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लिखना और बोलना प्रभावी बनाने के लिये अध्ययन जरूरी-विशिष्ट हिन्दी रविवारीय लेख


                     अनेक लोगों का मन करता है कि वह कुछ लिखें।  कुछ लोग शेरो शायरी कर दूसरे को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। कुछ लोग अंग्रेजी कहावतों को सुनाकर यह कोशिश करते हैं कि सामने वाला आदमी उनकी बुद्धि का लोहा माने।  वैसे अपनी बात कहने में तुलसीकृत रामचरित मानस  का अध्ययन करने वालों का जवाब नहीं है।  खास अवसरों पर वह उसके दोहे सुनाकर अपने गहन अध्ययन को प्रमाणित कर देते हैं पर उसमें उनका स्वरचित कुछ नहीं होता।  समाज पर प्रभाव तो वही डाल सकता है जो स्वयं रचनाकार हो।  वैसे आजकल शेरो शायरी कर अपनी बात का प्रभावपूर्ण ढंग से कहने का रिवाज चल पड़ा है पर यह हमारे पारंपरिक वार्तालाप का कोई स्थाई भांग नहीं है। कई विषयों पर कबीर, रहीम और तुलसी की रचनायें इतना प्रभाव रखती हैं कि उनके उद्धरण उर्दू की शायरी से बेहतर प्रभावी रहते हैं।  इन सबके बावजूद यह सच्चाई है कि आदमी का मन स्वरचना की अभिव्यक्ति के लिये तड़पता है।  लिखना और बोलना  सहज लगता है   पर वह उनके दूसरे को मस्तिष्क और हªदय को अंदर तक प्रभावित कर दे ऐसी बात लिखना  या बोलना आसान नहीं है। प्रभावी लेखन और वार्तालाप के लिये आवचश्यक है कि हम दूसरे का लिखा धीरज से पढ़ें और कही गयी बात सुने।

ब्लॉग लेखन के प्रारंभिक दौर में अनेक पाठकों ने हमसे पूछा कि आप इतना लिख कैसे लेते हैं? इसका सीधा जवाब तो यह था कि हम पढ़ते बहुत हैं पर किसी को दिया नहीं!  सोचते कि अपने हर राज को बांटना जरूरी नहीं है।  सच्चाई यह है कि   जितना ज्यादा पढ़ोगे उतना ही ज्यादा लिखोगे।  जितना अच्छा सुनोगे उतना अच्छा बोलोगे।  तय बात है कि अपनी प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिये पुस्तक प्रेम और बेहतर संगत का होना जरूरी है।  मूर्खों में बैठकर गल्तियां न करना सीखा जा सकता है पर बुद्धिमानों की संगत में बिना गल्तियां किये काम करने की  मिलने वाली प्रेरणा ही असली ही शक्ति होती है।

इधर जब फेसबुक पर अपने निजी तथा सार्वजनिक संपर्क वाले लोगों को देखते हैं तो उनके अंदर अपनी अभिव्यक्ति की कभी शांत न होने वाली भूख साफ दिखाई देती है।  उनके पास कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा है। उन्होंने फेसबुक पर खाते खोल लिये हैं।  मोबाइल से फोटो खींचकर उसमें डाल देते हैं।  दूसरे की पठनीय और दर्शनीय सामग्री अपने फेसबुक पर लाने के लिये उन्हें शेयर करना पड़ता है।  कई लोग तो ऐसे हैं जो शेयर करते समय एक शब्द भी नहीं लिखते। लिखते भी है तो रोमन में हिन्दी लिखकर अपनी भूख शांत करते हैं।  ऐसे में उनकी अभिव्यक्ति की भूख साफ दिखती है। भूख और प्यास की व्याकुलता हमने स्वयं भी झेली है पर खुशी होती है यह देखकर अभिव्यक्ति के लिये कभी तड़पना नहीं पड़ता।  हिन्दी और अंग्रेजी टाईप का शैक्षणिक काल में ज्ञान प्राप्त किया और तीस वर्ष पहले कंप्यूटर से ही अपनी जिंदगी शुरु की थी।  इसलिये वर्तमान समय में बिना हिचक इंटरनेट पर लिख लेते हैं।  लिखने के विषय का टोटा नहीं रहा पर अध्यात्मिक विषयों की पुस्तकें पढ़कर चिंत्तन लिखते हुए जीवन का ज्ञान स्वतः ही आता रहा।  हमारे अध्यात्मिक विषयों पर लिखे गये पाठों को देखकर पाठक सोचते हैं कि यह कोई पुराना ज्ञानी है पर सच्चाई यह है कि लिखते लिखते ही बहुत सारा ज्ञान आ गया है।

इस ज्ञान साधना ने जीवन के प्रति विश्वास दिया पर व्यंग्य विद्या कोे छीन लिया।  अनेक बार व्यंग्य लिखने का मन करता है पर कहीं न कहीं ज्ञान उसमें बाधा बन जाता है।  व्यंग्य विषय गंभीरता के रंग में डूब जाता है।  अपने ही बचपन गुजारने के बाद जवानी में परे हुए लोगों के फेसबुक देखते हैं।  उनको हम ढूंढते हैं पर वह भुलाये बैठे है।  हम उनके पास अपने मित्र बनने का कोई प्रस्ताव नहीं भेजते।  इसका कारण यह है कि अनेक बार वह हमारे व्यंग्यों और चिंत्तनों का हिस्सा बने हैं।  दूसरी बात यह कि हमारे लेखकीय और पाठकीय संस्कारों से न उनका कोई वास्ता है और न ही हमारी इच्छा है कि वह हमसे बिना हृदय के फेसबुक से  जुड़ें।

हम अपने उन बिछड़े लोगों का एबीसी समूह बनाकर बात करते हैं। इनमें हम बी नाम से हैं।   हम अपने ही शहर में रहे पर ए और सी बाहर जाकर बसे हैं।  इंटरनेट पर फुरसत के समय बहुत दिन तक  ए नाम के व्यक्ति का फेसबुक ढूंढा पर मिला नहीं।  अब दो महीने उन्होंने बनाया तो हमारे दृष्टिपथ में आ गया। सी की स्थिति यह थी कि उनकी पत्नी का फेसबुक  मिला। उन पर सी का फोटो क्या  नाम तक नहीं था।  चेहरे से पहचाना कि यह जान पहचान वाली भद्र महिला है।  परसों  उस पर  सी का फोटो देखने को मिला।  अपनी बेटी और दामाद के साथ सी और उसकी पत्नी ने फोटो खिंचवाया और फेसबुक  पर डाला।  ए और उसके  बेटे और बहु का फेसबुक रोज देखते हैं।

उस दिन ए का फोन बहुत दिन बाद आया।  उसे किसी दूसरे आदमी का फोन नंबर चाहिये था।  उस समय उसके बेटे के फेसबुक को ही देख रहे थे जो अधिक सक्रिय है।  हमने उसे नहीं बताया कि क्या कर रहे हैं।  संभावना यह  भी है कि सी से भी अगले सप्ताह उसके शहर आने पर मुलाकात होगी पर उससे फेसबुक की चर्चा बिल्कुल नहीं करेंगे।  दरअसल इसका कारण यह है कि हमारा लिखा देखकर लोग पूछते हैं कि इसका तुम्हें मिलता क्या है?

यहां हम स्वयं को ही प्रभाहीन अनुभव करते हैं।  यह कहते हुए शर्म आती है कि हम फोकटिया हैं। लिखने का अभ्यास इतना है कि एक हजार शब्दों का लेख हम बीस मिनट में सोचते हुए लिख देते हैं।  यह सहज इसलिये होता है कि हमारी दृष्टि हमेशा समय मिलते ही पठनीय सामग्री पर चली जाती है।  यह आवश्यक है कि उसे देखकर ही हम कुछ लिखें पर कहीं न लिखने की प्रेरणा उससे ही मिलती है।  ए और सी के साथ  उनके परिवार  के सदस्यों के फेसबुक देखकर लगता है कि हम भाग्यशाली हैं कि लिखने की शक्ति मिली है।  हालांकि इसमें अच्छा पढ़ने और सुनने का भी योगदान है।

लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
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विचारों की जगह विवाद का प्रतीक बनता जयपुर साहित्य सम्मेलन-हिंदी सम्पादकीय लेख


        जयपुर में कोई साहित्य सम्मेलन हो रहा है।  यह सम्मेलन पिछली बार भी हुआ था।  आमतौर से हमारे देश में साहित्य सम्मेलन हुआ ही करते हैं।  ऐसे साहित्य सम्मेलन हिन्दी साहित्यकारों की ही देन हैं।  ऐसा लगता है कि साहित्य और कवि सम्मेलन की  पंरपरा हिन्दी भाषा से पनपी है। एक तरह से यह विश्व को हिन्दी भाषी साहित्यकारों और कवियों की ऐसी देन है जिस पर अन्य भाषा के लोग भी चलना चाहेंगे।  हमने हिन्दी के अलावा किसी अन्य भाषा के कवि सम्मेलन या साहित्यकार सम्मेलन नहीं सुने हैं इसलिये ऐसा लिख रहे हैं।  हालांकि हिन्दी भाषा में भी वही साहित्यकार माने जाते हैं,  जिनकी किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं या फिर समाचार पत्र पत्रिका  वगैरह में काम करते हैं।  जो लोग कभी कभार प्रकाशित होते हैं फिल्म में काम करने वाला ऐसे  अतिरिक्त कलाकार की तरह माना जाता है जिसे कहीं बुलाया नहीं जाता।

       इधर इंटरनेट पर ब्लॉग आ गया है तो हमें अपने बीस ब्लॉग पत्रिका की तरह लगते हैं।  प्रत्येक ब्लॉग में इतनी रचनायें है कि वह एक किताब ही बन गयी है।  यह अलग बात है कि किसी प्रकाशक के अधीन नहीं है। हम जैसे स्वांत लेखक के लिये जहां यह अच्छी बात है वहीं प्रशंसक पाठकों को यह जानकर निराशा भी होती है कि हमारी एक साहित्यकार के रूप में कोई छवि नहीं है।  हम यहां अपने लिये कोई मान्यता नहीं मांग रहे हैं हम तो हिन्दी के कथित कर्णधारों को स्पष्ट बता रहे हैं कि अब इंटरनेट की वजह से अपनी सोच में बदलाव लायें।   हमें न मानो पर ब्लॉग लेखकों को साहित्यकार की तरह समझो।  उन्हें साहित्यकार सम्मेलनों में बुलाओ वरना तुम्हारे साहित्यकार सम्मेलन उपस्थित दर्शक और श्रोताओं के सामने पुरातनपंथी कार्यक्रम लगते हैं।  इंटरनेट पर स्वयं लिखने वाले लोगों को जब आम लोगों के सामने खड़ा करोगे तभी तुम्हारे कार्यक्रमों की छवि बनेगी।

     जयपुर के जिस सम्मेलन की बात हम कर रहे हैं उसमें किसी ब्लॉग साहित्यकार का नाम न देखकर ऐसा लगता है जैसे कि यह कोई भूले बिसरे साहित्यकारों की आपसी उठक बैठक है।  दूसरी बात यह भी पता नहीं चलती कि इस सम्मेलन की प्रमुख भाषा क्या है?  शायद अंग्रेजी  है तभी इंटरनेट के हिन्दी ब्लॉग इस पर कुछ नहीं लिख रहे।  प्रचार माध्यम भी इसकी खबर तभी देते हैं जब वहां से कोई विवादास्पद विषय उठकर सामने आता है।  जहां तक हम समझ पाये हैं वह यह कि यह कुंठित   उलटपंथी साहित्यकारों का सम्मेलन है।  पिछली बार इसमें सलमान रुशदी को बुलाकर विवाद खड़ा किया गया।  इस बार एक  बंगाली साहित्यकारा ने नक्सलादियों के सपने देखने के हक पर बयान देकर सनसनी खेज खबर बनायी तो अब एक महानुभाव ने भ्रष्टाचार में कुछ खास वर्गों के लोगों को जिम्मेदार बताकर बवाल खड़ा कर दिया।  एक महारथी ने तो भारतीय धर्मों को ही कटघरे में खड़ा किया।   ऐसे अजीबोगरीब बयान देखकर लगता नहीं कि ऐसे साहित्यकार कोई विचारवान भी हैं।

           इससे हमें साफ लग रहा है कि पश्चिम बंगाल से अब परायापन अनुभव कर रहे कुछ बुद्धिमान लोगों ने अपना ठिकाना अब जयपुर बना लिया है।   दावा तो यह हो रहा है कि महान साहित्यकारों को वहां बुलाया गया है पर उनके विचार कहीं भी उसका प्रमाण नहीं देते।  आजादी के बाद धनपतियों, पदवानों और प्रचार प्रबंधकों की कृपा से अनेक लिपिकीय नुमा लोग भी प्रतिष्ठित साहित्यकार कहलाने लगे हैं। लिपिकीयनुमा हमने इसलिये कहा क्योंकि किसी कहानी को  जस का तस उठाकर कागज पर रख देना या फुरसत हो तो  उपन्यास ही लिख डालना हमें सहज लगता है।  निष्कर्ष प्रस्तुत करना या कोई संदेश डालने की कला वाला ही हमें लेखक लगता है।

       दूसरी बात हमें यह लगती है कि अगर हम कोई रचना करते हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि जो कहें वह अपना मौलिक हो। दूसरे के संदेशों का संवाहक बनने वाला लेखक एक तरह से लिपिक ही होता है। हम अपनी सोच को स्पष्ट रूप से रखें न कि अपने शब्द दूसरे की सोच में खोट निकालने पर खर्च करें।   इतना ही नहीं जिस विषय पर लिखें उसके बारे में हमारी स्वयं की राय स्पष्ट होना चाहिये।  अपने विषय के मूलतत्वों को समझे बिना अपनी राय नहीं रखी जा सकती।  जिन उलटपंथियों ने इस साहित्यकार सम्मेलन में भाग लिया है वह स्पष्ट रूप से भारतीय अध्यात्म के विरोधी हैं।  खासतौर से मनुस्मृति के बारे में उनकी राय अत्यंत नकारात्मक है।  उनका मानना है कि मनुस्मृति निम्न वर्ग और नारियों की विरोधी है।  हम उनकी बात थोड़ी के देर के लिये मान भी लेते हैं पर इससे क्या समूची मनुस्मृति को विस्मृत किया जाये?  उसमें भ्रष्टाचार, धर्म के नाम पर पाखंड और नारियों के प्रति अनाचार की जो निंदा की गयी उस पर यह लोग कभी ध्यान क्यों नहीं देते?

        जयपुर में साहित्य सम्मेलन हो रहा है पर उत्तर भारत में उसको कोई महत्व नहीं दे रहा। यह इस आयोजन का नकारात्मक पक्ष है।  एक आम लेखक के रूप में हम जैसे लेखक अगर इस साहित्य सम्मेलन में अरुचि दिखा रहे हैं तो कहीं न कहीं इसके पीछे आयोजन की पृष्ठभूमि और क्रियाकलाप ही हैं।  आखिरी बात यह है कि भारतीय समाज को समझने के लिये लंबी चौड़ी बहस की आवश्यकता नहीं है।  केवल सांसरिक विषयों की बात करेंगे तो यहां कई कहानियां मिलेंगी। इन कहानियों के पात्रों के चरित्र पर बहस करने से कोई निष्कर्ष नहीं निकलता।  भारतीय समाज को वही समझ सकता है जो यहां के अध्यात्म को जानता है।  देश में गरीबी है पर सारे गरीब भीख नहीं मांगते।  स्त्रियों से अन्याय होता है पर सभी सरेआम रोने नहीं आती।  अमीर अनाचार करते हैं पर सभी क्रूरतम नहीं होते।  भारत में जब तक साहित्य अध्यात्म के पक्ष से नहीं जुड़ेगा तब जनप्रिय नहीं बन पायेगा। ऐसे में जयपुर जैसे साहित्यकार सम्मेलन में भाग ले रहे साहित्यकार  विदेशी विचाराधाराओं से  प्रतिबद्धता के कारण कोई अनोखी  बात नहीं कह पाते।  यही कारण है कि   अपनी किसी सकारात्मक पहल करने की नाकामी के चलते  विवादों की वजह से सम्मेलन को प्रचार दिलाने का एक सोचा समझा प्रयास करते हैं।  बाद में माफी मांगें य मुकरें यह अलग बात है।  यह सोचा समझा रवैया अपनाना साहित्यकार की छवि के प्रतिकूल है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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मानव का मन उसे भटकाता है-हिन्दू अध्यात्मिक चिंत्तन


                 मूलतः हिन्दू धर्मधर्म को एक धर्म नहीं बल्कि एक जीवन पद्धति माना जाता है।  जब हम हिन्दू समाज की बात करें तो यह बात ध्यान रखना चाहिए कि उसके धर्म ग्रंथों में कहीं भी धर्म का कोई नाम नहीं दिया गया। कहते हैं कि सनातन धर्म से ही हिन्दू धर्म बना है पर यह नाम भी कहीं नहीं मिलता।  दरअसल हम जिन भारतीय ग्रंथों को धार्मिक कहते हैं वह अध्यात्मिक हैं जिसमें तत्वज्ञान के साथ ही सांसरिक विषयों से भी संबंधित  ज्ञान-विज्ञान का  व्यापक वर्णन मिलता है।  यह अलग बात है कि उसमें तत्वज्ञान का सर्वाधिक महत्व है।

चूंकि मानव का एक मन है। वह उसे भटकाता है इसलिये अनेक बातें मनोरंजक ढंग से कही गयी हैं जिनका संदेश अनेक प्रकार की कहानियों में मिलता है। वही तत्वज्ञान के भी उनमें दर्शन होते हैं पर उसके साथ कहानियां नहीं होती।  यह अलग बात है कि अगर कोई मनुष्य इस तत्वज्ञान का समझ ले तो वह मनोरंजन का मोहताज नहीं होता क्योंकि हर क्षण वह जीवन का आनंद लेता है।  मनोरंजन की आयु क्षणिक होती है। एक विषय से मनुष्य ऊबता है तो दूसरे में रमने की उसमें इच्छा बलवती होती है।  विषयों में लिप्त व्यक्ति केवल उनसे ही मनोरंजन पाता है जबकि तत्वज्ञानी बिना लिप्त हुए आनंदित रहता है।  उसे कभी ऊब नहीं होती।

भारतीय अध्यात्म का सार श्रीमद्भागवत गीता में सारगर्भित ढंग से व्यक्त किया गया है।  उसमें कोई सांसरिक विषय नहीं पर सारे संसार की समझ उसे पढ़ने पर स्वतः आ जाती है। स्थिति यह हो जाती है कि किसी विषय में निरंतर लिप्त होने वाला आदमी अपने कार्य में इतना ज्ञानी नहीं होता जितना तत्वज्ञानी दूर बैठकर सारा सत्य जान लेता है। कर्म तथा गुण के तत्व का जानने वाले ज्ञानी हर प्रकार की क्रिया के परिणाम को सहजता से जान लेते हैं।  आम आदमी इसे सिद्धि मानते हैं पर तत्वाज्ञानियों के लिये यह ज्ञान और विज्ञान का विषय अत्यंत सहज हो जाता है।  वह अपने सिद्ध होने का दावा नहीं करते न ही किसी चमत्कार का प्रदर्शन करते हैं। धर्म उनके लिये कोई मनुष्य से परे दिखने वाला कोई विषय नहीं बल्कि चरित्र और व्यवहार का प्रमाण देने वाला एक संकेतक होता है।

पश्चिम में अनेक धर्म प्रचलित हैं पर भारत भूमि से संबंध रखने वाले धर्मों में अध्यात्म की ऐसी जानकारियां हैं जिनका वैज्ञानिक महत्व है पर अंग्रेजी के प्रभाव में फंसे भारतीय समाज ने उसे भुला दिया है।  यह अलग बात है कि यहां के लोगों में अभी भी उसकी स्मृतियां शेष हैं जिस कारण यदाकदा सच्चे साधु संतों के दर्शन हो जाते हैं। इन साधु संतों को न प्रचार से मतलब है न ही शिष्यों के संग्रह में रुचि  होती है। इस कारण लोग उनके संपर्क में नहीं आते।  इसकी वजह से धर्म प्रचार का व्यवसायिक उपयोग करने वालो संत का रूप धरकर उनके पास पहुंच जाते हैं।  इस व्यवसायिक प्रचारकों को नाम तथा नामा दोनों ही मिलता है।  अगर तत्वज्ञान की दृष्टि से देखें तो इन प्रचारकों का कोई दोष नहीं है। आम आदमी का भी दोष नहीं क्योंकि उसके पास तत्वज्ञान का अभाव है। अगर हमारे समाज में श्रीमद्भागवत गीता का पाठ्य पुस्तकों में आम प्रचलन होता तो शायद यह स्थिति नहीं होती। हालांकि यह भी केवल अनुमान है क्योंकि देखा तो यह भी जाता है कि श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान देने वाले संत भी उसमें वर्णित धर्म व्यवहार से परे ही प्रतीत होते हैं।

सच बात तो यह है कि लोग मनोरंजन के लिये मोहताज हैं और उनको बहलाने वाले धर्म, कला, फिल्म, राजनीति तथा शिक्षा के क्षेत्र में अलग व्यवसायिक प्रवृत्तियों वाले कुछ चालाक लोग सक्रिय है। अनेक जगह तो धर्म के नाम भी ऐसी गतिविधियां दिखने को मिलती हैं जिनका धर्म से कोई संबंध नहीं होता।  जिन धुनों की गीतों के लिये उपयोग किया जाता है धर्मभीरुओं के भरमाने के लिये उन्हीं पर भजन बनाये जाते हैं। संगीत मानव मन की कमजोरी तो धर्म भी मजबूरी  है उसका शिकार आम आदमी किस तरह हो सकता है इसे मनोरंजन के व्यापारी अच्छी तरह जानते हैं।  यह मनोरंजन अधिक देर नहीं टिकता। इसके विपरीत तत्वज्ञानी संसार की इन्हीं गतिविधियों पर हमेशा हंसते हुए आनंद लेते हैं।  सांसरिक आदमी मनोरंजन में लिप्त फिल्म और टीवी के साथ संगीत  में लीन होकर अपना उद्धार ढूंढता है तो ज्ञानी उसे देखकर हंसता है।  आम आदमी कल्पित कहानियों में कभी हास्य तो कभी गंभीर कभी वीभत्स तो कभी श्रृंगार रस की नदी में  बहकर मनोरंजन करता है तो ज्ञानी उसके भटकाव की असली कहानी का आनंद उठाता है।  एक सांसरिक मनुष्य और ज्ञानी में बस अंतर इतना ही है कि एक मनोरंजन के लिये बाहर साधन ढूंढता है जो क्षणिक और अप्रभावी होता है तो दूसरा अपने अंदर से ही प्राप्त कर आनंद स्थापित कर अपनी शक्ति और ज्ञान दोनों ही बढ़ाता है।

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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कागजों में फ़रिश्ते-हिंदी व्यंग्य कविता



कभी वह वह जोर से रोते
कभी हंसे जाते हैं,
सामने पर्दे पर चलते दृश्य देखकर
उनके ख्याल भी बदल जाते हैं।
कहें दीपक बापू
लेते हैं वह मुस्कराने के भी दाम
आंसु भी कौड़ियों के भाव नहीं बहाते
अपनी हर अदा पर लेते कभी दान कभी चंदा
ज़माने का भला का दावा भी कर जाते,
बेसहारों को दर्द बांटने रहो
मशहूर होने का ख्याल छोड़कर
अब दुनियां का दस्तूर बन गया
करते हैं जो लोग जज़्बातों का व्यापार
कागजों में फरिश्तों की तरह
अपना नाम भी वही लिखा पाते हैं।
————————————————–
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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आम आदमी के नाम का सहारा-हिंदी व्यंग्य


       आम आदमी अब एक लोकप्रिय प्रचलित शब्द हो गया है।  जो लोग राजनीति, साहित्य, कला, फिल्म, पत्रकारिता, आर्थिक कार्य और समाज सेवा में शिखर पुरुष न होकर आम आदमी की तरह सक्रिय हैं उन्हें इस बात पर प्रसन्न नहीं होना चाहिए कि उनकी इज्जत बढ़ रही है क्योंकि उनका आम आदमी होना मतलब भीड़ में भेड़ की तरह ही है।  हां, एक बात जरूर अच्छी हो गयी है कि अब देश में गरीब, बेरोजगार, बीमार, नारी, बच्चा आदि शब्दों में समाज बांटकर नहीं बल्कि आम आदमी की तरह छांटा जा रहा है।  वैसे कुछ लोग जो टीवी के पर्दे पर लगातार दिखने के साथ ही अखबारों में चमक  रहे हैं उनको आम आदमी का दावा नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे प्रचार माध्यमों की खास आदमी के नाम से लाभ उठाने की मौलिक प्रवृत्ति बदल नहीं रही। अगर वह किसी कथित आम आदमी के नाम को चमका रहे हैं तो केवल इसलिये कि उनके बयानों पर बहस का समय विज्ञापन प्रसारण में  अच्छी  तरह पास होता रहा है।
         सच बात तो यह है कि हर आम आदमी  समाज के सामने खास होकर चमकना चाहता है। हाथ तो हर कोई मारता है पर जो आम आदमी में गरीब, बीमार, बेरोजगार  तथा  अशिक्षित जैसी संज्ञायें लगाकर भेद करते हुए उनके कल्याण के नारे लगाने के साथ ही नारी उद्धार की बात करता है उनको ही खास बनने का सौभाग्य प्राप्त हो्रता है।  अब लगता है कि आम आदमी का कल्याण करने का नारा भी कामयाब होता दिख रहा है।
        उस दिन अकविराज दीपक बापू सड़क पर  टहल रहे थे। एक आदमी ने पीछे आया और  नमस्ते की तो वह चौंक गये।  उन्होंने भी हाथ जोड़कर उसका अभिवादन किया।  आदमी  ने कहा‘‘ क्या बात है आज अपना पुराना फटीचर स्कूटर कहां छोड़ दिया?’’
           दीपक बापू चौंक गये फिर बोले-‘‘हमने आपको पहचाना नहीं।  हम जैसे आम आदमी के साथ आप इस तरह बात कर रहे हैं जैसे कि बरसों से परिचित हैं।’’
           वह आदमी उनके पास आया और उन्हें घूरकर देखने लगा फिर बोला-‘माफ कीजिऐ, मैंने आपको फंदेबाज समझ लिया। वह मेरा दोस्त है और आपको गौर से नहीं देखा इसलिये लगा कि कहीं आप हैं।  आपने अभी यह कहा कि आप आदमी हैं, पर कभी आपको टीवी पर नहीं देखा।’’
         दीपक बापू हंसे और बोले-‘‘आपकी बात सुनकर हैरानी हो रही है।  एक तो आपने पुराने फटीचर स्कूटर की बात की उसे सुनकर मुझे लगा कि आप शायद परिचित हैं पर पता लगा कि मेरे जैसा भी कोई आम आदमी है जिसे आप जानते हैं।  रही बात टीवी पर दिखने की तो भई उनके पर्दे पर हमारे जैसे आम आदमियों के लिये भला कोई जगह है? इस तरह तो मैंने भी कभी आपको टीवी पर नहीं देखा। आप भी आम आदमी ही है न?’’
      वह आदमी बोला-‘‘मुझे कैसे देखेंगे? मैं तो नौकरी करता हूं!  आजकल टीवी पर आम आदमी की बहुत चर्चा है सोचा शायद कभी आप वहां पर अवतरित हुए हों!  आजकल आम आदमी टीवी पर ही दिखते हैं।’’
        दीपक बापू हंसकर बोले-‘‘हां, हम भी देख रहे हैं पर वही  लोग पर्दे पर अपने को आम  आदमी  की तरह चमका सकते हैं जिन पर खास लोगों का आशीर्वाद हो।  आप और हम जैसे आम आदमी तो इसी तरह सड़कों पर घूमेंगे।’’
          वह आदमी बोला-‘‘क्या बात कर रहे हें? मैं आम आदमी नहीं नौकरीपेशा आदमी हूं।  किसी ने सुन लिया तो मेरी शामत भी आ सकती है। यह आम आदमी की पदवी आप अपने पास ही रख लीजिऐ।’’
      वह तो चला गया पर दीपक बापू थोड़ा चौंक गये।  आम आदमी का मतलब क्या बेरोजगार, लाचार, गरीब और कम पढ़ा लिखा होना ही है?  सच बात तो यह है कि समाज को एक पूरी इकाई मानकर बरगलाना बहुत कठिन काम है इसलिये गरीब-अमीर, व्यापारी-बेरोजगार, स्त्री-पुरुष, तथा स्वस्थ-बीमार का भेद कर कल्याण करने के नारे लगते हैं।  इसका कारण यह है कि छोटे वर्ग के आदमी को यह खुशफहमी रहती है कि बड़े वर्ग से लेकर उसका पेट भरा जायेगा।  यह होता नहीं है।  अभी तक आम आदमी को लेकर कोई वर्ग नहीं बना था।  अमीर, पुरुष, और शिक्षित वर्ग में कोई भी आम आदमी नहीं हो सकता है यह भ्रम फैलाया गया है।  वह वर्ग जो अपनी मेहनत से कमा कर परिवार का पेट भरता है उसका तो दोहन करना ही है पर जो उसके घर में जो बेरोजगार पुत्र या पुत्री, गृहस्थ कर्म में रत स्त्री और घर में रहने वाले बड़े बुजुर्ग का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने के लिये उनके भले के नारे लगते रहे।  कमाऊ पुरुष एक तरह से राक्षस माना गया जो अपने पर आश्रित लोगों का शोषण करने के साथ उपेक्षा का भाव रखता है।  सड़क, कार्यालय या दुकान पर वह जो परेशानियां झेलता है उसकी चर्चा कहीं नहीं होती।
        वह उपेक्षित आम आदमी था। न ऐसे लोग कभी भले करने के नारों पर भटकते हैं न ही उसे यकीन था कि कोई उसके साथ है।  अब जबसे आम आदमी का नाम टीवी पर आने लगा है उससे सभी चौंक गये हैं।  इधर अंतर्जाल पर भी लाखों आम आदमी मौजूद है।  उनके ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर पर खाते हैं पर केवल खाताधारी है। उनको लेखक, कवि, कार्टूनिस्ट और पत्रकार का दर्जा प्राप्त नहीं है। जिनको मिला है वह खास लोगो की कृपा है।  ऐसा लगता है कि पहले गरीब, बेरोजगार, बीमार, बुजुर्ग और महिलाओं के कल्याण का नारा अब बोरियत भरा हो गया लगा है इसलिये प्रचार माध्यमों ने आम आदमी बनाये हैं।  अपने आम आदमी!  जिनके ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर पर खाते हैं पर उनको वैसा ही सम्मान मिल रहा है जिसे कि अभिनय, राजनीति, फिल्म, टीवी और समाचार पत्रों के शिखर पुरुषों को प्राप्त है।  खास लोग अगर इंटरनेट पर अपने छींकने की खबर भी रख दें तो वह टीवी पर दिखाई जाती है।  आम आदमी जो शब्दिक प्रहार कर रहा है उसकी चर्चा कोई नहीं कर रहा। यह आम आदमी नाम जहाज प्रचार के समंदर में केवल उन्हीं को पार लगायेगा जो कि खास आदमी से आशीर्वाद लेकर उसमें चढ़ेंगे।  ऐसे में दीपक बापू जो स्वयं को आम आदमी कहते थे अब कहने लगे हैं कि हम तो ‘‘शुद्ध आम आदमी है।’’
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com

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हिंदी में बोलना और सोचना-हिंदी व्यंग्य कविता


हिन्दी दिवस पर भाषण

बहुत होंगे

कोई हिंग्लिश में बोलेगा

कोई अंग्रेजी में बोलकर

अपनी बात खुद ही तोलेगा।

कहें दीपक बापू

भाषा और संस्कारों में

पश्चिम और पूर्व के रंग

इस कदर मिल गये हैं

हिन्दी में सोचते हैं सभी

मगर बोलने के लिये

अंग्रेजी जुबान चाहिए

कौन है जो हिन्दी में मुंह खोलेगा।

——————————————

कवि लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर, मध्यप्रदेश

Poet or Writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Lashkar, Gwalior madhya pradesh

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ज़माने के सामने इतराना-हिंदी कविता


अपने सपनों का पूरा होने का बोझ
दूसरों के कंधों पर वह टिकाते हैं,
पूरे होने पर अपनी कामयाबी पर
अपनी ही ताकत दिखाते हैं।
कहें दीपक बापू
मेहनत और अक्ल का
इस्तेमाल करने का सलीका नहीं जिनको
वही दूसरों को अपनी जरूरतों के वास्ते
पहले सर्वशक्तिमान से याचना
फिर पूरी होने पर
ज़माने के सामने इतराना सिखाते हैं।
—————————————-
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा
ग्वालियर मध्य प्रदेश

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,ग्वालियर
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