो कुछ परिस्थितिजन्य भी उसे ऐसा कार्य कराते हैं जो वह सामान्य हालत में नहीं करता। कई बार वह भीड़ में शामिल होकर ऐसा काम करता है जो वह अकेले वह सोचता भी नहीं। तात्पर्य यह है कि किसी भी घटना को किसी समूह के स्वभाव से जोड़ना एक गलती है। दुनियां में हर देश, भाषा, जाति, धर्म और क्षेत्र में कवि पैदा होते हैं। उन समूहों में भी कवि मिल जाते हैं जिसके सदस्य आक्रामक माने जाते हैं।
इस लेखक का यह अनुभव रहा है कि जलवायु का प्रभाव आदमी के स्वभाव पर अवश्य पड़ता है-जिस मनुष्य का जन्म जिस स्थान पर हुआ है उसकी जलवायु का प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है। उसकी देह की नस्ल कोई भी हो मनुष्य पर जन्म वाले स्थान की जलवायु का प्रभाव अवश्य दृष्टिगोचर होता है। उसके स्वभाव का जाति,भाषा और धर्म से अधिक संबंध नहीं होता। हां, जन्म के बाद इंसान कर्म अपनी बुद्धि के अनुसार वैसे ही करता है जैसा कि उसका अन्न जल होता है। यही बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। श्रीगीता का अध्ययन करने से भी इस बात की प्रेरणा मिलती है कि जैसे आदमी भोजन करता है वैसे ही उसकी बुद्धि हो जाती है और फिर कर्म भी उसी के अनुसार होते हैं। ‘गुण ही गुणों को बरतते है’-यह एक ऐसा नियम है जिसको आधुनिक विज्ञान मान्य नहीं करता क्योंकि उसमें उसे धर्म की बू आती है मगर सच यही है। इस देह में जैसा अन्न जल अन्दर जायेगा वैसी ही प्रवृत्ति होगी। अन्न जल से भी दो आशय है-एक तो उसको पाने के लिये धन का स्त्रोत अगर पवित्र नहीं है तो भी उसके सेवन का भी बुरा प्रभाव होगा और दूसरा यह कि अगर वह मांस आदि खाने से भी देह में स्थित बुद्धि भ्रष्ट होने के साथ मन में क्रूरता का भाव पैदा होता है जो अहंकार को बढ़ाता है। उससे आदमी फिर दूसरों की बाह्य देह देखकर ही दूसरे के गुणों और दुर्गुणों का अनुमान करते हुए पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर व्यवहार करता है। शायद ‘गुण ही गुणों को बरतते’ का सिद्धांत पूरे विश्व में प्रचारित किया जाये तो लोग यह समझ पायेंगे कि किस तरह उनके समूह के शीर्षस्थ लोग उनको भ्रमित कर आपस में झगड़ा कराते हैं। शेष फिर कभी।
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यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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