उनकी दरियादिली-हिन्दी कवितायें


ईमानदार हो या नहीं

ज़माने को बहलाने के लिये

दिखना जरूरी है।

किसी के जिस्म पर रहम करें

मगर दौलत और शोहरत के लिये

इंसानों के जज़्बातों से

खेलना जरूरी है।

कहें दीपक बापू सबसे ऊंचा हिमालय

त्यागियों का ही आश्रयदाता है

जज़्बातों के सौदागरों की छवि

सन्यासी जैसी दिखाने के लिये

नकली हिमालय बनाना जरूरी है।

————

हमसे तेल लेकर

अपने घर की

रौशनी उन्होंने जलाई।

चहक रहे हैं वह

अपनी मस्ती में

न चिराग अपना न दियासलाई।

कहें दीपक बापू रौशनदान से

हम भी झांक लेते हैं,

कैसे वह अपनी दरियादिली

अपने मुंह से फांक देते हैं,

ज़माने की क्या करेंगे भलाई

पहले स्वयं तो खा लें मलाई।

———-

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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