पेशेवर गुरु कभी ज्ञान का मार्ग नहीं दिखा सकते-हिंदी चिंत्तन लेख


                        दो हाथ, दो पांव, दो आंखें, दो कान और दो छिद्रों वाली नासिका हर देहधारी मनुष्य के पास प्रत्यक्ष दिखती हैं।  उसमें मौजूद मन, बुद्धि और अहंकार की प्रकृतियां भी रहती हैं पर वह प्रकटतः अपनी उपस्थिति का आभास नहीं देती।  फिर भी मनुष्य के चरित्र, व्यवहार, विचार और व्यक्तित्व में भिन्नता की अनुभूति होती है।  इस भिन्नता का राज समझने के लिये श्रीगीता में वर्णित विज्ञान सूत्रों को समझना जरूरी है।  उसमें जिस त्रिगुणमयी माया के बंधन की चर्चा की गयी है वह दरअसल ज्ञान का वह सूत्र है जिसका वैज्ञानिक अध्ययन करने पर मनुष्यों में व्याप्त इस भिन्नता को समझा जा सकता है।

                        कर्म, स्वभाव, विचार, व्यवहार, और व्यक्तित्व सात्विक, राजस और तामस तीन प्रकार के ही होते हैं। आमतौर से लोग अपने स्वार्थपूर्ति में लगे रहते हैं जो कि राजस भाव है।  अगर मनुष्य पूरी तरह से राजस बुद्धि से ही कर्म करे तो भी एक बेहतर स्थिति है पर होता यह है कि लोग कर्मफल के लिये इतने उतावले रहते हैं कि उनकी बुद्धि शिथिल हो जाती है।  वह अपने कार्य के लिये दूसरों की राय के लिये मोहताज रहते हैं। यह बुद्धि का आलस्य तामस वृति का परिचायक है।  इस विरोधाभास को हम अपने समाज में देख सकते हैं। इस प्रकार के आचरण ने ही समाज में अंधविश्वास को जन्म दिया है।

                        शुद्ध हृदय के साथ अगर निष्काम भाव से भगवान की भक्ति की जाये तो न केवल अध्यात्मिक विषय में दक्षता प्राप्त होती है वरन् सांसरिक कार्य भी सिद्ध होते हैं।  यह सभी जानते हैं पर उसके बावजूद कर्मकांडों के नाम पर तांत्रिकों और कथित सिद्धों के पास अनुष्ठान कराने जाते हैं।  श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार सारे मनुष्य अपने कर्म के अनुसार फल पाते हैं पर हमारे देश में कथित रूप से ऐसे कर्मकांडों को माना जाने लगा है जिससे लोग अपने पुरखों को स्वर्ग दिलाने के साथ ही अपने लिये वहां  स्थान सुरक्षित करने के लिये अनुष्ठान करने के लिये तत्पर रहते हैं। श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार भक्ति का सवौत्तम रूप निरंकार ब्रह्म की निष्काम उपासना है। दूसरे क्रम में देवताओं यानि सकाम भक्ति को भी स्वीकार किया गया है। पितर या प्रेत भक्ति को तीसरा स्थान दिया गया है। हमारे देश के निरंकार की उपासना करने वाले बहुत कम हैं पर साकार रूप के उपासक भी अंततः प्रेत पूजा हठपूर्वक करते हैं। यह भी तामस प्रकृति है। लोग कहते हैं कि क्या हुआ अगर हमने सभी तरह से सभी स्वरूपों की पूजा कर ली? दरअसल यह अस्थिर भक्ति भाव को दर्शाता है जो कि शुद्ध रूप से तामस प्रकृति का प्रमाण है।

                        हमारे देश में कथित रूप से श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान के अनेक प्रचारक हैं पर उनका आचरण देखकर यह कभी नहंी लगता कि उन्होंने स्वयं उस ज्ञान को धारण किया हुआ है।  ज्ञान होने से कोई ज्ञानी नहीं हो जाता बल्कि उसे धारण करने वाला ही सच्चा ज्ञानी है।  ज्ञानी कभी आत्मप्रचार नहीं करते वरन् उनके आचरण से लोगों को स्वयं सीखना चाहिये।  लोग यह चाहते हैं कि बने बनाये और प्रचारित गुरुओं का सानिध्य उन्हें मिल जायें। वह उनके पंाव छूकर स्वयं को धन्य समझते हैं।  यहां लोगों से अधिक उन कथित गुरुओं के अज्ञान पर हंसा जा सकता है।  संत कबीरदास ऐसे गुरुओं का पाखंडी मानते हैं जो दूसरों से अपने पांव छुआते हैं।  गुरु कभी शिष्यों का संग्रह नहीं करते और न ही शिष्यों को ज्ञान देने के बाद फिर अपने पास चक्कर लगवाते हैं।  इस सब बातों को देखें तो हम यह बात मान सकते हैं कि धर्म के नाम पर हमारे यहां तामस प्रवृत्तियों वाले लोग  अधिक सक्रिय हैं। सच बात तो यह है कि गुरु सहज सुलभ नहीं होते। न ही रंग विशेष का वस्त्र पहनने वाले लोग ज्ञानी होेते हैं। ज्ञानी कोई भी हो सकता है।  संभव है किसी ने श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन नहीं किया हो पर उसके अंदर स्वाभाविक रूप से वह मौजूद हो।  यह उसके कार्य तथा जीवन शैली से पता चल जाता है। अंतः गुरु के रूप में उसी व्यक्ति को स्थान देना चाहिये जो सांसरिक विषयों में लिप्त रहने के बावजूद अपने आचरण में शुद्धता का पालन करता है।

दीपक राज कुकरेजाभारतदीप

ग्वालियर,मध्यप्रदेश

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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