किसान आंदोलन का प्रचार दिग्भ्रमित करने वाला-हिन्दी लेख (kisan andolan ka prachar-hindi lekh)


देश में चल रहे विभिन्न किसान आंदोलनों को लेकर टीवी समाचार चैनलों और समाचार पत्रों में आ रहे समाचार तथा चर्चायें दिग्भ्रमित करती हैं। समाचारों का अवलोकन करें तो संपादकीयों तथा चर्चाओं का उनसे कोई तारतम्य नहीं बैठता। सिद्धांतों और आदर्शों की बात करते हैं पर उनका मुद्दे से कोई संबंध नहीं दिखता। अगर गरीब किसानों को उनकी जमीन का सही मूल्य दिलाने की बात हो रही है तो फिर कृषि योग्य भूमि का महत्व किसलिये बखान किया जा रहा है? अगर पूरी बात को समझें तो लगता है कि ऐसे किसानों को भी आगे लाकर समूह में जुटाने का प्रयास किया जा रहा है जो जमीन बेचने को इच्छुक नहीं हैं और बेचने के इच्छुक लोगों के साथ मिलाकर बाद में वह स्वेच्छा से इसके लिये तैयार हो जायेंगे। कहीं यह आंदोलन इसलिये तो नहीं हो रहा कि बिखरे किसानों को एक मंच पर लाया जाये ताकि जमीन का कोई टुकड़ा बिकने से न रह जाये।
समाचार कहते हैं कि ‘किसान जमीन का उचित मूल्य न मिलने से नाराज हैं।’ मतलब वह जमीन बेचने के लिये तैयार हैं। अगर उनका आंदोलन उचित मुआवजे के लिये है तो उसमें कोई बुराई नहीं है। दूसरी बात यह भी कि किसी ने जबरन जमीन अधिग्रहण का आरोप नहीं लगाया है। पुराने कानून को बदलने की मांग हुई है पर पता नहीं उसका क्या उद्देश्य है? केवल दिल्ली ही नहीं कहीं भी किसानों का आंदोलन जमीन बचाने के लिये होता नहीं दिख रहा, अलबत्ता उचित मुआवजे की बात अखबारों में पढ़ने को मिली है। इधर चर्चाओं को देखें तो उसमें जमीन को मां बताते हुए उसे निजी औद्योगिक तथा व्यापारिक क्षेत्र को न बेचने की बात हो रही है। बताया जा रहा है कि निजी क्षेत्र केवल उपजाऊ क्षेत्र में ही अपनी आंखें गढ़ाये हुए हैं। आदि आदि।
अब सवाल यह है कि किसान आंदोलन पर चर्चायें उनकी मांगों के न्यायोचित होने पर हो रही हैं या जमीन के महत्व के प्रतिपादन पर! किसान अपनी ज़मीन बेचने के लिए तैयार हैं पर उनको उचित मुआवजा चाहिए तब जमीन को मां बताकर उनको क्या समझाया जा रहा है? आंदोलन से जुड़े कुछ लोग जमीन को लेकर इस तरह हल्ला मचा रहे हैं कि जैसे वह उसे बिकने से बचाने वाले हैं जबकि सच यह है वह उचित मूल्य की बात करते हैं।
हम यहां आंदोलन के औचित्य या अनौचित्य की चर्चा नहीं कर रहे न ही देश में कम होती जा रही कृषि तथा वन्य भूमि से भविष्य में उत्पन्न होने वाले संकटों पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं क्योंकि यह विषय आंदोलन और उसकी पृष्ठभूमि पर होने के साथ ही प्रचार माध्यमों के बौद्धिक ज्ञान पर भी है। अब यह अज्ञानता अध्ययन और चिंतन के अभाव में है या प्रयोजन के कारण ऐसा किया जा रहा है यह अलग विषय है।
जहां जमीनें हैं वहां हजारों किसान हैं जिनमें एक तो वह हैं जो मालिक है तो दूसरे वह भी जो कि कामगार हैं। शहरों में अनेक ऐसे लोग रहते है जो अपनी ज़मीन बंटाई पर देकर आते हैं और हर फसल में अपना हिस्सा उनको पहुंचता है। उनको अगर जमीन की एक मुश्त राशि अच्छी खासी मिल जाये तो वह प्रसन्न हो जायेंगे मगर कामगार के लिये तो सिवाय बेकारी के कुछ नहीं आने वाला। संभव है अनेक कामगार यह न जानते हों और ज़मीन बचाने की चर्चा के बीच वह भी भीड़ में शामिल हो गये हों। फिर कुछ किसान ऐसे भी हो सकते हैं जो अपनी तात्कालिक जरूरतों के लिये एक मुश्त रकम देकर खुश हो रहे हों और वह अगर बढ़ जाये तो कहना ही क्या? ऐसे किसान कोई भारी व्यापार नहीं करेंगे बल्कि अपने घरेलू कार्यक्रमों में-शादी तथा गमी की परंपराओं में हमारे देश के नागरिक अपनी ताकत से अधिक खर्च कर देते है-ही खर्च कर देंगे और फिर क्या करेंगे यह तो उनकी किस्मत ही जानती है। संभव है कुछ किसान ऐसे समझदार हों और वह एक ही दिन में मुर्गी के सारे अंडे निकालने की बजाय रोजाना खाना पंसद करते हों। देश में अज्ञान और ज्ञान की स्थिति है उससे देखकर यह तो लगता है कि कुछ लोग इस आंदोलन को ज़मीन बचाने का आंदोलन समझ रहे हैं जो कि वास्तव में प्रतीत नहीं होता क्योंकि उचित मुआबजा कोई इसके लिये नहीं हो सकता।
जहां तक कृषि व्यवसाय से लाभ का प्रश्न है तो सभी जानते हैं कि छोटे किसानों को खेती करने से इतना लाभ नहीं होता बल्कि उनको अपना पेट पालने के लिये उससे जुड़े व्यवसाय भी करने होते हैं जिनमें पशुपालन भी है। अकेले कृषि के दम पर अमीर बनने का ख्वाब कोई भी नहीं देखता यह अलग बात है कि आयकर से बचने के लिये अनेक अमीर इसकी आड़ लेते हैं। कृषि में आय से स्थिर रहती है और वृद्धि न होने की दशा में किसान कर्ज लेता है। यह कर्ज अधिकतर शादी और गमी जैसे कार्यक्रमों पर ही खर्च करता है। देश की सामाजिक स्थिति यह है कि घर बनाने, शादी और गमी में तेरहवीं में अच्छा खर्च करना सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय माना जाता है। रूढ़िवादिता में होने वाला अपव्यय आदमी करने से बाज़ नहंी आता क्योंकि वह गरीब होकर भी गरीब नहीं दिखना चाहता-अलबत्ता कहीं से कुछ मिलने वाला हो तो अपना नाम गरीबों की सूची में लिखा देगा।
ऐसे में एकमुश्त राशि सभी को आकर्षित कर रही है पर वह बढ़ जाये तो बुराई क्या है? जिनको जमीन से सीधे पैसा मिलना है वह तो इसमें शामिल हो गये पर उनके साथ ऐसे कामगार भी आ गये होंगे जो वहां काम करते हैं। अगर प्रचार माध्यमों में यह ज़मीन बचाने की मुहिम का प्रचार न होता तो प्रदर्शनकारियो की संख्या कम ही होती। फिर देश के अन्य भागों से सहानूभूति भी शायद नहीं मिल पाती। शायद इसलिये ही ‘ज़मीन बचाने’ वाला नारा इसमें शामिल होते दिखाया गया जबकि है नहीं।
अलबत्ता ऐसे किसान जो किसी भी कीमत में ज़मीन नहीं बेचना चाहते वह आंदोलन की छत्रछाया में आ गये हैं और अब उनको किसी किसी तरह आगे भी मुआवजा लेकर ज़मीन छोड़नी होगी। संभव कुछ मूल्य बढ़ जाये पर शायद इसे कम ही इसलिये रखा गया है कि कोई ऐसा आंदोलन चलवाया जाये जिससे सब किसान एक ही छत के नीचे आ जायें। जमीन मां है यह सच है। कृषि योग्य जमीन का कम होना अच्छी बात नहीं है पर मुआबजे के खेल में उसकी चर्चा करना व्यर्थ है। याद रहे यह लेख टीवी चैनलों और समाचार पत्रों के आधार पर लिखा गया है इसलिये हो सकता है सब वैसा न हो पर यह बात उनको साबित भी करनी होगी। अलबत्ता इस विचार से अलग भिन्नता ही सहृदयजनों को हो सकती है पर अंततः एक आम लेखक के पास अधिक स्त्रोत और समय नहीं होता कि वह व्यापक रूप से अन्वेषण कर सके।
———-

कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: