भर्तृहरि नीति शतक-कविताओं से बहक जाते हैं लोग (kavita se log bahak jate-dharm sndesh)


भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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सत्यत्वे न शशांक एव बदनीभूतो न चेन्दोवर द्वंद्व लोनतां गतं न कनकैरष्यंगयश्टिः कूता।
किंतवेवं कविभि प्रतारितमनतत्वं विजनान्नपि त्वं मांसस्थ्मियं वयूर्मृगदृशां मंदो जनः सेवते।।

हिंदी में भावार्थ- न तो चंद्रमा जमीन पर आकर किसी सुंदरी युवती के मुख पर सजा है और न ही कभी कमल ने किसी के नेत्र का स्थान लिया है और न ही किसी की देह सोने से बनी है पर फिर भी कविगणों के बहकावे में सामान्य लोग आ जाते हैं और हाड़मांस के इस नश्वर को सर्वस्व मानते हुए भोगों में लिप्त हो जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-बरसो पूर्व कही गयी यह बात आज भी कितनी प्र्रासंगिक है। हमारे यहां आजकल फिल्मों में सूफी तरीके से गीत लिखे जा रहे हैं जिसमेंे भगवान और प्रेमिका को एक ही गदद्ी पर बिठाया जाता है यानि उस गीत को सोलह साल का लड़का अपनी प्रेयसी पर भी गा सकता है और कोई भक्त भगवान के लिये भी गा सकता है। सच तो यह है कि सच्चे भक्त के लिये तो किसी सुर संगीत की आवश्यकता तो होती नहीं इसलिये वह उनके दांव पर नहीं फंसते पर युवक युवतियां उन गीतों पर झूमते हैं और कभी कभार तो यह लगता है कि इस तरह देश को बहकाया जा रहा है। उनके दांव में कच्चे भक्त भी फंस जाते हैं और गीत सुनकर अपनी गर्दन हिलाने लगते हैं।
भगवान की निष्काम भक्ति का सर्वश्रेष्ठ रूप एकांत में उनका ध्यान और स्मरण करना है जबकि सुर संगीत से उनका स्मरण करना एक तरह से सकाम भक्ति का प्रमाण है और जिस तरह प्यार प्यार की बात आती है उससे तो ध्यान भटकता है और देह तथा मन को कोई लाभ भी हीं होता।
इस तरह भगवान और प्रेयसी के प्रति एक साथ प्रेम पैदा करने वाले शब्द केवल बहकाते हैं और आजकल के व्यवसायिक युग में इसका प्रचलन बढ़ गया है। कभी कभी तो लगता है कि इस तरह के सूफी गीत भारत के युवाओं में मौजूद अध्यात्मिक की स्वाभाविक प्रवृति को अपने स्वार्थ को भुनाने के लिये लिखे गये हैं।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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टिप्पणियाँ

  • AlbelaKhatri.com  On 04/08/2009 at 9:43 पूर्वाह्न

    waah !bahut khoob !kamaal ke sootra……………..

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