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अभी तक देशी सर्वर स्थापित होना चाहिए था-डिजिटल इंडिया सप्ताह पर चिंत्तन लेख


      हमारे देश में सरकार ने डिजिटल इंडिया सप्ताह का प्रारंभ किया है। डिजिटल इंडिया की सफलता के लिये बहुत सारा पैसा खर्च करने की बात चल रही है। अपना स्वदेशी अंतर्जालीय मस्तक यानि सर्वर बनाया जाना चाहिये। इतनी सारी टेलीफोन कंपनियां हैं पर आज तक एक भी स्वदेशी सर्वर नहीं बन पाया-इस पर अनेक विशेषज्ञों को हैरानी है।

     इतने उद्योगपति भारत में हैं। साफ्टवेयर में भारतीय इंजीनियर दुनियां में झंडा फहरा रहे हैं। फिर भी भारत में एक भी स्वदेशी सर्वर नहीं बन सका जो केवल अपने ही देश का अंतर्जालीय बोझ उठा सके और हम कह सकें कि यह है हमारा भारतीय अंतर्जालीय मस्तक। हैरानी की बात यह है कि यह अभी भी एक सपना लगता है

                              व्यापार सभी करते हैं पर प्रबंध कौशल किसी किसी में ही होता है।  हमारे देश में आबादी सदैव अधिक रही है। प्रकृत्ति की कृपा भी अन्य देशों की अपेक्षा यहां अधिक है।  मानव श्रम और उपभोक्ता  अधिक होने से यहां वणिकों के लिये सदैव एक बाज़ार रहा है पर उन्हें दैनिक उपभोग क्रय विक्रय करने में हमेशा सुविधा उठाने की योग्यता ही रखते हैं।  इसलिये उन्हें प्रबंध कौशल की आवश्यकता नहीं रहती। व्यापार में प्रबंध कौशल का पता सामने उपस्थित वस्तु के विक्रय से नहीं वरन् विक्रय योग्य नयी वस्तु के निर्माण तथा उसके लिये बाज़ार बनाने से ही पता लगता  है। इस मामले में पश्चिमी जगत अपने हमसे आगे है। विदेशी सर्वरों के चलते भारतीय संचार व्यवसायियों ने देश के उपभोक्ताओं का जमकर दोहन किया। वह भी तब जब भारतीय संचार निगम का प्रदर्शन गिराता गया। अपना पैसा देश में रखा या बाहर ले गये यह तो पता नहीं पर उन्होंने यहां संचार के क्षेत्र में किसी नये निर्माण को प्रोत्साहित नहीं किया। स्वदेशी अंतर्जाल मस्तक यानि सर्वर का न होने भारत के कथित पूंजीपतियों के प्रबंध कौशल तथा देश से प्रतिबद्धता रखने के अभाव को पूरे विश्व में दर्शाता है।

      बताया तो यहां तक जाता है कि अमेरिका अंतर्जालीय उपलब्धियों में हमसे आगे है पर ईरान और चीन भी कम नहीं है। एक बात हम यहां स्पष्ट कर दें कि हमारी दृष्टि से भारतीय साफ्टवेयर इंजीनियरों की वैश्विक योग्यता को देखते  उनकी यह अग्रता हो ही नहीं सकती।  चीन तो यह बात स्पष्ट रूप से मान ही चुका है कि भारत की बौद्धिक क्षमता उससे आगे हैं।  ऐसे में यह सवाल उठता ही है कि आखिर हमारे देश के कथित सेठ क्यों नहीं ऐसा कर पाये? क्या यह उनकी इस मानसिकता का प्रमाण नहीं है कि वह अपने समाज या देश के किसी व्यक्ति को  इतना प्रसिद्ध या सफल होते नहीं देखना चाहते जो उनकी सामने खड़े होकर आंखें मिला सके? एक स्वदेश अंतर्जालीय मस्तक या सर्वर का न होना तो यही दर्शाता है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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उनकी दरियादिली-हिन्दी कवितायें


ईमानदार हो या नहीं

ज़माने को बहलाने के लिये

दिखना जरूरी है।

किसी के जिस्म पर रहम करें

मगर दौलत और शोहरत के लिये

इंसानों के जज़्बातों से

खेलना जरूरी है।

कहें दीपक बापू सबसे ऊंचा हिमालय

त्यागियों का ही आश्रयदाता है

जज़्बातों के सौदागरों की छवि

सन्यासी जैसी दिखाने के लिये

नकली हिमालय बनाना जरूरी है।

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हमसे तेल लेकर

अपने घर की

रौशनी उन्होंने जलाई।

चहक रहे हैं वह

अपनी मस्ती में

न चिराग अपना न दियासलाई।

कहें दीपक बापू रौशनदान से

हम भी झांक लेते हैं,

कैसे वह अपनी दरियादिली

अपने मुंह से फांक देते हैं,

ज़माने की क्या करेंगे भलाई

पहले स्वयं तो खा लें मलाई।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
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सर्वशक्तिमान का रूप अचिंतनीय है-21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख


        प्रचार माध्यमों के अनुसार ब्रिटेन में इस बात पर बहस छिड़ी है कि गॉड स्त्री है या पुरुष! हमारे हिसाब से उन्हें इस बात पर बहस करना ही नहीं चाहिये क्योंकि अंग्रेजी में स्त्री या पुरुष की क्रिया के वाचन शब्द का कोई विभाजन ही नहीं है। स्त्री कार्य कर रही है(Women is working) या पुरुष कार्य कर रहा है(Men is working) इसमें अंग्रेजी वर्किंग शब्द ही उपयोग होता है। यही कारण है कि अनेक कट्टर हिन्दी समर्थक अपनी भाषा को वैज्ञानिक और अंग्रेजी को भ्रामक मानते हैं। यह बहस देखकर उनके तर्क स्वाभाविक लगते हैं|

   सर्वशक्तिमान की स्थिति पर भारतीय दर्शन स्पष्ट है। हमारे यहां परब्रह्म शब्द  सर्वशक्तिमान के लिये ही उपयोग  किया जायेगा।  मुख्य बात यह कि वह अनंत माना जाता है-यह स्पष्ट किया गया है कि वह चित में धारण किया जा सकता है पर वह रूप, रस, गंध, स्वर और स्पर्श के गुणों से नहीं जाना जा सकता। वह चिंत्तन से परे है पर मनुष्य अपने चित्त में जिस गुण से उसका स्मरण करेगा वही उसका ब्रह्म है।

         हमारे यहां विदेशी विचाराधारा के प्रवर्तक सब का सर्वशक्तिमान एक है का नारा लगाते हुए यहां भ्रम पैदा करते हैं। सद्भाव के नाम पर यही नारा लगाते हैं पर सच यह है कि वह एक है कि अनेक, यह कहना या मानना संभव नहीं। अनेक विद्वान तो यह भी कहते हैं कि वह है भी कि नहीं इस पर भी कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह अनंत है। इसलिये उस पर बहस करना ही नहीं चाहिये। वह वैसा ही है जैसा भक्त है। भक्त जिस रूप में चाहता है उसे धारण कर ले। हमारे यहां अनेक साकार स्वरूप माने जाते हैं। भक्ति को जीवन का अभिन्न भाग माना जाता है। यही कारण है कि निराकार परब्रह्म की कल्पना में असहजता अनुभव करने वाले साकार रूप में उसे स्थापित करते हैं पर उनमें यह ज्ञान रहता ही है कि वह अनंत है। अपने अपने स्वरूपों को लेकर बहस कहीं नहीं होती। यह तत्वज्ञान हर भारतीय विचारधारा में स्थापित है  इसलिये यहां ऐसी निरर्थक तथा भ्रामक चर्चा कभी नहीं होती।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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