Tag Archives: परिवार

उनकी दरियादिली-हिन्दी कवितायें


ईमानदार हो या नहीं

ज़माने को बहलाने के लिये

दिखना जरूरी है।

किसी के जिस्म पर रहम करें

मगर दौलत और शोहरत के लिये

इंसानों के जज़्बातों से

खेलना जरूरी है।

कहें दीपक बापू सबसे ऊंचा हिमालय

त्यागियों का ही आश्रयदाता है

जज़्बातों के सौदागरों की छवि

सन्यासी जैसी दिखाने के लिये

नकली हिमालय बनाना जरूरी है।

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हमसे तेल लेकर

अपने घर की

रौशनी उन्होंने जलाई।

चहक रहे हैं वह

अपनी मस्ती में

न चिराग अपना न दियासलाई।

कहें दीपक बापू रौशनदान से

हम भी झांक लेते हैं,

कैसे वह अपनी दरियादिली

अपने मुंह से फांक देते हैं,

ज़माने की क्या करेंगे भलाई

पहले स्वयं तो खा लें मलाई।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
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सर्वशक्तिमान का रूप अचिंतनीय है-21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख


        प्रचार माध्यमों के अनुसार ब्रिटेन में इस बात पर बहस छिड़ी है कि गॉड स्त्री है या पुरुष! हमारे हिसाब से उन्हें इस बात पर बहस करना ही नहीं चाहिये क्योंकि अंग्रेजी में स्त्री या पुरुष की क्रिया के वाचन शब्द का कोई विभाजन ही नहीं है। स्त्री कार्य कर रही है(Women is working) या पुरुष कार्य कर रहा है(Men is working) इसमें अंग्रेजी वर्किंग शब्द ही उपयोग होता है। यही कारण है कि अनेक कट्टर हिन्दी समर्थक अपनी भाषा को वैज्ञानिक और अंग्रेजी को भ्रामक मानते हैं। यह बहस देखकर उनके तर्क स्वाभाविक लगते हैं|

   सर्वशक्तिमान की स्थिति पर भारतीय दर्शन स्पष्ट है। हमारे यहां परब्रह्म शब्द  सर्वशक्तिमान के लिये ही उपयोग  किया जायेगा।  मुख्य बात यह कि वह अनंत माना जाता है-यह स्पष्ट किया गया है कि वह चित में धारण किया जा सकता है पर वह रूप, रस, गंध, स्वर और स्पर्श के गुणों से नहीं जाना जा सकता। वह चिंत्तन से परे है पर मनुष्य अपने चित्त में जिस गुण से उसका स्मरण करेगा वही उसका ब्रह्म है।

         हमारे यहां विदेशी विचाराधारा के प्रवर्तक सब का सर्वशक्तिमान एक है का नारा लगाते हुए यहां भ्रम पैदा करते हैं। सद्भाव के नाम पर यही नारा लगाते हैं पर सच यह है कि वह एक है कि अनेक, यह कहना या मानना संभव नहीं। अनेक विद्वान तो यह भी कहते हैं कि वह है भी कि नहीं इस पर भी कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह अनंत है। इसलिये उस पर बहस करना ही नहीं चाहिये। वह वैसा ही है जैसा भक्त है। भक्त जिस रूप में चाहता है उसे धारण कर ले। हमारे यहां अनेक साकार स्वरूप माने जाते हैं। भक्ति को जीवन का अभिन्न भाग माना जाता है। यही कारण है कि निराकार परब्रह्म की कल्पना में असहजता अनुभव करने वाले साकार रूप में उसे स्थापित करते हैं पर उनमें यह ज्ञान रहता ही है कि वह अनंत है। अपने अपने स्वरूपों को लेकर बहस कहीं नहीं होती। यह तत्वज्ञान हर भारतीय विचारधारा में स्थापित है  इसलिये यहां ऐसी निरर्थक तथा भ्रामक चर्चा कभी नहीं होती।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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कंपनी के उत्पाद परंपरागत भोजन न बनायें-हिन्दी चिंत्तन लेख और कविता


       अब मेगी को खाने के लिये खतरनाक बताया जा रहा है। हैरानी की बात है कि यह बात बहुत समय बाद तब सामने आयी है जब यह युवा पीढ़ी के जीवन का हिस्सा बन चुकी है। युवा पीढ़ी ही क्या पुरानी पीढ़ी भी इसका उपयोग अपनी सुविधा के लिये कर रही है। शादी विवाह में मैगी को एक पकवान की तरह परोसा जाता है। एक तरह से मेगी ने खान पान में नये फैशन की तरह जगह बनाई है। हमारा सवाल तो यह है कि मान लीजिये कि मेगी में खतरनाक तत्व नहीं भी है तो क्या उसका उपयोग घरेलू भोजन के विकल्प में रूप में अपनाना चाहिये?

आज के दौर में भोजन केवल स्वाद के लिये अपनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जिस भोज्य पदाथों से देह में रक्त तथा शक्ति का निर्माण होता है उन्हें जीभ के स्वाद की वजह से ही कम उपयोग किया जाने लगा है। लौकी, तुरिया और करेला का उपयोग मधुमेह का रोग होने पर ही करने का विचार आता है। सबसे बड़ी बात कि मेगी तथा बेकरी मे अनेक दिनों से बने पदार्थों के उपयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है।

     हमने तो यह सब स्थितियां बताई हैं जो वर्तमान समय में परंपरागत  भोजन के विकल्प के रूप में खतरनाब पदार्थों का चयन हो रहा है। हमारा तो यह कहना है कि  अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार भोजन के अनुसार ही व्यक्ति की बाह्य श्रेणी भी निर्धारित होती है। भोजन केवल पेट भरने के लिये नहीं होता वरन् उदरस्थ पदार्थ मनुष्य की मानसिकता पर भी प्रभाव डालते हैं। बासी भोजन तामस प्रवृत्ति का परिचायक है। इसे हम यह भी कह सकते हैं कि बासी पदार्थों को खाने वालों में तामसी प्रवृत्ति आ ही जाती है और वह आलस तथा प्रमाद की तरफ आकर्षित होते हैं।

हर जीव के लिये भोजन अनिवार्य है। यह अलग बात है कि पशु, पक्षी, तथा अन्य जीवों की अपेक्षा मनुष्य के पास भोज्य पदार्थ के अधिक विकल्प रहे हैं पर इस सुविधा का उपयोग करने की कला उसे नहीं आयी। हमारे अध्यात्मिक दर्शन में सात्विक भोजन करने का संदेश दिया जाता है क्योंकि कहीं न कहीं मनुष्य की बाह्य सक्रियता आंतरिक विचार से प्रभावित होती है। इसलिये भोज्य पदार्थों का चयन करते समय पेट भरने की बजाय हम जीवन में किस तरह की प्रवृत्ति के साथ सक्रिय रहें इस पर विचार करना चाहिये।

खाने पर बहस-हिंदी कविता

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मांस खायें या मिश्री मावा

इस पर प्रचारवीर

अभियान चला रहे हैं।

महंगाई में दोनों ही महंगे

मिलावट के दौर में

शुद्धता लापता 

फिर भी शोर मचाकर लोगों के

कान जला रहे हैं।

कहें दीपक बापू भरे पेट वाले

नहीं करते बात

सड़क पानी और बिजली की

समाज की ऊर्जा 

भोजन पकाने की बजाय

बहस में गला रहे हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

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क्रिकेट मैचों पर व्यंग्यकार की वक्रदृष्टि


        कुछ समझदार लोग अब इस बात से प्रसन्न है कि वह चैन से टीवी पर समाचार देख सकेंगे। कथित विश्व कप से-जिसे कुछ विशेषज्ञ अंतर्राष्ट्रीय कप ही मानते हैं- बीसीसीआई की टीम बाहर हो गयी है। इसलिये भारत के सामान्य सभ्रांत लोग रविवार को आराम से इधर उधर घूमने जा पायेंगे। समझदार मायने क्या? क्रिकेट के व्यवसाय की असलियत जानते हुए भी कभी कभी प्रचार माध्यमों के दबाव में देशभक्ति से ओतप्रोत होकर कुछ लोग मैच देखने लग ही जाते हैं।  कहा जाता है कि बंदर कितना भी बुढ़ा जाये गुलाटियां लगाना नहीं भूलता।  ऐसे ही फिक्सिंग और सट्टे के प्रभाव के समाचार टीवी चैनलों पर देखने बाद अनेक ऐसे लोग जो युवावस्था से मैचे देखते हुए चले आ रहे थे- अब तो उनके बच्चे भी युवा है-इससे विरक्त हो गये थे, पर अब कभी न कभी टीवी पर चिपक ही जाते हैं।  मालुम है कि सब कुछ पटकथा जिस तरह लिखी गयी है उसके अनुसार ही मैच होते हैं फिर भी मन है कि मानता नहीं।

          ऐसे ही हमारे एक मित्र ने जब एक टीवी चैनल पर सुना कि सट्टबाजों की पसंदीदा की टीम है तो विचलित हो गये।  हमसे इस समाचार का मतलब पूछा। हम ज्ञान साधक होने के नाते दूसरे का मन खराब नहीं करते इसलिये अपनी अनभिज्ञता जाहिर की।

          वह बोले-‘‘यार, हमने देखा है कि सट्टेबाजों की पसंदीदा टीम हारती नहीं है।’’

          हमने कहा-‘‘तब मैच मत देखना!’’

          अगले दिन वह मिले तो बोले-‘यार, टीवी चैनल वाले भी गजब है।  उनका इशारा जो समझ ले वही बुद्धिमान है।’’

जब बीसीसीआई के टीम ने एसीबी का पहला ही विकेट जल्द झटक लिया तो वह काम पर जाना छोड़कर घर में ही जम गये। तब वह सोच रहे थे कि संभव है कि इस बार सट्टेबाज नाकाम हो जायें पर जब दूसरा विकेट नहीं मिला और तेजी से रन बन रहे थे तो वह घर से चले गये।  बाद में कहीं दूसरी जगह बीसीसीआई की पारी देखने लगे। जब पहले विकेट की साझेदारी जोरदार चल रही थी तब वह सोच रहे थे कि आज तो सट्टेबाज फ्लाप हो रहे हैं। मगर यह क्या?  थोड़ी देर बाद ही एक के एक खिलाड़ी होते गये। जिस तरह बीसीसीआई के दूल्हे एक के बाद एक बाराती बनकर बाहर जा रहे थे उससे उनका माथा ठनका। तब यह बात उनके समझ में आयी कि अगर मामला क्रिकेट का हो तो सट्टेबाज  भारतीय ज्योतिष शास्त्र में अधिक दक्ष लगते हैं।

          बीसीसीआई की टीम ने लगातार सात मैच जीतकर जो पुराने क्रिकेट प्रेमियों में उम्मीद जगाई थी वह टूट गयी।  हम दूसरों की क्या कहें जो इन मैचों पर संदिग्ध दृष्टि रखते हैं वह भी प्रचार के झांसे आ ही जाते हैं तो उन लोगों की क्या कहें जो इसे नहीं जानते। बहरहाल हमारे मित्र इस बात पर खुश थे कि उन्हें इस भ्रम से दो दिन पहले मुक्ति मिल गयी  वरना बीसीसीआई की टीम अगर सेमीफायनल  जीत जाती तो फायनल तक बेकार वक्त खराब होता।  हमें हैरानी हुई लोग ऐसा भी सोच सकते हैं।  धन्य है कि क्रिकेट की महिमा!

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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शोर की महफिल में जाने का नतीजा-हिन्दी शायरियां (shor ki mahafil mein jane ka natija-hindi shayriyan)


हमने पूछा था पता
अपना दिल बहलाने का
उन्होंने शोर की महफिल का रास्ता बता दिया
हम गये थे तसल्ली पाने
लौटे साथ यह दर्द लेकर
कि लोगों ने खौफनाक हादसों
दिल बहलाने के लिये
अपने लफ्जों में सजा लिया।
———
अपने साथ हादसे
हम यूं ही छिपाये जाते हैं,
मालुम है कि कोई हमदर्द नहीं बनेगा
लोगों का शौक हो गया
अपने दर्द का इलाज
दूसरों की तकलीफ मे
दिल बहलाने के लिये ढूंढने जाते हैं।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
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