Tag Archives: दीपक भारतदीप

धन तेरस के दिन मन का प्रसन्न रहना जरूरी-दीपावली पर हिन्दी चिंत्तन लेख


            आज पूरे देश में धनतेरस का पर्व मनाया जा रहा है। भारतीय धर्मों को मानने वाले लोग आज के दिन  दीपावली की पूजा के लिये सामान आदि खरीदते हैं।  इस दिन बाज़ार में भीड़ रहती है तो यह भी सच है कि स्टील, पीतल, सोने तथा अन्य धातुओं से निर्मित सामान भी अन्य दिनों की अपेक्षा अत्यंत महंगे हो जाते है। यही  कारण  है कि वर्ष के किसी भी दिन की अपेक्षा धनतेरस के दिन सामान्य व्यापार में सर्वाधिक आय वाला दिन होता है।  खेरिज व्यापार में सामान्य दिनों की अपेक्षा चार से दस गुना का विक्रय होता है। यह अलग बात है कि दिपावली गुजरते हुए तत्काल मंदी भी आ जाती है।

            समय के साथ महंगाई बढ़ी तो धीमे धीमे धनतेरस के दिन खरीददारी एक औपचारिकता बन कर रह गयी है।  अर्थशास्त्र की दृष्टि से भारत में धन का असमान वितरण एक बहुत भारी समस्या है, यह हमने आज से तीस बरस पहले पढ़ा था।  अर्थशास्त्र के विद्यार्थी को समाज का भी ज्ञान रखना चाहिये और इस आधार पर हम कह सकते हैं कि भले ही हम शहरी क्षेत्रों में धनी लोगों की संख्या बढ़ने का दृश्य देखकर प्रसन्न हों पर सच यह है कि उसके अनुपात में अल्प धनियों की संख्या बढ़ी है।  जहां धातुओं के बड़े सामानों को खरीदने वाले दिखते हैं वहां उनका दाम पूछकर उनसे मुंह फेरने वालों की संख्या ज्यादा होती है। अनेक लोग तो स्टील की टंकी का दाम पूछकर एक चम्मच खरीद कर ही धनतेरस मना लेते हैं। जहां कथित आर्थिक विकास ने अनेक ऐसे लोगों को धनवान बना दिया कि जिनके पास स्टील की कटोरी खरीदने की ताकत नहीं थी अपनी वर्तमान भारी भरकम आये के सामने सोने का कड़ा भी सस्ता लगता है तो वहीं अनेक लोग जो मध्यम वर्ग के थे अब स्वयं को निम्न वर्ग का अनुभव करने लगे हैं। जिनके लिये धनतेरस का दिन औपचारिकता से ही बीतता है।

            इस तरह की चर्चा राजसी विषय है मगर हम  सात्विक दृष्टि से विचार करें तो  इस संसार में सहज जीवन के लिये हृदय में प्रसन्नता होना ही सच्चा सुख है।  धन कितना है, यह महत्वपूर्ण नहीं है हम उसका उपयोग कितना करते हैं यह बात विचारणीय है।  तिजोरियों में पड़ा या बैंक खातों में दर्ज धन मन को प्रसन्न कर सकता है पर उसका उपयोग न करने से वह एक कूड़े के समान है।  दूसरी बात यह कि धन अपने उपयोग के लिये खर्च करने से क्षणिक आनंद मिलता है पर जरूरतमंद की सहायता निष्काम भाव से करने से हृदय में जो उच्च भाव आता है उसका कोई मोल नहीं है।  दूसरी बात यह कि कि धन और पानी एक समान है।  रुके रहे तो सड़ जाते हैं या फिर निकलने का मार्ग बनाते हैं।  धन आता है तो उसके जाने का मार्ग भी बनाते रहना चाहिये वरना वह सड़े हुए पानी की तरह स्वयं के लिये भी कष्टदायक हो जाता है। इंसान जब स्वेच्छा से धन नहीं निकालता तो प्रकृतिक कारण उसे इसके लिये विवश करते हैं कि वह अपनी जेब खोले।

            अपने धन का उपयोग का स्वयं की आवश्यकताओं के लिये सभी करते हैं पर जो दूसरे की आवश्यकता पर उसे देते हैं वह दान या सहायता कहलाता है।  जिन लोगों को धनतेरस के दिन कमाई होती है वह स्वयं के लिये कोई खरीददारी नहीं कर पाते।  मिट्टी के दीपक, फटाखे तथा पूजा का सामान बेचने के लिये फेरी लगाने वाले तो इस प्रयास में रहते हैं कि सामान्य दिनों की अपेंक्षा उनको अधिक मजदूरी मिल जाये तो शायद अपनी अतिरिक्त आवश्यकतायें पूरी हों जायें।  उनकी अपेक्षायें कितनी पूरी होती हैं यह अलग बात है पर निजी क्षेत्र में मजदूरी करने वालों के लिये भी दीपावली का पर्व आशा लेकर आता है।  इस तरह धनतेरस और दीपावली सभी वर्गों के लिये खरीद और बेचने का अवसर समान रूप से ले आता है।

            इस समय मौसम समशीतोष्ण हो जाता है जिससे शीतल हवायें बहते हुए देह और हृदय को प्रसन्न करती हैं। यही तत्व दीपावली को अधिक आनंददायक बना देता है।  हम अपने सभी मित्र ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकों हार्दिक बधाई। जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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भारत मे बेहतर स्वास्थ्य के लिये स्वच्छता अत्यंत आवश्यक-2 अक्टूबर महात्मा गांधी जयंती पर भारत स्वच्छता अभियान पर विशेष हिन्दी लेख


            2 अक्टूबर से महात्मा गांधी जयंती पर भारत स्वच्छता अभियान प्रारंभ हो रहा है। भौतिकतावाद में डूबे भोगी भारतीय समाज में कथित सभ्रांत वर्ग के  बहुत कम लोग स्वच्छता का मतलब समझते होंगे यह बात तय हैं। सच तो यह है कि जिन सामान्य वर्ग के लोगों  यह वर्ग ग्रामीण, अशिक्षित अथवा गरीब कहकर हिकारत से देखता है वह इन्हीं की फैलाई गंदगी का शिकार है। बहुत समय से यह चर्चा चलती रही है कि पर्यटन स्थलों पर अपने मन की भूख शांत करने गये पेट भरने के लिये साथ लेकर गये बंद सामान के अवशेष वहीं छोड़ कर चले आते हैं जिनमें प्लस्टिक ज्यादा होती है।  प्लास्टिक प्रकृति की शत्रु है यह सभी जानते हैं।  हम छोटे बड़े शहरों में भी देखते हैं जहां सड़कें और उद्यान भी ऐसे मनोंरजन प्रिय लोगों की क्रूर उदासीनता की वजह से गंदे दिखाई देते हैं। भारत में तीन तरह की गंदगी फैलाने वाले लोग दिखाई देते हैं।  एक तो वह जो गंदगी में रहने के आदी हैं और अपने आसपास ही सफाई नहंी करते। दूसरे इतने सफाई पसंद तो होते हैं जो अपने आसपास का कचड़ा दूसरे के घर के पास या सामने सरका कर कर्तव्य निभाते हैं। तीसरे वह हैं जो सार्वजनिक स्थान पर कचरा करना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं।

            यातायात नियमों में अनुसार हेल्मेट पहनकर चलना जरूरी है। हमने देखा है जब सख्ती होती है तब लोग हेल्मेट मजबूरी में पहनकर जाते हैं।  अनेक तो ऐसे हैं जो गाड़ी पर हेल्मेट लटकाकर चलते हैं यह सोचकर कि कहीं पहरेदार सक्रिय देखे तो पहन लेंगे।  अब यहां यह सवाल उठता है कि गाड़ी पर हेल्मेट पहनकर चलना जरूरी क्यों माना गया है? आदमी की सुरक्षा के लिये बनाये गये हेल्मेट को लोग बोझ मानते हैं।  आंकड़े गवाह है कि दुपहिया वाहन को चलाते हुए जितने चालक  सिर की चोट के कारण  हताहत होते हैं उतना किसी अन्य अंग पर प्रहार से नहीं होते।

            चालान के भय से लोग हेल्मेट पहनते हैं। भारत के सार्वजनिक स्थानों पर गदंगी फैलाने वालों पर भी अगर इसी तरह चालान होने लगें तो मान लीजिये कहीं कचरा दिखाई नहीं देगा।  इसके लिये सार्वजनिक स्थानों पर उपस्थित आम लोगों को ही यह अधिक दिया जाना चाहिये कि वह किसी कचरा फैंकने वाले का वीडियो या फोटो निकालकर सक्षम अधिकारी के सामने पेश कर दें जो कि इनसे चालान वसूल सके।  हम में से अनेक लोग जानते हैं कि पहले हर जगह बीड़ी या सिगरेट पीने वाले मिल जाते थे पर जब से दंड का प्रावधान हुआ यह समस्या कम हो गयी है।  महत्वपूर्ण बात यह कि अब जिन लोगों से इसका धुंआ सहन नहीं होता वह पीने वाले को टोक देते हैं।  अनेक जगह बस और रेल में हमने देखा कि  लोगों के विरोध करने पर धुम्रपान करने वाले ने अपनी बीड़ी या सिगरेट फैंक दी।

            कहने का अभिप्राय यह है कि इस तरह के सफाई अभियान की सफलता के लिये यह भी जरूरी है कि गंदगी फैलाने वाले पर दंड लगाना ही चाहिये।  अनेक लोग प्रार्थना या सुझाव पर ध्यान नहीं देते पर दंड का भय उन्हें बुरा काम करने नहीं देता।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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राष्ट्रभाषा की सेवा और सम्मान-14 सितम्बर हिन्दी दिवस पर विशेष हिन्दी हास्य रचना


हिन्दी दिवस पर फंदेबाज ने

कसी फब्तियां और बोला

दीपक बापू फ्लाप कवि की

जब तुम्हारी भूमिका देखता हूं

तब तरस आता है,

तुम लिखते हो शब्द

किसी के अर्थ समझ में नहीं आता है,

या तुम पर किसी का ध्यान नहीं होता,

ऐसा लगता है जब तुम लिखते हो,

तब पाठक सो जाता है,

या तुम्हारा शब्द प्रकाशित होते ही

अंतर्जाल की भीड़ में खो जाता है,

न कभी नाम मिला न नामा

14 सितम्बर हर बरस निकल जाता है।’’

सुनकर हंसे दीपक बापू

हम निराश नहीं होते,

क्योंकि आशा का बोझ कभी नहीं ढोते,

हिन्दी में सम्मान पाने की चाहत

हमें कभी रही नहीं,

लिखना बन गया धर्म

शब्द बन गये आराध्य देव

इसलिये कभी चाहतों की

पीड़ा कभी सही नहीं,

इस बार भी देखेंगे

हम हिन्दी दिवस पर तमाशा,

इस पर हुए गंभीर प्रवचन

बन जाते हमें लिये व्यंग्य विषय के

सृजन की आशा,

कुछ विद्वान बड़े बन जायेंगे,

कुछ बड़े विद्वान की तरह तन जायेंगे,

सभी आयेंगे मंच पर सीना तानकर,

श्रोता सुनेंगे उनको ज्ञाता मानकर,

गनीमत है अंतर्जाल पर हिन्दी

अधिक नहीं चलती है,

अपनी हर हास्य कविता

चाहे जैसी हो एकांत में मचलती है,

स्थानीय स्तर पर भी

कोई हमारा नाम नहीं जान पाया,

हम प्रसन्न हैं

हमारा हर शब्द वैश्विक स्तर पर छाया,

न मिला न मिलना चाहिये

हमें लेखकीय सम्मान,

हम एकांत साधना की चुके ठान,

देखते हैं हम भी दृष्टा की तरह

अनेक खड़े रहते सम्मान की पंक्ति में

किसी के रहते हाथ रहते खाली

किसी पर हिन्दी दिवस

प्यार से बरस ही जाता है।

————————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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तरक्की पर चर्चा-हिन्दी व्यंग्य काव्य रचनाये


तरक्की का आसमान हमें वह दिखाते हैं,

गरीबी की बात करो तो मजबूरी में जीना सिखाते हैं।

कागज पर लिख रखे हैं उन्होंने तरक्की के पैमाने,

अपनी असलियत की बात करो तो बनते अनजाने,

रंगे हुए लोहे के सामान को जमा कर लिया है,

सब उधार का है  दिखाते जैसे कमा कर लिया है,

कहें दीपक बापू औकात की बात करो तो सीना तानते

पैसे का सवाल हो तो गरीबों की सूची में भी नाम लिखाते हैं।

———-

पता नहीं लोग कहां हुई तरक्की पर चर्चा करते हैं,

हम आज  भी हर जगह पेन से कागज पर पर्चा भरते है।

कहें दीपक बापू कागजी शेरों का हाथ में दी व्यवस्था

तरक्की बंद कर देते हैं वह अल्मारी मे

मजबूर को बेबस बनाकर जो अपना दिल भरते हैं।

————————————–

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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नाकाम आशिक कलम छोड़ हथियार उठाते हैं-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


आशिकों के कातिल बन जाने की खबर रोज आती है,

टीवी पर विज्ञापनों के बीच सनसनी छा जाती है।

कहें दीपक बापू दिल कांच की तरह टूट कर नहीं बिखरते

अब भड़ास अब गोली की तरह चलकर आग बरसाती है।

——-

आशिक नाकाम होने पर अब मायूस गीत नहीं गाते है,

कहीं गोली दागते कहीं जाकर चाकू चलाते हैं।

कहें दीपक बापू इश्कबाज हो गये इंकलाबी

नाकाम आशिक कलम छोड़कर  हथियार चलाते हैं।

———-

आशिकों ने प्रेमपत्र लिखने के लिये कलम उठाना छोड़ दिया है,

एक हाथ का मोबाइल दूसरे का चाकू से नाता जोड़ दिया है,

कहें दीपक बापू इश्क पर क्या कविता और कहानी लिखें,

टीवी पर चलती खबरों ने उसे सनसनी की तरफ मोड़ दिया है।

————–

 

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

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नई खबर-हिंदी व्यंग्य कविता


लोगों के सामने पर्दे चलने के लिये रोज नयी खबर चाहिये,

प्रचार प्रबंधक ढूंढते हैं बयानवी इस पर नाराजगी नहीं जताईये।

सनसनीखेज शब्द हों तो चर्चा और बहस की सामग्री जुटाते हैं,

बीच में चलते सामानों के विज्ञापन जिन पर लोग दिल लुटाते हैं,

चमकाये जाते हैं वह चेहरे जो देते हैं किसी का नाम लेकर गालियां,

उस पर जारी बहस में कोई वक्ता होता नाराज कोई बजाता तालियां,

पर्दे पर खबरें ताजा खबर के लिये किसी को भी बनाते नायक,

बासी होते ही उसके चेहरे में ताजगी भरते बताकर खलनायक,

कहें दीपक बापू बयानवीरों और प्रचार प्रबंधकों खेल तयशुदा है

इधर से सुनिये उधर से निकालिये अपना दिल न सताईये।

————–

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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भर्तृहरि नीति शतक-अपने स्वार्थ हो तो भी गजराज की तरह व्यवहार करें


      इस संसार में भूख सभी को लगती है पर भोजन पाने और करने के सभी के तरीके अलग हैं।  अपना कमाकर खाने वाले लोग जहां जीवन में आत्मविश्वास से भरे होते हैं वही दूसरे से कर्ज, भीख अथवा मदद मांगने वाले लोग हमेशा ही हृदय में दीनता का भाव लेकर जीते हैं। कहा जाता है कि जैसा खायें अन्न वैसा ही होता है मन। इसका आशय अन्न के दानों का स्वरूप ही नहीं वरन् उसके लिये अर्जित धन से साधन से भी जोड़ना चाहिये।  यह भी कहा जाता है कि परमात्मा पेट देने से ही पहले अन्न के दानों पर खाने वाले का नाम लिख देता है। यह ज्ञान रखने वाले लोग आत्मविश्वास से जीवन में अपना हर काम करते हैं। इसके विपरीत जो मन में कर्ता का भाव लिये होते हैं उन्हें परमात्मा की इस सांसरिक कृति पर यकीन नहीं होता इसलिये अपनी आवश्यकताओं के लिये वह अतिरिक्त सक्रियता दिखाते हैं। उनके मस्तिष्क में चिंताओं का ढेर भरा होता है।  जिसके चलते न केवल वह दैहिक बल्कि मानसिक रूप से भी अस्वस्थ हो जाते हैं।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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ङ्गल चालनमधरश्चरणावपातं भूमी निपत्य वदनोदर दर्शनं च।

श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुङ्गवस्तु धीरं विलोकयति चाटुशतैश्च भुङ्वते।।

     हिन्दी में भावार्थ-कुत्ता भोजन देने वाले के आगे पूंछ हिलाकर उसके सामने मुंह वह पेट दिखाते हुए लोटपोट उसके  अपनी दीनता प्रदर्शित करता है जबकि हाथी उसे गंभीरता से देखता है और कई बार मनाने पर ही भोजन ग्रहण करता है।

कृमिकुलचित्तं लालक्लिन्नं विगन्धिजुगुप्सितमु निरुपमरसं प्रीत्या खादनन्नरास्थि निरामिषम्।

सुरपतिमपि श्वा पार्श्वस्यं विलोक्य न शंकते न हि गणवति क्षुद्रो जन्तु पिरग्रहफलगुनाम्।।

हिन्दी में भावार्थ-कीड़ों से युक्त, रसहीन, दुर्गंध से भरी, स्वादरहित, घृणित हड्डी को पकड़ कर बहुत उत्साह से चबाता है। उस सयम अपने पास आये देवता की भी उसे परवाह नहीं होती।

      हम देख रहे हैं कि हमारा परंपरागत भारतीय समाज पूरी तरह से बिखर चुका है।  यह कहा जरूर जाता है कि हम एक संगठित भारतीय समाज के सदस्य हैं पर  सभी को पता है कि यह दावा एकदम खोखला है।  सभी दावा करते हैं कि वह किन्हीं जातीय, धार्मिक, भाषाई अथवा विशिष्ट समाज के सदस्य होने के कारण सुरक्षित अनुभव करते हैं पर सच यह है किसी को हृदय से अपनी ही बात पर ही यकीन नहीं होता है।  पाश्चात्य वस्तुओं को अपनी दैनिक तथा सांस्कारिक आवश्यकताओं के मूल से जोड़ने वाले हमारे  भारतीय समाज का मनोबल गिरा हुआ है।  हम भ्रष्टाचार तथा बेईमानी के विरुद्ध प्रत्यक्ष रूप से अभियान छेड़ने की बात तो करते हैं पर यह भूल जाते हैं कि इसमें लिप्त लोग इसी भारतीय समाज के सदस्य हैं।  भ्रष्टाचार और बेईमानी में लगे लोगों को दूसरे का अपराध तो दिखता है पर अपना धन का लोभ इस आशंका के मारे नहीं छोड़ पाते कि अगर संपन्नता नहीं है तो समाज उनको पूछेगा भी नहीं-यही नहीं वह लोग अपने बेईमानी को मेहनत की कमाई मानने का तर्क स्वयं को देकर ही समझाते हैं।

      कहने का अभिप्राय यह है कि हम दूसरे की तरफ न देखें वरन् अपने व्यवहार, विचार तथा व्यक्तित्व पर दृष्टिपात करें।  अगर हम दृढ़ता पूर्वक सत्य का मार्ग लेंगे तो कभी जीवन में कुंठा का अनुभव नहीं होगा।  जो व्यक्ति सिद्धांत पर दृढ़ रहता है उसके मुख मंडल पर तेज स्वतः प्रकट होता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

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पर्दे पर रोज नयी खबर चाहिये-हिन्दी व्यंग्य कविता


लोगों के सामने पर्दे चलने के लिये रोज नयी खबर चाहिये,

प्रचार प्रबंधक ढूंढते हैं बयानवीन इस पर नाराजगी नहीं जताईये।

सनसनीखेज शब्द हों तो चर्चा और बहस की सामग्री जुटाते हैं,

बीच में चलते सामानों के विज्ञापन जिन पर लोग दिल लुटाते हैं,

चमकाये जाते हैं वह चेहरे जो देते हैं किसी का नाम लेकर गालियां,

उस पर जारी बहस में कोई वक्ता होता नाराज कोई बजाता तालियां,

पर्दे पर खबरें ताजा खबर के लिये किसी को भी बनाते नायक,

बासी होते ही उसके चेहरे में ताजगी भरते बताकर खलनायक,

कहें दीपक बापू बयानवीरों और प्रचार प्रबंधकों खेल तयशुदा है

इधर से सुनिये उधर से निकालिये अपना दिल न सताईये।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

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परमार्थ करने वाले सच्चे लोग नाटकबाजी नहीं करते-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख


      भारत में लोकसभा चुनाव 2014 के लिये कार्यक्रम घोषित किये जा चुका है।  शुद्ध रूप से राजसी कर्म में प्रवृत्त लोगों को लिये एक तरह से यह चुनाव कुंभ का मेला होता है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार कोई मनुष्य  पूर्ण रूप से सात्विक  या तामसी प्रवृत्ति का हो अपने जीवन निर्वाह के लिये अर्थार्जन का कार्य करना ही पड़ता है जो कि एक तरह से राजसी प्रकृत्ति का ही होता है।  दूसरी बात यह भी है कि राजसी कर्म करते समय मनुष्य को राजसी प्रकत्ति का ही अनुसरण करना चाहिये इसलिये ज्ञानी या सात्विक प्रकृत्ति के व्यक्ति में अर्थार्जन के लिये उचित साधन होने पर उसकी क्रियाओं में दोष देखकर यह मान लेना कि वह अपनी मूल प्रकृत्ति से दूर हो गया, यह विचार धारण करना गलत होगा।  ज्ञानी और सात्विक व्यक्ति राजसी कर्म करने के बावजूद उसमें अपने मूल भाव का तत्व अवश्य प्रकट करते हैं। इसके विपरीत जो राजसी प्रकृत्ति मे हैं वह राजसी कर्म करते समय किसी सिद्धांत का पालन करें यह आवश्यक नहीं होता।  उनके लिये अपना ही लक्ष्य सर्वोपरि होता है। देखा जाये तो सामान्य गृहस्थ हो या राजकीय कर्म करने वाला विशिष्ट व्यक्ति दोनों का लक्ष्य अर्थोपार्जन करना ही होता है।  सामान्य गृहस्थ जहां अपनी गृहस्थी का राजा होता है वहीं राजकीय व्यक्ति को किसी उपाधि की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।  राजकीय कर्म तो राजसी प्रकृत्ति से ही किये जा सकते हैं इसलिये वहां पूर्ण सैद्धांतिक शुचिता के पालन की अनिवार्यता की आशा व्यर्थ ही की जाती है। 

भृर्तहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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पद्माकरं दिनकरो विकची क्ररीति चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवातम्।।

नाभ्यार्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति संतः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः।।

     हिन्दी में भावार्थ-सूर्य बिना याचना किये ही कमल को खिला देता है, चंद्रमा कुमुदिनी को प्रस्फुटित कर देता है। बादल भी बिना याचना के ही पानी बरसा देते हैं। इसी तरह सत्पुरुष अपनी ही अंतप्रेरणा से ही परोपकार करते हैं।

      लोकतंत्र में चुनावों के लिये उतरने वाले लोग आम जनमानस को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिये अनेक प्रकार के प्रयास करते हैं।  अनेक तरह के वादे तथा आश्वासन देने के साथ ही वह आमजनों को धरती पर ही स्वर्ग दिखाने का सपना दिखाते हैं। एक तरह से देखा जाये तो लोकतांत्रिक राजकीय प्रणाली ने विश्व में पेशेवर शासकों की पंरपरा स्थापित की है। प्रधानमंत्री हो या राष्ट्रपति या अन्य कोई जनप्रतिनिधि वह खजाने से अपने व्यय के लिये प्रत्यक्ष रूप से धन नहीं ले सकता वरन् वह एक सेवक की तरह उसे वेतना प्रदान किया जाता है।  यह अलग बात है कि जितना बड़ा राजकीय पद हो वहां विराजमान व्यक्ति को राज्य के धनपति, साहुकार, तथा उद्योगपति उसी के स्तर के अनुसार भेंट देने के लिये तत्पर रहते हैं जैसे पहले राजाओं को मिलते थे।  हमारे ग्रंथों में ऐसे अनेक उदाहरण है जब राजपद धारण करने पर राज्य के जमीदार, साहुकार तथा धनवान अपने राजा को भेंट देते थे।  इस तरह की भेंट लेना कम से कम हम जैसे अध्यात्मिक दृष्टि से कोई गलत नहीं है। यह  अलग बात है कि राजपद पाने के लिये उत्सुक लोग स्वयं को एक त्यागी व्यक्ति के रूप में प्रचारित कर जनमानस का हृदय जीतने का प्रयास करते हैं।  त्याग का भाव सात्विक कर्म का परिचायक है जिसकी उपस्थिति राजसी कर्म  में नहीं की जा सकती।

      यही से आधुनिक लोकतंत्र में अनेक नाटकों का प्रारंभ हो जाता है। इधर उदारीकरण ने निजी क्षेत्र को अधिक अवसर प्रदान किये हैं।  तेल से लेकर खेल तक और संचार साधनों से लेकर प्रचार माध्यमों तक पूंजीपतियों का एकछत्र राज्य हो गया है। मनोरंजन कार्यक्रमों में फूहड़ कामेडी तो समाचारों में नाटकीय घटनाक्रम को महत्व मिल रहा है।  कभी कभी तो यह लगता है कि फिल्म के अभिनेता फिल्म या धारावाहिक में पटकथा के आधार पर जिस तरह अभिनय करते हैं उसी तरह खिलाड़ी भी मैच खेलते हैं।  उससे ज्यादा मजेदार बात यह है कि अनेक लोग तो केवल इसलिये समाज सेवा या राजकीय उपक्रम इस तरह करते हैं ताकि उनको प्रचार माध्यमों में स्थान मिलता रहे।  हालांकि प्रचार माध्यम उनकी मजाक उड़ाते हैं पर फिर भी उनके बयानों पर बहस और चर्चा करते हैं जिसके दौरान उनके विज्ञापनों का समय खूब पास होता है। हम यह भी कह सकते हैं कि प्रचार प्रबंधक और बाज़ारों के स्वामियों का कोई संयुक्त उपक्रम हैं जो इस तरह के नाटकीय पात्रों का सृजन कर रहा है जिससे समाज अपनी समस्याओं को भूलकर मनोरंजन में लीन रहे।  कोई जनविद्रोह यहां न फैले वरन् यथास्थिति बनी रहे।

      अब तो समाचार और नाटकों में कोई अंतर ही नहीं दिख रहा।  जैसे जैसे यह चुनाव पास आयेंगे उसी तरह नाटकीय का दौर बढ़ेगा यह बात प्रचार माध्यमों के प्रबंधक स्वयं कह रहे हैं। योग तथा अध्यात्मिक साधकों ने जिज्ञासावश नहीं वरन् कौतूहल से इस नाटकीयता को देखें।  यह नाटकीय लोग देश और समाज की फिक्र करते दिखते हैं। आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था को जनोन्मुखी बनाने का दावा करते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि समाज सेवा का व्रत इस तरह लिया है जिसमें चंदा और भेंट मिलती रहे। हम यह समझ लेना चाहिये कि परोपकारी लोग कोई प्रचार नहीं करते। वह कोई योजना नहीं बनाते।  सबसे बड़ी बात यह है कि वह कोई दावा नहीं करते।  हमारा देश तो वैसे भी भगवत्कृपा से संपन्न है।  इसे कोई संपन्न क्या बनायेगा? गरीबों को कोई अमीर बना नहीं सकता और कोई लालची अमीरों के आगे हाथ फैलाने से कोई बच नहीं सकता।  कुछ लोग गरीब हैं पर वह भिखारी नहीं है जिसे यह लोग संपन्न बनाने का दावा करते हैं। गरीब अपने श्रम पर जिंदा हैं और इनमें से अधिकतर जानते हैं कि उनके भले का नारा लगाकर कोई भी राजकीय पद प्राप्त कर लें पर फायदा देने वाला नहीं है।  अंततः उनको अपने श्रम का पैसा किसी धनी से ही मिलता है इसलिये उसके मिटने की कामना भी वह नहीं करते। राज्य बना रहे यही कामना उनकी भी रहती है ताकि उनका जैसा भी घर चल रहा है वैसे चलता भी रहे। परोपकार का दावा करने वालों से वह भीख मांगने नहीं जाते यह अलग बात है कि इस तरह के ढोंग में लीन लोगों को अपने लोकप्रिय होने की खुशफहमी प्रचार की वजह से हो जाती है।

 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

दाम लेकर करें समाज सेवा-हिंदी व्यंग्य कविता


दुनियां का हर इंसान  आशिक है किसी न किसी का,

कोई दौलत, कोई बदन कोई पसीना चाहे मुफ्त किसी का।

जितना खाये कोई भी उसकी भूख नहीं मिट पाती,

सूखी रोटी मिले तो घी से चुपड़ी के लिये जीभ ललचाती,

सौंदर्य प्रसाधन से सजे चेहरे पर आंखें जमकर रह जाती है,

एक से ऊबता है दिल दूसरे शिकार पर नज़र जाती है,

मुफ्त के मददगार को समझें मूर्ख कहें फरिश्ता,

पराया खून पानी माने अपने पसीने का समझें सोने से रिश्ता,

कहें दीपक बापू मौके के हिसाब से बनाते अपना नजरिया,

मतलब के सगे सभी है वफादार नहीं कोई किसी का।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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