केवल हाथ पांव हिलाना आसन नहीं होता-योग विद्या पर हिन्दी चिंत्तन लेख(kewal hath paanv hilana asan nahin hota-yoga vidha par hindi chinntan lekh)


                                    भारतीय योग सूत्र में आठ भाग हैं जिसमें आसन का क्रम चौथे पर आता है।  आजकल योग शिक्षकों ने विभिन्न प्रकार के व्यायामों को भी आसन कहना प्रारंभ किया है। यह बुरा नहीं है पर जिनको योग साधना का ज्ञान रखना है उन्हें यह समझना चाहिये कि आसन से आशय  केवल देह की स्थिरता से है।  अनेक लोग शारीरिक श्रम करते हैं उनको आसन के नाम पर व्यायाम करने से थोड़ी हिचक होती है। उन्हें लगता है कि वह तो श्रम कर पसीना बहाते हैं इसलिये उनको किसी प्रकार की  योग साधना की आवश्यकता नहीं है।  इसी भ्रम के कारण अनेक लोग योगासन की अपेक्षा कर देते हैं। दूसरी बात यह है कि जिनका जीवन सुविधामय है वह योगासन के नाम पर केवल व्यायाम कर दिल बहला लेते है।  उन्हें आसन का आशय पता नहीं है जिस कारण वह पूरा लाभ उठा नहीं पाते।

पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि

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स्थिरसुखमासनम्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-स्थिर सुख से बैठने का का नाम आसन है।

                        आसनों के बहुत भेद नहीं है। हालांकि अनेक विद्वानों ने समय समय पर योग विद्या के विकास के लिये काम किया है जिससे अनेक प्रकार के व्यायाम के प्रकारों को भी आसन बताया जाता है।  इन आसनों के बीच सांसों को रोकने और छोड़ने की प्रक्रिया के समय देह के स्थिर होने पर आसन स्वतः ही लगता है। आधुनिक युग में अनेक प्रकार के आसनों का अविष्यकार इसलिये भी किया गया ताकि शारीरिक श्रम से परे लोगों को व्यायाम के लिये सुविधा मिल सके।  मूलतः रूप से शरीर को स्थिर रखने का नाम ही आसन है।  जिन लोगों को व्यायाम आदि करने से हिचक लगती है या वह इसकी आवश्यकता अनुभव नहीं करते उन्हें किसी शुद्ध स्थान पर त्रिस्तरीय आसन पर बैठना चाहिये।  श्रीमद्भागवत गीता में कुश, मृगचर्म और वस्त्रों को बिछाकर आसन लगाने की बात कही गयी है। आधुनिक युग में मृगचर्म आम रूप से उपलब्ध नहीं है तो उसके लिये दरी को वैकल्पिक रूप से प्रयोग किया जा सकता है। कुश न मिले तो प्लास्टिक की चादर ली जा सकती है पर आजकल शादी विवाहों में जो जूट के कालीन बिछाये जाते हैं उनके छोटे टुकड़े भी उपयोग मेें लाये जा सकते है।  इन्हें बिछाकर शांति और सुख से बैठकर प्राणायाम, ध्यान और मंत्र जाप किये जा सकते हैं। जिन लोगों को प्रातः घूमने की आदत है उन्हें भी उसके पश्चात् इस तरह आसन बिछाकर ध्यान योग अवश्य करना चाहिये।

                        हमारे यहां अनेक योग शिक्षक अलग अलग प्रकार से शिक्षा दे रहे हैं। उनमें कोई विरोधाभास नहीं है पर आम लोग कहीं न कहीं भ्रमित हो जाते हैं।  अनेक लोग इसी कारण योग करने में हिचकते हैं कि आखिर किस तरह इसे करें? उन्हें यह समझना चाहिये कि व्यायाम हालांकि योग का भी भाग है पर उसे करें यह आवश्यक नहीं है।  योग का मूल रूप मनुष्य के स्थिर होकर बैठने के बाद प्राणायाम, ध्यान, धारणा, और समाधि करने की प्रक्रिया में संलिप्त होना है।  अपनी इंद्रियों को आत्मा से और आत्मा का परमात्मा से संयोग ही योग साधना का सर्वोच्च परिणाम है। इसी से मनुष्य जीवन की आधार  देह में शुद्धता, मन में दृढ़ता विचारों में पवित्रता के साथ ही व्यक्तित्व में तेज का निर्माण होता है।  वैसे इस विषय पर अगर कोई गुरु अपनी बात कहे तो उसकी उपेक्षा नहीं करना चाहिये पर साथ ही योग विषय पर साहित्य का अध्ययन कर स्वयं भी प्रयोग करना चाहिये।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
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3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
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