अतिनाटकीयता से लोकप्रियता नहीं मिलती-हिंदी व्यंग्य चिंत्तन


      लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावी राजनीति में सक्रिय रहने वाले लोगों को आम जनमानस में प्रचार माध्यमों से अपनी छवि बनाने का प्रयास करना ही पड़ता है। इसी प्रयास में उन्हें कभी गंभीर तो कभी नाटकीय दृश्य उपस्थित करने ही होते हैं।  हम अपने देश में चुनाव राजनीति में सक्रिय लोगों की नाटकीयता देखकर उन पर प्रतिकूल टिप्पणियां कर सकते हैं पर यकीन मानिए जिस पाश्चात्य समाज से हमने लोकतंत्र का ज्ञान  उधार पर लिया है वहां भी इसी तरह ही सब चलता रहता है। 

      चूंकि चुनावी राजनीति में सक्रिय लोगों को जनमानस में प्रचार माध्यमों के साथ ही आम सभाये आदि भी करनी होती हैं तो उनमें पैसा तो खर्च होता ही है और इसके लिये उनको धनपतियों से चंदा लेना ही पड़ता है।  हमारा मानना यह है कि इसमें भी कोई बुराई नहीं है।  पहले राजतंत्र के दौरान साहुकारों, सामंतों और जमींदारों को अपने राजा के सामने जाकर तोहफे साथ लेकर सलाम ठोकना पड़ता था।  यह अलग बात है कि वह राजा पर अपने व्यवसायिक हितों के अनुकूल चलने के लिये वह बाध्य नहीं कर सकते थे।  राज्य व्यवस्था और राजा बचा रहे तो समाज बचा रहता है और साहूकारों, जमीदारों और सामंतों के लिये यही जरूरी है तभी उनकी आय तथा परिवार की रक्षा हो सकती है। 

      आधुनिक लोकतंत्र में धनपतियों को यही नीति अपनानी पड़ती है तो आश्चर्य नहीं है क्योंकि इससे भी राज्य की स्थिरता बनी रहती है। प्रारंभिक लोकतांत्रिक दौर में यह देखा  गया कि जनप्रतिनिधियों पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगते थे पर शनै शैन विश्व में महंगाई का प्रकोप बढ़ा और चुनाव लड़ना सहज नहीं रहा तो इन धनपतियों के हाथों पश्चिमी देशों के राजनेता भी नतमस्तक होने लगे। देखा जाये तो राजतंत्र की जगह लोकतंत्र की स्थापना का लाभ धनपतियों को ज्यादा मिला है क्योंकि इसमें कोई स्थाई राज्य प्रमुख नहीं रहता।  निश्चित अवधि के बाद बदलाव होता रहता है।  जिस व्यक्ति को पद पर बने रहना है वह इन्हीं धनपतियों का मोहताज हो जाता है।

      आजकल के धनपतियों का व्यवसायिक दायर इतना बढ़ गया है कि खेल, राजनीति, फिल्म, कला, साहित्य, और पत्रकारिता तक के क्षेत्र में उनका दबदबा दिखाई देता है।  तेल बेचने, खेल खेलने, फिल्म बनाने, टीवी चैनल चलाने, समाचार पत्र प्रकाशित करने तथा तथा धार्मिक कार्यक्रम करने के साथ ही अनेक छोटे बड़े धंधों में वह  विनिवेश करते हैं।  एक ही पूंजीपति अनेक प्रकार के धंधों में लगा रहता है। एक तरह से पूरा समाज ही उनकी पकड़ में हैं। ऐसे में अगर कोई केवल पूंजीपति है तो उसे प्रसिद्धि के लिये कोई अन्य काम करने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे में भ्रष्टाचार का व्यापक रूप में सामने आता है।  कौटिल्य का अर्थशास्त्र में राजा से राजकर्मियों के भ्रष्टाचार पर नजर रखने की बात कही जाती है पर अब लोकतंत्र में राजा हो नहीं सकता।  आधुनिक लोकतंत्र के प्रभाव से पूंजीपति ही एक तरह से राजा बन गये हैं। पूर्व काल में राजा के बाद सामंतों, साहूंकारों और जमीदारों का नंबर आता था। उस दृष्टि से देखें तो आज के पूंजीपति इन तीनों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं और वही राजा बन गये हैं तब यह कहा जाना चाहिये कि अब एक राजा विहीन व्यवस्था है जिसे समाज की दृष्टि से खतरनाक ही कहा जा सकता है भले ही हम लोकतांत्रिक होने का दंभ पाल लें।

      चुनावी राजनीति में स्वयं को प्रजारक्षक साबित करने के लिये नाटकीयता का सहारा लेना ही पड़ता है। इस नाटकीयता से प्रचार माध्यमों को सामग्री मिलती है जिसे वह अपने विज्ञापनों के बीच प्रसारित कर सकते हैं।  इन्हीं प्रचार माध्यमों से जनता अपना मानस बनाती और बिगाड़ती है। पूंजीपति भी इसी आधार पर अपने चंदे की राशि का मापदंड तय करते हैं।  इस तरह नोट और वोट पाने के लिये इस लोकतांत्रिक नाटक में नाटकीयता नहीं होगी तो वह सफल नहीं हो सकता।  गड़बड़ वहां होती है जहां अतिनाटकीयता हो जाती है।

      दो तीन साल पहले अन्ना हजारे का आंदोलन चला जिसे प्रचार माध्यमों ने खूब भुनाया।  भारत में भ्रष्टाचार एक समस्या है और जनता उससे त्रस्त थी।  ऐसे में अन्ना हजारे ने जनलोकपाल कानून पास करवाने के लिये आंदोलन छेड़ा।  लोगों की समझ में यह तो आया कि वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कर रहे हैं पर उनका जनलोकपाल कानून बनवाने का विषय आमजनों के लिये अगेय यानि समझ से परे रहा।  लोग एक जनहित वाली व्यवस्था तो चाहते हैं पर उसके लिये कानून वगैरह बनाने का विषय उनके लिये अगेय ही रहता है। वैसे भी अगर इच्छा शक्ति हो तो वर्तमान कानूनों के आधार पर भ्रष्टाचार पर कार्यवाही हो सकती है पर हमारे देश में आजादी से पूर्व ही कानून बनवाने के लिये आंदोलन कर लोकप्रियता प्रांप्त करने की परिपाटी भी रही है। यह अलग बात है कि व्यवस्था के कुप्रबंध के चलते सारे कानून धरे रह जाते हैं।  इस आदंोलन में नाटकीयता थी पर जब उसने अति की सीमा पारी की तो जनमानस हताश होने लगा जिससे अन्ना हजारे अपने तय कानूनी प्रारूप से कुछ पीछे हटे और मान गये जिससे वह बन गया। अन्ना का आंदोलन थमा तो उनके भक्तों ने अपना राजनीतिक अभियान प्रारंभ किया।  ऐसा लगता है कि उन्होंने तो एकदम पटकथा लिखकर ही अपने नाटकीय अभियान को प्रारंभ किया।  अब उसमें इतनी नाटकीयता आ गयी कि  लोग उनसे भी उकताने लगे।  यह अन्ना भक्त उस जनलोकपाल को जोकपाल कहते हैं जिस पर अन्ना सहमत हो चुके हैं।  अब तो यह जनलोकपाल का विषय लेकर पूरे देश में पहुंचाना चाहते हैं।  मगर मुर्गे की वही एक टांग! भ्रष्टाचार मुद्दा है पर जनलोकपाल अगेय विषय है। फिर इनकी अतिनाटकीयता उसी प्रचार पर्दे पर दिख रही है जिसने उन्हें प्रसिद्धि दिलवायी है। आंदोलनकारी से नायक बने इन अन्ना भक्तों को शायद यह पता नहीं है कि उनके प्रयास कभी कभी तो हास्य का भाव पैदा करते हैं। हालांकि राजनीति में कुछ भी कहना कठिन है पर एक बात तय है कि अतिनाटकीयता से उनको उसी प्रचार में हानि पहुंचेगी जिसने उनके नायकत्व का भाव बढ़ाया जो कि घटने लगा है।

      मजेदार बात यह है कि कभी लगता है कि अन्ना के राजनीतिक भक्तों के  किसी एक प्रयास उनका  प्रचार भाव बढ़ा तो किसी से घटा दिखता है। कभी कभी तो लगता है कि प्रचार माध्यमों के प्रबंधक चाहते हैं कि यह सब चलता रहे ताकि उनके पास विज्ञापनों के बीच समाचारों प्रसारण की सामग्री बनती रहे। सच बात तो यह है कि अगर इस तरह के नाटकीय समाचार प्रसारण वाली सामग्री न हो तो अनेक समाचार चैनल श्रोताओं और दर्शकों के लिये तरसत रहे जायेंगे।  यह अलग बात है कि इसमें अगर अतिनाटकीयता का भाव आया तो अंततः लोग उससे विरक्त हो जायेंगे। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था को धनपतियों ने एकदम ऐसी राजाविहीन व्यवस्था बना दी है जिसमें उनका व्यक्तित्वसर्वोपरि है और अन्य जनता उन्हें चुपचाप झेलती रहे, जिसे भेदने का प्रयास अन्ना के राजकीय भक्त कर रहे हैं उसमें यह  अतिनाटकीयता संकट नहीं बनेगी कहना कठिन है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।

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