योग बाबा की संपत्ति में कितने शून्य-हास्य व्यंग्य (yoga baba ki sampatti mein kitne shoonya-hasya vyangya)


दीपक बापू को गंजू उस्ताद का इस तरह सुबह सुबह मिलना अपशकुन जैसा लगता है, पर अपनी हास्य कविताई के लिये विषय मिलने का मोह उनको अपनी राह बदलने या उससे मुंह फेरने की अनुमति नहीं देता। गंजू उस्ताद सामने से आ रहा था और दीपक बापू भी सड़क पर उसी दिशा में बढ़ रहे थे। पास आते ही गंजू उस्ताद ने दीपक बापू से बिना किसी औपचारिकता के कहा-‘‘कहां जा रहे हो?’’
दीपक बापू ने कहा-‘‘जरा, उस पान वाले को बीड़ी के पैसे देने जा रहा हूं। कल उससे खरीदी पर खुले पैसे नहीं थे तो उसने उधार ही दे दिया। कह दिया कल सुबह दस बजे तक पैसे पहुंचाने स्वयं आ जाना नहीं तो मेरा लड़का घर पर तकादा करने आ जायेगा।’’
गंजू उस्ताद ने कहा-‘‘उसे छोड़ो। चलो मेरे साथ, ज्ञानीजी से तुम्हारा शास्त्रार्थ करवाना है। वह उधर पेड़ के नीचे बैठे अपना ज्ञान बघार रहे हैं। पान वाला तुमसे बाद में पैसे ले लेगा।’’
दीपक बापू बोले-‘‘पगला गये हो! इतने बड़े ज्ञानी से भला हम क्या शास्त्रार्थ करेंगे? कभी कोई शास्त्र नहीं पढ़ा। ताउम्र हास्य कविताई करते गुजारी, उसमें भी फ्लाप रहे। पहले हम अपना उधार चुकाकर अपनी पड़ौस में अपनी इज्जतदार होने की छवि बचा लें फिर सोचेंगे। कहंी उसका लड़का घर पहुंचा और पड़ौसियों को पता लगा कि हम उधार लेकर बीड़ी पीते हैं तो कितनी हमारे मान सम्मान का जनाजा निकल जायेगा।’’
गंजू उस्ताद ने कहा-‘‘तुम चिंता मत करो। ज्ञानी जी तो अभी इसी रास्ते में बैठे हैं उनको दो तीन मिनट हास्य कविता सुनाकर चले जाना।’’
दीपक बापू ने कहा-‘‘कमबख्त, कवि समझ रखा है या क्लर्क कि चाहे जब कुछ भी लिखने लगो। वैसे तुम वहां चलो जहां ज्ञानी जी विराजमान हैं। पहले पता तो चले कि वह क्या कह रहे हैं।’’
गंजू उस्ताद कहने लगा कि ‘‘वह अपने देश के महान योग बाबा की मज़ाक उड़ा रहे हैं। कह रहे है कि ‘काहेके के बाबा ओर कैसी उनकी शिक्षा, वह तो बारह सौ करोड़ कमाकर सेठ जैसे हो चुके हैं’।’’
दीपक बापू बोले‘‘यह तुम हमें कहां फंसाने चले। भला इस प्रसंग में हमारी समझ कितनी है। हमसे महंगाई, भ्रष्टाचार, शादी, गमी, गमी, सर्दी और बरसात पर हास्य कवितायें लिखवा लो मगर इस तरह बारह सौ करोड़ रुपये पर हम क्या लिखेंगे? यही पता नहीं कि 12 के बाद उसमें कितने सौ के शून्य लिखने होंगे? तुम चाहे तो योग पर ही कुछ लिखवा लो जिसके बारे में हमें भले नहंी पता पर उस लिखा जा सकता है। सभी लोग लिख रहे हैं।’’
गंजू उस्ताद बोला-‘‘नहीं, यह राष्ट्रीय स्वाभिमान का विषय है? ज्ञानी जो ललकारना है।
दोनों बातचीत करते हुए वहीं आये जहां ज्ञानी जी पेड़ के नीचे अपने चेलों के साथ बैठे थे। गंजू उस्ताद को देखते ही वह बोले-‘‘फिर तू आ गया बहस करने! तेरे योग बाबा पर हमने तेरे से जो कहा वह समझ में नहीं आया जो इस फटीचर हास्य कविता को हमारे सामने लाया है।’’
दीपक बापू बोले-‘‘महाराज, आप कैसी बात करते हो। हम तो किराने वाले को पैसे देने जा रहे थे। यह बोला कि ‘चलो ज्ञानी से मिलवाता चलूं‘, भला हमारी क्या औकात कि आपके साथ बहस करें।’’
ज्ञानी जी बोले-‘‘अच्छा, हमसे तू झूठ बोल रहा है। तू उस पान वाले को बीड़ी के पैसे देने जा रहा है जिससे कल उधार करवाकर कर गया था। उसने तुम्हें धमकी दी कि सुबह दस बजे तक पैसे भिजवा देना वरना अपना आदमी घर भेज दूंगा। अरे, अपने चेले चारों तरफ फैले हैं, सबकी खबर मिल जाती है।’’
दीपक बापू ने देखा कि उनका वहां विराजमान एक चेला कल उसी दुकान पर खड़ा होकर पान खा रहा था, जिसने शायद अब उनको आते देखकर यह बात अपने ज्ञानी गुरु को बता दी थी।
दीपक बापू ने कहा-‘’महाराज, आपके चेले ने यह नहीं बताया कि हमारे पास पांच सौ का नोट था, इसलिये यह उधार लिया। बहरहाल आपके सूचना संगठन की शक्ति बहुत प्रशंसनीय है भले ही उसमें दो टके की खबरों का आदान प्रदान होता है।’’
ज्ञानी महाराज बोले-‘‘दो टके के लोग मिलते हैं तो उनको अपनी औकात के अनुसार ही खबर देनी पड़ती है। अगर बाहर सौ करोड़ की हो तो वह भी बड़े लोगों के साथ चर्चा में काम आती है।’’
गंजू उस्ताद ने दीपक बापू को कोहनी मारी और कहा-‘‘देखा दीपक बापू! सुबह से योग बाबा के बारह सौ करोड़ की संपत्ति की बात उनके दिमाग में भरी पड़ी है। जरा, सुनाओ इनको हास्य कविता!’’
ज्ञानी जी बोले-‘‘अरे, इनकी औकात नहीं है जो बारह सौ करोड़ रुपये पर हास्य कविता लिखें। यह तो पांच दस रुपये पर लिख सकते हैं। तुम्हारे योग बाबा जिनको तुम भगवान मानते हो बारह सौ रुपये करोड़ की संपत्ति बना चुका है। वह धंधेबाज है!’’
दीपक बापू थोड़ा चौंकते हुए बोले-‘‘महाराज योग में भगवान! कैसी बात कर रहे हैं आजकल तो भगवान क्रिकेट में होते हैं।‘’
ज्ञानी जी गंजू उस्ताद की तरफ देखकर बोले-‘‘देख ली हास्य कवि की समझ! जैसे टीवी वालों न रटाया वैसा ही रट लिया। क्रिकेट में इसे भगवान नज़र आते हैं और योग में नहीं!’
गंजू उस्ताद बोला-‘‘हां, आप भी तो कह रहे हैं कि योग बाबा भगवान नहीं हैं। कभी यह नहीं कहा कि क्रिकेट में भगवान नहीं हो सकते।’
ज्ञानी जी बोले-‘‘अबे चुप! ऐसी बात हम नहीं कह सकते जिससे हमारा हुक्कापानी बंद हो जाये। तेरे इस हास्य कवि की तरह हम भी फ्लाप होकर घर बैठ जायें। अबे दीपक बापू तू निकल यहां से! वरना मेरे चेलों को गुस्सा आ जायेगा।’’
गंजू उस्ताद बोले-‘‘इन पर आप अपना रौब न दिखाओ। इनकी कोई गलती नहीं है हम ही लाये थे इनको आपसे शास्त्रार्थ कराने। वह योग बाबा पर आपकी बात हमें पसंद नहीं आयी।’’
ज्ञानी जी बोले-‘‘तो इससे बाबा की बारह सौ करोड़ की संपत्ति पर एक हास्य कविता लिखा तो जाने! उसके काले धन पर यह क्या सोचता है हम भी तो सुने।’’
दीपक बापू बोले-‘‘बाबा के पास केवल बारह सौ करोड़ की संपत्ति है, बस! बहुत कम है! हम तो सोचते थे कि दो चार लाख करोड़ की संपत्ति होगी। उनका नाम फोर्ब्स पत्रिका में शायद इसलिये ही नहीं आता क्योंकि उसके हिसाब से बहुत कम है।
ज्ञानी जी दीपक बापू को घूरकर बोले-‘‘अच्छा! पांच रुपये की बीड़ी पंद्रह दिन चलाने वाले को बारह सौ करोड़ रुपये कम नज़र आ रहे हैं? क्या बात है! घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने! अरे हास्य कवि, पहले यह बता कि लाख में कितने शून्य आते हैं। जवाब दे तब पूछेंगे इससे कठिन सवाल कि करोड़ में कितने अंक होते हैं।
दीपक बापू बोले-‘‘महाराज कहा जाता है कि जब अपनी औकात देखनी है तो नीचे देखो कि कितने लोग हैं तब मन को शांति मिलेगी। उसमें हमने यह भी जोड़ा है कि अगर ऊपर के आदमी को देखना है तो फिर उससे ऊपर भी देखना चाहिये कि उससे आगे कितने हैं तब दूसरे के प्रति ईर्ष्या कम होगी। इधर हमारा गणित गरीब हो गया है। इधर टीवी पर अनेक ऐसे समाचार आते हैं जिसमें कभी दो हजार करोड़ तो कभी पांच हजार करोड़ की चर्चा भी होती है। अमुक ने अमुक चीज इधर17 करोड़ में खरीदी और उसे पांच हजार करोड़ में उधर बेची। इसका मतलब यह है कि लाखों करोड़ वाले लोग हो गये हैं। यह बारह सौ करोड़ हमें कम लगती है तो अच्छा ही है क्योंकि तब किसी से ईर्ष्या नहंी होती।’’
ज्ञानी जी को अपना ज्ञान अब गणित से पिटता नजर आ रहा था। वह बोले-‘अरे यार तुम्हारा राजनीतिक दृष्टिकोण शून्य है। अब तुम जाओ, हमारा समय खराब न करो।’’
गंजू उस्ताद बोला-‘‘पहले यह बताओ दोनों में से कौन जीता! यह लाखोंकरोड़ रुपये की बात हमारी समझ में नहीं आयेगी। इसलिये तो टीवी देखना ही बंद कर दिया है।’
दीपक बापू उस पर गुस्सा दिखाते हुए बोले-‘चल मूर्ख कहीं के! ज्ञानी जी की मजाक बनाता है, भला इनसे कौन जीत सकता है।’
गंजू उस्ताद और दीपक बापू वहां से चल दिये। थोड़ा आगे चलकर गंजू उस्ताद बोला-‘यार, दीपक बापू हमें यह तो बताओ कि करोड़ में कितने अंक होते हैं।’
दीपक बापू बोले-‘चल मूर्ख कहीं के! हमें क्या पता! अच्छा हुआ अपनी पोल खुलने से बच गयी। चल तो पान वाले को बीड़ी के पांच सौ करोड़ रुपये दे आते हैं।’
गंजू उस्ताद एक चौंक गया-‘‘कितने दीपक बापू!’
दीपक बापू बोले-‘अरे, यह ज्ञानी जी वजह से हमारा दिमागी संतुलन बिगड़ गया और बहुत सारी बिंदियां दिमाग में आ गयी इसलिये पांच रुपये को…………कितना बोला था! पता नहीं कितनी बिंदियां दिमाग में आ गयीं।’

—————-
नोट-‘यह हास्य व्यंग्य काल्पनिक है तथा किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका

Advertisements
Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: