Tag Archives: आध्यात्म

तरक्की पर चर्चा-हिन्दी व्यंग्य काव्य रचनाये


तरक्की का आसमान हमें वह दिखाते हैं,

गरीबी की बात करो तो मजबूरी में जीना सिखाते हैं।

कागज पर लिख रखे हैं उन्होंने तरक्की के पैमाने,

अपनी असलियत की बात करो तो बनते अनजाने,

रंगे हुए लोहे के सामान को जमा कर लिया है,

सब उधार का है  दिखाते जैसे कमा कर लिया है,

कहें दीपक बापू औकात की बात करो तो सीना तानते

पैसे का सवाल हो तो गरीबों की सूची में भी नाम लिखाते हैं।

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पता नहीं लोग कहां हुई तरक्की पर चर्चा करते हैं,

हम आज  भी हर जगह पेन से कागज पर पर्चा भरते है।

कहें दीपक बापू कागजी शेरों का हाथ में दी व्यवस्था

तरक्की बंद कर देते हैं वह अल्मारी मे

मजबूर को बेबस बनाकर जो अपना दिल भरते हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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नाकाम आशिक कलम छोड़ हथियार उठाते हैं-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


आशिकों के कातिल बन जाने की खबर रोज आती है,

टीवी पर विज्ञापनों के बीच सनसनी छा जाती है।

कहें दीपक बापू दिल कांच की तरह टूट कर नहीं बिखरते

अब भड़ास अब गोली की तरह चलकर आग बरसाती है।

——-

आशिक नाकाम होने पर अब मायूस गीत नहीं गाते है,

कहीं गोली दागते कहीं जाकर चाकू चलाते हैं।

कहें दीपक बापू इश्कबाज हो गये इंकलाबी

नाकाम आशिक कलम छोड़कर  हथियार चलाते हैं।

———-

आशिकों ने प्रेमपत्र लिखने के लिये कलम उठाना छोड़ दिया है,

एक हाथ का मोबाइल दूसरे का चाकू से नाता जोड़ दिया है,

कहें दीपक बापू इश्क पर क्या कविता और कहानी लिखें,

टीवी पर चलती खबरों ने उसे सनसनी की तरफ मोड़ दिया है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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नई खबर-हिंदी व्यंग्य कविता


लोगों के सामने पर्दे चलने के लिये रोज नयी खबर चाहिये,

प्रचार प्रबंधक ढूंढते हैं बयानवी इस पर नाराजगी नहीं जताईये।

सनसनीखेज शब्द हों तो चर्चा और बहस की सामग्री जुटाते हैं,

बीच में चलते सामानों के विज्ञापन जिन पर लोग दिल लुटाते हैं,

चमकाये जाते हैं वह चेहरे जो देते हैं किसी का नाम लेकर गालियां,

उस पर जारी बहस में कोई वक्ता होता नाराज कोई बजाता तालियां,

पर्दे पर खबरें ताजा खबर के लिये किसी को भी बनाते नायक,

बासी होते ही उसके चेहरे में ताजगी भरते बताकर खलनायक,

कहें दीपक बापू बयानवीरों और प्रचार प्रबंधकों खेल तयशुदा है

इधर से सुनिये उधर से निकालिये अपना दिल न सताईये।

————–

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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भर्तृहरि नीति शतक-अपने स्वार्थ हो तो भी गजराज की तरह व्यवहार करें


      इस संसार में भूख सभी को लगती है पर भोजन पाने और करने के सभी के तरीके अलग हैं।  अपना कमाकर खाने वाले लोग जहां जीवन में आत्मविश्वास से भरे होते हैं वही दूसरे से कर्ज, भीख अथवा मदद मांगने वाले लोग हमेशा ही हृदय में दीनता का भाव लेकर जीते हैं। कहा जाता है कि जैसा खायें अन्न वैसा ही होता है मन। इसका आशय अन्न के दानों का स्वरूप ही नहीं वरन् उसके लिये अर्जित धन से साधन से भी जोड़ना चाहिये।  यह भी कहा जाता है कि परमात्मा पेट देने से ही पहले अन्न के दानों पर खाने वाले का नाम लिख देता है। यह ज्ञान रखने वाले लोग आत्मविश्वास से जीवन में अपना हर काम करते हैं। इसके विपरीत जो मन में कर्ता का भाव लिये होते हैं उन्हें परमात्मा की इस सांसरिक कृति पर यकीन नहीं होता इसलिये अपनी आवश्यकताओं के लिये वह अतिरिक्त सक्रियता दिखाते हैं। उनके मस्तिष्क में चिंताओं का ढेर भरा होता है।  जिसके चलते न केवल वह दैहिक बल्कि मानसिक रूप से भी अस्वस्थ हो जाते हैं।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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ङ्गल चालनमधरश्चरणावपातं भूमी निपत्य वदनोदर दर्शनं च।

श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुङ्गवस्तु धीरं विलोकयति चाटुशतैश्च भुङ्वते।।

     हिन्दी में भावार्थ-कुत्ता भोजन देने वाले के आगे पूंछ हिलाकर उसके सामने मुंह वह पेट दिखाते हुए लोटपोट उसके  अपनी दीनता प्रदर्शित करता है जबकि हाथी उसे गंभीरता से देखता है और कई बार मनाने पर ही भोजन ग्रहण करता है।

कृमिकुलचित्तं लालक्लिन्नं विगन्धिजुगुप्सितमु निरुपमरसं प्रीत्या खादनन्नरास्थि निरामिषम्।

सुरपतिमपि श्वा पार्श्वस्यं विलोक्य न शंकते न हि गणवति क्षुद्रो जन्तु पिरग्रहफलगुनाम्।।

हिन्दी में भावार्थ-कीड़ों से युक्त, रसहीन, दुर्गंध से भरी, स्वादरहित, घृणित हड्डी को पकड़ कर बहुत उत्साह से चबाता है। उस सयम अपने पास आये देवता की भी उसे परवाह नहीं होती।

      हम देख रहे हैं कि हमारा परंपरागत भारतीय समाज पूरी तरह से बिखर चुका है।  यह कहा जरूर जाता है कि हम एक संगठित भारतीय समाज के सदस्य हैं पर  सभी को पता है कि यह दावा एकदम खोखला है।  सभी दावा करते हैं कि वह किन्हीं जातीय, धार्मिक, भाषाई अथवा विशिष्ट समाज के सदस्य होने के कारण सुरक्षित अनुभव करते हैं पर सच यह है किसी को हृदय से अपनी ही बात पर ही यकीन नहीं होता है।  पाश्चात्य वस्तुओं को अपनी दैनिक तथा सांस्कारिक आवश्यकताओं के मूल से जोड़ने वाले हमारे  भारतीय समाज का मनोबल गिरा हुआ है।  हम भ्रष्टाचार तथा बेईमानी के विरुद्ध प्रत्यक्ष रूप से अभियान छेड़ने की बात तो करते हैं पर यह भूल जाते हैं कि इसमें लिप्त लोग इसी भारतीय समाज के सदस्य हैं।  भ्रष्टाचार और बेईमानी में लगे लोगों को दूसरे का अपराध तो दिखता है पर अपना धन का लोभ इस आशंका के मारे नहीं छोड़ पाते कि अगर संपन्नता नहीं है तो समाज उनको पूछेगा भी नहीं-यही नहीं वह लोग अपने बेईमानी को मेहनत की कमाई मानने का तर्क स्वयं को देकर ही समझाते हैं।

      कहने का अभिप्राय यह है कि हम दूसरे की तरफ न देखें वरन् अपने व्यवहार, विचार तथा व्यक्तित्व पर दृष्टिपात करें।  अगर हम दृढ़ता पूर्वक सत्य का मार्ग लेंगे तो कभी जीवन में कुंठा का अनुभव नहीं होगा।  जो व्यक्ति सिद्धांत पर दृढ़ रहता है उसके मुख मंडल पर तेज स्वतः प्रकट होता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

 

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

 

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पर्दे पर रोज नयी खबर चाहिये-हिन्दी व्यंग्य कविता


लोगों के सामने पर्दे चलने के लिये रोज नयी खबर चाहिये,

प्रचार प्रबंधक ढूंढते हैं बयानवीन इस पर नाराजगी नहीं जताईये।

सनसनीखेज शब्द हों तो चर्चा और बहस की सामग्री जुटाते हैं,

बीच में चलते सामानों के विज्ञापन जिन पर लोग दिल लुटाते हैं,

चमकाये जाते हैं वह चेहरे जो देते हैं किसी का नाम लेकर गालियां,

उस पर जारी बहस में कोई वक्ता होता नाराज कोई बजाता तालियां,

पर्दे पर खबरें ताजा खबर के लिये किसी को भी बनाते नायक,

बासी होते ही उसके चेहरे में ताजगी भरते बताकर खलनायक,

कहें दीपक बापू बयानवीरों और प्रचार प्रबंधकों खेल तयशुदा है

इधर से सुनिये उधर से निकालिये अपना दिल न सताईये।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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परमार्थ करने वाले सच्चे लोग नाटकबाजी नहीं करते-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख


      भारत में लोकसभा चुनाव 2014 के लिये कार्यक्रम घोषित किये जा चुका है।  शुद्ध रूप से राजसी कर्म में प्रवृत्त लोगों को लिये एक तरह से यह चुनाव कुंभ का मेला होता है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार कोई मनुष्य  पूर्ण रूप से सात्विक  या तामसी प्रवृत्ति का हो अपने जीवन निर्वाह के लिये अर्थार्जन का कार्य करना ही पड़ता है जो कि एक तरह से राजसी प्रकृत्ति का ही होता है।  दूसरी बात यह भी है कि राजसी कर्म करते समय मनुष्य को राजसी प्रकत्ति का ही अनुसरण करना चाहिये इसलिये ज्ञानी या सात्विक प्रकृत्ति के व्यक्ति में अर्थार्जन के लिये उचित साधन होने पर उसकी क्रियाओं में दोष देखकर यह मान लेना कि वह अपनी मूल प्रकृत्ति से दूर हो गया, यह विचार धारण करना गलत होगा।  ज्ञानी और सात्विक व्यक्ति राजसी कर्म करने के बावजूद उसमें अपने मूल भाव का तत्व अवश्य प्रकट करते हैं। इसके विपरीत जो राजसी प्रकृत्ति मे हैं वह राजसी कर्म करते समय किसी सिद्धांत का पालन करें यह आवश्यक नहीं होता।  उनके लिये अपना ही लक्ष्य सर्वोपरि होता है। देखा जाये तो सामान्य गृहस्थ हो या राजकीय कर्म करने वाला विशिष्ट व्यक्ति दोनों का लक्ष्य अर्थोपार्जन करना ही होता है।  सामान्य गृहस्थ जहां अपनी गृहस्थी का राजा होता है वहीं राजकीय व्यक्ति को किसी उपाधि की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।  राजकीय कर्म तो राजसी प्रकृत्ति से ही किये जा सकते हैं इसलिये वहां पूर्ण सैद्धांतिक शुचिता के पालन की अनिवार्यता की आशा व्यर्थ ही की जाती है। 

भृर्तहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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पद्माकरं दिनकरो विकची क्ररीति चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवातम्।।

नाभ्यार्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति संतः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः।।

     हिन्दी में भावार्थ-सूर्य बिना याचना किये ही कमल को खिला देता है, चंद्रमा कुमुदिनी को प्रस्फुटित कर देता है। बादल भी बिना याचना के ही पानी बरसा देते हैं। इसी तरह सत्पुरुष अपनी ही अंतप्रेरणा से ही परोपकार करते हैं।

      लोकतंत्र में चुनावों के लिये उतरने वाले लोग आम जनमानस को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिये अनेक प्रकार के प्रयास करते हैं।  अनेक तरह के वादे तथा आश्वासन देने के साथ ही वह आमजनों को धरती पर ही स्वर्ग दिखाने का सपना दिखाते हैं। एक तरह से देखा जाये तो लोकतांत्रिक राजकीय प्रणाली ने विश्व में पेशेवर शासकों की पंरपरा स्थापित की है। प्रधानमंत्री हो या राष्ट्रपति या अन्य कोई जनप्रतिनिधि वह खजाने से अपने व्यय के लिये प्रत्यक्ष रूप से धन नहीं ले सकता वरन् वह एक सेवक की तरह उसे वेतना प्रदान किया जाता है।  यह अलग बात है कि जितना बड़ा राजकीय पद हो वहां विराजमान व्यक्ति को राज्य के धनपति, साहुकार, तथा उद्योगपति उसी के स्तर के अनुसार भेंट देने के लिये तत्पर रहते हैं जैसे पहले राजाओं को मिलते थे।  हमारे ग्रंथों में ऐसे अनेक उदाहरण है जब राजपद धारण करने पर राज्य के जमीदार, साहुकार तथा धनवान अपने राजा को भेंट देते थे।  इस तरह की भेंट लेना कम से कम हम जैसे अध्यात्मिक दृष्टि से कोई गलत नहीं है। यह  अलग बात है कि राजपद पाने के लिये उत्सुक लोग स्वयं को एक त्यागी व्यक्ति के रूप में प्रचारित कर जनमानस का हृदय जीतने का प्रयास करते हैं।  त्याग का भाव सात्विक कर्म का परिचायक है जिसकी उपस्थिति राजसी कर्म  में नहीं की जा सकती।

      यही से आधुनिक लोकतंत्र में अनेक नाटकों का प्रारंभ हो जाता है। इधर उदारीकरण ने निजी क्षेत्र को अधिक अवसर प्रदान किये हैं।  तेल से लेकर खेल तक और संचार साधनों से लेकर प्रचार माध्यमों तक पूंजीपतियों का एकछत्र राज्य हो गया है। मनोरंजन कार्यक्रमों में फूहड़ कामेडी तो समाचारों में नाटकीय घटनाक्रम को महत्व मिल रहा है।  कभी कभी तो यह लगता है कि फिल्म के अभिनेता फिल्म या धारावाहिक में पटकथा के आधार पर जिस तरह अभिनय करते हैं उसी तरह खिलाड़ी भी मैच खेलते हैं।  उससे ज्यादा मजेदार बात यह है कि अनेक लोग तो केवल इसलिये समाज सेवा या राजकीय उपक्रम इस तरह करते हैं ताकि उनको प्रचार माध्यमों में स्थान मिलता रहे।  हालांकि प्रचार माध्यम उनकी मजाक उड़ाते हैं पर फिर भी उनके बयानों पर बहस और चर्चा करते हैं जिसके दौरान उनके विज्ञापनों का समय खूब पास होता है। हम यह भी कह सकते हैं कि प्रचार प्रबंधक और बाज़ारों के स्वामियों का कोई संयुक्त उपक्रम हैं जो इस तरह के नाटकीय पात्रों का सृजन कर रहा है जिससे समाज अपनी समस्याओं को भूलकर मनोरंजन में लीन रहे।  कोई जनविद्रोह यहां न फैले वरन् यथास्थिति बनी रहे।

      अब तो समाचार और नाटकों में कोई अंतर ही नहीं दिख रहा।  जैसे जैसे यह चुनाव पास आयेंगे उसी तरह नाटकीय का दौर बढ़ेगा यह बात प्रचार माध्यमों के प्रबंधक स्वयं कह रहे हैं। योग तथा अध्यात्मिक साधकों ने जिज्ञासावश नहीं वरन् कौतूहल से इस नाटकीयता को देखें।  यह नाटकीय लोग देश और समाज की फिक्र करते दिखते हैं। आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था को जनोन्मुखी बनाने का दावा करते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि समाज सेवा का व्रत इस तरह लिया है जिसमें चंदा और भेंट मिलती रहे। हम यह समझ लेना चाहिये कि परोपकारी लोग कोई प्रचार नहीं करते। वह कोई योजना नहीं बनाते।  सबसे बड़ी बात यह है कि वह कोई दावा नहीं करते।  हमारा देश तो वैसे भी भगवत्कृपा से संपन्न है।  इसे कोई संपन्न क्या बनायेगा? गरीबों को कोई अमीर बना नहीं सकता और कोई लालची अमीरों के आगे हाथ फैलाने से कोई बच नहीं सकता।  कुछ लोग गरीब हैं पर वह भिखारी नहीं है जिसे यह लोग संपन्न बनाने का दावा करते हैं। गरीब अपने श्रम पर जिंदा हैं और इनमें से अधिकतर जानते हैं कि उनके भले का नारा लगाकर कोई भी राजकीय पद प्राप्त कर लें पर फायदा देने वाला नहीं है।  अंततः उनको अपने श्रम का पैसा किसी धनी से ही मिलता है इसलिये उसके मिटने की कामना भी वह नहीं करते। राज्य बना रहे यही कामना उनकी भी रहती है ताकि उनका जैसा भी घर चल रहा है वैसे चलता भी रहे। परोपकार का दावा करने वालों से वह भीख मांगने नहीं जाते यह अलग बात है कि इस तरह के ढोंग में लीन लोगों को अपने लोकप्रिय होने की खुशफहमी प्रचार की वजह से हो जाती है।

 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

दाम लेकर करें समाज सेवा-हिंदी व्यंग्य कविता


दुनियां का हर इंसान  आशिक है किसी न किसी का,

कोई दौलत, कोई बदन कोई पसीना चाहे मुफ्त किसी का।

जितना खाये कोई भी उसकी भूख नहीं मिट पाती,

सूखी रोटी मिले तो घी से चुपड़ी के लिये जीभ ललचाती,

सौंदर्य प्रसाधन से सजे चेहरे पर आंखें जमकर रह जाती है,

एक से ऊबता है दिल दूसरे शिकार पर नज़र जाती है,

मुफ्त के मददगार को समझें मूर्ख कहें फरिश्ता,

पराया खून पानी माने अपने पसीने का समझें सोने से रिश्ता,

कहें दीपक बापू मौके के हिसाब से बनाते अपना नजरिया,

मतलब के सगे सभी है वफादार नहीं कोई किसी का।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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अतिनाटकीयता से लोकप्रियता नहीं मिलती-हिंदी व्यंग्य चिंत्तन


      लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावी राजनीति में सक्रिय रहने वाले लोगों को आम जनमानस में प्रचार माध्यमों से अपनी छवि बनाने का प्रयास करना ही पड़ता है। इसी प्रयास में उन्हें कभी गंभीर तो कभी नाटकीय दृश्य उपस्थित करने ही होते हैं।  हम अपने देश में चुनाव राजनीति में सक्रिय लोगों की नाटकीयता देखकर उन पर प्रतिकूल टिप्पणियां कर सकते हैं पर यकीन मानिए जिस पाश्चात्य समाज से हमने लोकतंत्र का ज्ञान  उधार पर लिया है वहां भी इसी तरह ही सब चलता रहता है। 

      चूंकि चुनावी राजनीति में सक्रिय लोगों को जनमानस में प्रचार माध्यमों के साथ ही आम सभाये आदि भी करनी होती हैं तो उनमें पैसा तो खर्च होता ही है और इसके लिये उनको धनपतियों से चंदा लेना ही पड़ता है।  हमारा मानना यह है कि इसमें भी कोई बुराई नहीं है।  पहले राजतंत्र के दौरान साहुकारों, सामंतों और जमींदारों को अपने राजा के सामने जाकर तोहफे साथ लेकर सलाम ठोकना पड़ता था।  यह अलग बात है कि वह राजा पर अपने व्यवसायिक हितों के अनुकूल चलने के लिये वह बाध्य नहीं कर सकते थे।  राज्य व्यवस्था और राजा बचा रहे तो समाज बचा रहता है और साहूकारों, जमीदारों और सामंतों के लिये यही जरूरी है तभी उनकी आय तथा परिवार की रक्षा हो सकती है। 

      आधुनिक लोकतंत्र में धनपतियों को यही नीति अपनानी पड़ती है तो आश्चर्य नहीं है क्योंकि इससे भी राज्य की स्थिरता बनी रहती है। प्रारंभिक लोकतांत्रिक दौर में यह देखा  गया कि जनप्रतिनिधियों पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगते थे पर शनै शैन विश्व में महंगाई का प्रकोप बढ़ा और चुनाव लड़ना सहज नहीं रहा तो इन धनपतियों के हाथों पश्चिमी देशों के राजनेता भी नतमस्तक होने लगे। देखा जाये तो राजतंत्र की जगह लोकतंत्र की स्थापना का लाभ धनपतियों को ज्यादा मिला है क्योंकि इसमें कोई स्थाई राज्य प्रमुख नहीं रहता।  निश्चित अवधि के बाद बदलाव होता रहता है।  जिस व्यक्ति को पद पर बने रहना है वह इन्हीं धनपतियों का मोहताज हो जाता है।

      आजकल के धनपतियों का व्यवसायिक दायर इतना बढ़ गया है कि खेल, राजनीति, फिल्म, कला, साहित्य, और पत्रकारिता तक के क्षेत्र में उनका दबदबा दिखाई देता है।  तेल बेचने, खेल खेलने, फिल्म बनाने, टीवी चैनल चलाने, समाचार पत्र प्रकाशित करने तथा तथा धार्मिक कार्यक्रम करने के साथ ही अनेक छोटे बड़े धंधों में वह  विनिवेश करते हैं।  एक ही पूंजीपति अनेक प्रकार के धंधों में लगा रहता है। एक तरह से पूरा समाज ही उनकी पकड़ में हैं। ऐसे में अगर कोई केवल पूंजीपति है तो उसे प्रसिद्धि के लिये कोई अन्य काम करने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे में भ्रष्टाचार का व्यापक रूप में सामने आता है।  कौटिल्य का अर्थशास्त्र में राजा से राजकर्मियों के भ्रष्टाचार पर नजर रखने की बात कही जाती है पर अब लोकतंत्र में राजा हो नहीं सकता।  आधुनिक लोकतंत्र के प्रभाव से पूंजीपति ही एक तरह से राजा बन गये हैं। पूर्व काल में राजा के बाद सामंतों, साहूंकारों और जमीदारों का नंबर आता था। उस दृष्टि से देखें तो आज के पूंजीपति इन तीनों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं और वही राजा बन गये हैं तब यह कहा जाना चाहिये कि अब एक राजा विहीन व्यवस्था है जिसे समाज की दृष्टि से खतरनाक ही कहा जा सकता है भले ही हम लोकतांत्रिक होने का दंभ पाल लें।

      चुनावी राजनीति में स्वयं को प्रजारक्षक साबित करने के लिये नाटकीयता का सहारा लेना ही पड़ता है। इस नाटकीयता से प्रचार माध्यमों को सामग्री मिलती है जिसे वह अपने विज्ञापनों के बीच प्रसारित कर सकते हैं।  इन्हीं प्रचार माध्यमों से जनता अपना मानस बनाती और बिगाड़ती है। पूंजीपति भी इसी आधार पर अपने चंदे की राशि का मापदंड तय करते हैं।  इस तरह नोट और वोट पाने के लिये इस लोकतांत्रिक नाटक में नाटकीयता नहीं होगी तो वह सफल नहीं हो सकता।  गड़बड़ वहां होती है जहां अतिनाटकीयता हो जाती है।

      दो तीन साल पहले अन्ना हजारे का आंदोलन चला जिसे प्रचार माध्यमों ने खूब भुनाया।  भारत में भ्रष्टाचार एक समस्या है और जनता उससे त्रस्त थी।  ऐसे में अन्ना हजारे ने जनलोकपाल कानून पास करवाने के लिये आंदोलन छेड़ा।  लोगों की समझ में यह तो आया कि वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कर रहे हैं पर उनका जनलोकपाल कानून बनवाने का विषय आमजनों के लिये अगेय यानि समझ से परे रहा।  लोग एक जनहित वाली व्यवस्था तो चाहते हैं पर उसके लिये कानून वगैरह बनाने का विषय उनके लिये अगेय ही रहता है। वैसे भी अगर इच्छा शक्ति हो तो वर्तमान कानूनों के आधार पर भ्रष्टाचार पर कार्यवाही हो सकती है पर हमारे देश में आजादी से पूर्व ही कानून बनवाने के लिये आंदोलन कर लोकप्रियता प्रांप्त करने की परिपाटी भी रही है। यह अलग बात है कि व्यवस्था के कुप्रबंध के चलते सारे कानून धरे रह जाते हैं।  इस आदंोलन में नाटकीयता थी पर जब उसने अति की सीमा पारी की तो जनमानस हताश होने लगा जिससे अन्ना हजारे अपने तय कानूनी प्रारूप से कुछ पीछे हटे और मान गये जिससे वह बन गया। अन्ना का आंदोलन थमा तो उनके भक्तों ने अपना राजनीतिक अभियान प्रारंभ किया।  ऐसा लगता है कि उन्होंने तो एकदम पटकथा लिखकर ही अपने नाटकीय अभियान को प्रारंभ किया।  अब उसमें इतनी नाटकीयता आ गयी कि  लोग उनसे भी उकताने लगे।  यह अन्ना भक्त उस जनलोकपाल को जोकपाल कहते हैं जिस पर अन्ना सहमत हो चुके हैं।  अब तो यह जनलोकपाल का विषय लेकर पूरे देश में पहुंचाना चाहते हैं।  मगर मुर्गे की वही एक टांग! भ्रष्टाचार मुद्दा है पर जनलोकपाल अगेय विषय है। फिर इनकी अतिनाटकीयता उसी प्रचार पर्दे पर दिख रही है जिसने उन्हें प्रसिद्धि दिलवायी है। आंदोलनकारी से नायक बने इन अन्ना भक्तों को शायद यह पता नहीं है कि उनके प्रयास कभी कभी तो हास्य का भाव पैदा करते हैं। हालांकि राजनीति में कुछ भी कहना कठिन है पर एक बात तय है कि अतिनाटकीयता से उनको उसी प्रचार में हानि पहुंचेगी जिसने उनके नायकत्व का भाव बढ़ाया जो कि घटने लगा है।

      मजेदार बात यह है कि कभी लगता है कि अन्ना के राजनीतिक भक्तों के  किसी एक प्रयास उनका  प्रचार भाव बढ़ा तो किसी से घटा दिखता है। कभी कभी तो लगता है कि प्रचार माध्यमों के प्रबंधक चाहते हैं कि यह सब चलता रहे ताकि उनके पास विज्ञापनों के बीच समाचारों प्रसारण की सामग्री बनती रहे। सच बात तो यह है कि अगर इस तरह के नाटकीय समाचार प्रसारण वाली सामग्री न हो तो अनेक समाचार चैनल श्रोताओं और दर्शकों के लिये तरसत रहे जायेंगे।  यह अलग बात है कि इसमें अगर अतिनाटकीयता का भाव आया तो अंततः लोग उससे विरक्त हो जायेंगे। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था को धनपतियों ने एकदम ऐसी राजाविहीन व्यवस्था बना दी है जिसमें उनका व्यक्तित्वसर्वोपरि है और अन्य जनता उन्हें चुपचाप झेलती रहे, जिसे भेदने का प्रयास अन्ना के राजकीय भक्त कर रहे हैं उसमें यह  अतिनाटकीयता संकट नहीं बनेगी कहना कठिन है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

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Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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समाज को जड़ या चेतनाहीन मानना मूर्खता-हिंदी सम्पादकीय


      जहां तक भारतीय अध्यात्मिक विषय से जुध विद्वान लोगों का ज्ञान है वह इस बात की पुष्टि नहीं करता कि इस देश का पूरा समाज मूर्ख और रूढ़िवादी हैं जैसा कि कथित सुधारवादी मानते हैं| जिस तरह पिछले साठ वर्षों से राजनीति, सामाजिक तथा आर्थिक रूप से कुछ मुद्दे पेशेवर समाज सेवकों और बुद्धिजीवियों ने तय कर रखे हैं , उनमें कभी कोई बदलाव नहीं आया उससे तो लगता है कि वह यहां के आम आदमी को अपने जैसा ही जड़बुद्धि  ही समझते हैं। उनकी बहसें और प्रचार से तो ऐसा लगता है कि जैसे यहां का समाज बौद्धिकरूप से जड़ है और यह उन भ्रम उन विद्वानों को भी हो सकता है जो ज्ञान होते हुए भी कुछ देर अपना दिमाग इस तरह की बहसों और प्रचारित विषयों को देखने सुनने में लगा देते हैं। दरअसल जब राजनीति, समाज सेवा और अध्यात्मिक ज्ञान देना एक व्यापार हो गया हो तब यह आशा करना बेकार है कि इन क्षेत्रों में सक्रिय महानुभाव अपने प्रयोक्तओं या उपभोक्ताओं के समक्ष अपनी विक्रय कला का प्रदर्शन कर उनको प्रभावित न करें। हम उन पर आक्षेप नहीं कर सकते क्योंकि प्रयोक्ताओं और उपभोक्ताओं को भी अपने ढंग से सोचना चाहिये। अगर आम आदमी कहीं इस तरह के व्यापारों में सेद्धांतिक और काल्पनिक आदर्शवाद ढूंढता हो तो दोष उसमें उसकी सोच का है।  जिस तरह एक व्यवसायी अपना आय देने वाला व्यवसाय नहीं बदलता वैसे ही यह पेशेवर सुधारवादी अपने विचार व्यवसाय नहीं बदल सकते क्योंकि वह उनको पद, प्रतिष्ठा और पैसा देता है|

           हां, हम इसी सोच की बात करने जा रहे हैं जो हमारे लिये महत्वपूर्ण है। जिस तरह इस देह में स्थित मन के लिये दो  मार्ग है एक रोग का दूसरा योग का वैसे ही  बुद्धि के लिये भी दो मार्ग है एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक। जब बुद्धि सकारात्मक मार्ग पर चलती है तब मनुष्य के अंतर्मन में कोई नयी रचना करने का भाव आने के साथ ही तार्किक ढंग से विचार करने की शक्ति पैदा होती है। जब बुद्धि नकारात्मक मार्ग का अनुसरण करती है तब मनुष्य कोई चीज तोड़ने को लालायित होता है और तर्क शक्ति  से तो उसका कोई वास्ता हीं नहीं रह जाता-वह असहज हो जाता है। यही असहजता उसे ऐसे मार्ग पर ले जाती है जहां उसका ऐसे ही भावनाओं के व्यापारी उसका भौतिक दोहन करते हैं जो स्वयं भी अनेक कुंठाओं और अशंकाओं का शिकार होते हैं और धन संचय में उनको अपने जीवन की सुरक्षा अनुभव होती है।

      अपने स्वार्थ के कारण ही आर्थिक, सामाजिक तथा वैचारिक शिखर पर बैठे शीर्ष पुरुष समाज में ऐसे विषयों का प्रतिपादन करते हैं जिनसे समाज की बुद्धि उनके अधीन रहे और नये विषय या व्यक्ति कभी समाज में स्थापित न हो पायें-एक तरह से उनका वंश भी उनके बनाये शिखर पर विराजमान रहे। वह अपने प्रयास में सफल रहते हैं क्योंकि समाज ऐसे ही कथित श्रेष्ठ पुरुषों का अनुसरण करता है। अगर कोई सामान्य वर्ग का कोई चिंतक उनको नयेपन की बात कहे तो पहले वह उसकी भौतिक परिलब्धियों की जानकारी लेते है। सामान्य लोगों की भी यही मानसिकता है कि जिसके पास भौतिक उपलब्धियां हैं वही श्रेष्ठ व्यक्ति है।

      बहरहाल यही कारण है कि बरसों से बना एक समाज है तो उसकी बुद्धि को व्यस्त रखने वाले विषय भी उतने ही पुराने हैं। मनुष्य द्वंद्व देखकर खुश होता है तो उसके लिये वैसे विषय हैं। उसी तरह उनमें कुछ लोग सपने देखने के आदी हैं तो उनको बहलाने के लिये काल्पनिक कथानक भी बनाये गये। इनमें भी बदलाव नहीं आता।

      पिछले एक सदी से इस देश में  भाषा, जाति, धर्म, और क्षेत्र के नाम पर विवाद खड़े किये गये। उनका लक्ष्य किसी समाज का भला करने से अधिक उसके नाम पर चलने वाले अभियानों के मुखियाओं का द्वारा अपने घर भरना था। इनमें से कईयों ने तो अपने संगठन दुकानों की तरह अपनी संतानों को दुकानों की तरह उत्तराधिकार में सौंपे| ऐसा करते हुए वह नये देवता बनते नजर आने लगे। सच बात तो यह है कि इस दुनियां में कभी भी कोई अभियान बिना माया के नहीं चल सकता। फिर जो लोग दावा करते हैं कि वह अमुक समूह का भला कर रहे हैं उनका कृत्य देखकर कोई नहीं कह सकता कि यह काम निस्वार्थ कर रहे हैं। ऐसे में बार बार एक ही सवाल आता है कि कौन लोग हैं जो उनको धन प्रदान कर रहे हैं। तय बात है कि यह धन उन्हीं मायावी लोगों द्वारा दिया जाता होगा जो इस समाज को सैद्धांतिक मनोरंजन प्रदान करने के लिये उनका आभार मानते हैं।

      अभियान चल रहे हैं। आंदोलन इतने पुराने कि कब शुरु हुए उनका सन् तक याद नहीं रहता। आंदोलन के मुखिया देह छोड़ गये या इसके तैयार हैं तो उनके परिवार के पास वह विरासत में जाता है। पिता नहीं कर सका वह पुत्र करेगा-यानि समाज सेवा, अध्यात्मिक ज्ञान तथा कलाजगत का काम भी पैतृक संपदा की तरह चलने लगा है।

      सत्य और माया का यह खेल अनवरत है। ऐसा नहीं है इस संसार में ज्ञानी लोगों की कमी है अलबत्ता उनकी संख्या इतनी कम है कि वह समाज को बनाने या बिगाड़ने की क्षमता नहीं रखते। वैसे भी कहीं किसी नये विषय या वस्तु का सृजन चाहता भी कौन है? अमन में लोग जीना भी कहां चाहते हैं। अमन तो स्वाभाविक रूप से रहता है जबकि  लोग तो शोर से प्रभावित होते हैं। ऐसा शोर  जो उनको अंदर तक प्रसन्न कर सके। यह काम तो कोई  व्यापारी ही कर सकते हैं। इसके अलावा लोगों को चाहिये अनवरत अपने दिल बहलाने वाला विषय! यह तभी संभव है जब उसे अनावश्यक खींचा जाये-टीवी चैनलों में सामाजिक कथानकों को विस्तार देने के लिये यही किया जाता है। यह विस्तार बहस करने के लायक विषयों में अधिक नहीं हो सकता क्योंकि उसमें तो नारे और वाद ही बहुत है। समाज को नारी, बालक, वृद्ध, जवान, बीमार, भूखा, बेरोजगार तथा अन्य शीर्षकों के अंदर बांटकर उनके कल्याण का नारा देकर काम चल जाता है। इसके अलावा इतनी सारी भाषायें हैं जिसके लिये अनेक सेवकों की आवश्यकता पड़ती है जो सेवा करते हुए स्वामी बन जाते हैं। ऐसा हर सेवक अपनी भाषा, जाति, धर्म तथा क्षेत्र के विकास और उसकी रक्षा के लिये जुटा है।

      मगर क्या वाकई लोग इतने भोले हैं! नहीं! बात दरअसल यह है कि इस देश का आदमी कहीं न कहीं से अपने देश के अध्यात्मिक ज्ञान से सराबोर है। वह यह सब मनोरंजन के रूप में देखता है। सामने नहीं कहता पर जानता है कि यह सब बाजारीकरण है। यही कारण है कि कोई भी बड़ा आंदोलन या अभियान चलता है तब उसमें लोगों की संख्या सीमित रहती है। उसमें लोग  इसलिये अधिक दिखते हैं क्योंकि वहना नारों  शोर होता  हैं। शोर करने वाला दिखता है पर शांति रखने वाले की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। पिछले अनेक महापुरुषों को पौराणिक कथानकों के नायकों की तरह स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा हैं इतनी  सारी पुण्यतिथियां और जन्म दिन घोषित  किये गये हैं कि लगता है कि सदियों में नहीं बल्कि हर वर्ष एक महापुरुष पैदा होता है। लोग सुनते हैं पर देखते और समझते नहीं है। यह जन्म दिन और पुण्यतिथियां उन लोगों के नाम पर भी बनाये गये जो भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के पुरोधा समझे जाते हैं जिसमें जन्म और मृत्यु को दैहिक सीमा में रखा गया है-दूसरे शब्दों में कहें तो उसकी अवधारणा को यह कहकर खारिज किया गया है कि आत्मा तो अमर है। जो लोग बचपन से ऐसे कार्यक्रम देख रहे हैं वह जानते हैं कि आम आदमी इनसे कितना जुड़ा है। हालांकि इसका परिणाम यह हो गया है कि लोगों ने अपने अपने जन्म दिन मनाना शुरु कर दिया है। प्रचार माध्यमों ने अति ही कर दी है। हर दिन उनके किसी खिलाड़ी या फिल्म सितारे का जन्म दिन होता है जिससे उनको उस पर समय खर्च करने का अवसर मिल जाता है। काल्पनिक महानायकों से पटा पड़ा है प्रचार माध्यमों को पूरा जाल।

      इसके बावजूद एक तसल्ली होती है यह देखकर कि काल्पनिक व्यवसायिक महानायकों का कितना भी जोरशोर से प्रचार किया जाता है पर उससे आम आदमी अप्रभावित रहता है। वह उन पर अच्छी या बुरी चर्चा करता है पर उसके हृदय में आज भी पौराणिक महानायक स्थापित हैं जो दैहिक रूप से यहां भले ही मौजूद न हों पर इंसानों के दिल में उनके लिये जगह है। यह काल्पनिक व्यवसायिक नायक तभी तक उसकी आंखो में चमककर उसकी जेब जरूर खाली करा लें जब तक वह देह धारण किये हुए हैं उसके बाद उनको कौन याद रखता है। सतही तौर पर जड़ समाज अपने अंदर चेतना रखता है यह संतोष का विषय है भले ही वह व्यक्त नहीं होती।

लेखक, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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जनता के सेवक-हिंदी व्यंग्य कविता


जनता की भलाई करने के लिये ढेर सारे सेवक आ जाते है,

शासक होकर करते ऐश बांटते कम ज्यादा मेवा खुद खा जाते हैं।

पहले जिनके चेहरे मुरझाये थे  सेवक बनकर खिल गये,

अंधेरों में काटी थी जिंदगी रौशन महल उनको मिल गये,

तख्त पर बैठे तो  रुतवा और रौब जमायें,

पद छोड़ते हुए अपने नाम के साथ शहीद लगायें,

कोई खास तो कोई आम दरबार लगाता है,

अहसान बांट रहा मुफ्त में हर बादशाह जताता है,

कहें दीपक बापू इंसान का आसरा हमेशा रहा भगवान,

हुकुमतों का खेल तो चालाक ही समझ पाते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
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