घाट घाट का पानी पिया-हिन्दी शायरी (ghat ghat ka pani piya-hindi shayari)


जहां कद्र नहीं थी हमारी
वहां अपना बसाया आशियाना
हमने क्यों बसाया,
बेकद्रों के लिये बेकार बहाया पसीना,
मगर फिर भी उन्होंने बेरुखी दिखाई
आसरा देने का अहसान भी जताया।
————
मालुम था भरोसा टूट जायेगा
फिर भी किया,
ख्वाब बिखरने का अंदेशा था
फिर भी उसे जिया,
धरती पर बहती जिंदगी की
यह नदिया
कितनी गहरी है यह किसने समझा
कभी हम डूबे
कभी तैरे
देखने की ख्वाहिश थी
इसलिये घाट घाट का पानी पिया।
———-
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका

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टिप्पणियाँ

  • डा० देश बन्धु बाजपेयी  On 04/07/2011 at 11:32 अपराह्न

    घाट घाट का पी गये, बेटा भारत्दीप /
    लेकर के आ जाइये, छोटी सी एक कीप //
    छोटी सुनदर कीप, यही तो वैतरणी है /
    तन्त्र, मन्त्र, षडयन्त्र, और फिर मुठ्करणी है //
    कह झन्डू कविराय, मिले जब भ्रष्टाचारी /
    गले मिलो, आरती उतारो,बनकर सन्चारी //

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