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पतंजलि के नाम से दवा बिके तो धन्वंतरि का नाम याद नहीं रहता-हिन्दी व्यंग्य


                                आज भगवान धन्वंतरि का प्रकट दिवस ही धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। धन्वंतरि के नाम का संक्षिप्तीकरण इस तरह किया गया है कि सारे अर्थ ही उलट गये हैं। भगवान धन्वंतरि को आरोग्य का देवता माना गया है जिसका सीधा संबंध आयुर्वेद से है। हमारे यहां अनेक ऋषि अपने कृतित्व से भगवत् प्रतिष्ठ हुए। अगर उनकी सूची बनायें तो बहुत लंबी हो जायेगी।  हमने देखा है कि अनेक आयुर्वेद औषधि की छाप पर भगवान धन्वंतरि की तस्वीर रहती है।  यह सहज स्वीकार्य है पर जब आजकल हम पंतजलि के नाम बिस्कुट, चाकलेट और सौदर्य प्रसाधन बिकते देखते हैं तो आश्चर्य होता है।  मजे की बात यह कि अनेक धर्म के ठेकेदार मौन होकर सब देख रहे हैं। आजकल स्वदेशी और देशभक्ति के नाम पर कोई भी ऐसा काम किया जाता है जिसे सामान्य जनमानस की संवदेनाओं से खेला जा सके।

                  एक योग शिक्षक अब महान पूंजीपतियों की श्रेणी में जा बैठे हैं।  समाज सुधार, स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग की प्रेरणा और समाज में सद्भावना का ठेका लेते हुए वह देश के प्रचार माध्यमों में विज्ञापन नायक भी बन गये हैं। जब वह योग का प्रचार करते हुए विरोधियों के निशाने पर थे अपने उनके समर्थन में हमने अनेक पाठ अंतर्जाल पर लिखे थे।  उन पाठों पर अनेक पाठकों ने हमारे से न वरन् असहमति जताई वरन् हमें उनका पेशवेर प्रचारक तक कह दिया था।  हमने 19 वर्ष पूर्व योग साधना प्रारंभ की थी तब उस योग शिक्षक का नाम तक कोई नहीं जानता था।  दस वर्ष पूर्व उनके प्रादुर्भाव प्रचार जगत में हुआ तो हमें प्रसन्नता हुई। हम सोचते थे चलो कोई तो ऐसा व्यक्ति योग के प्रचार में आया जिससे समाज में जागरुकता आयी है। इसी कारण हमने उनके आलोचकों पर हमने भी प्रहार किये।

            अनेक बार तो अपने परिचितों के साथ भी बहस की जो यह कहते थे कि यह केवल पैसा कमाने आये। एक परिचित ने बताया कि उसने मथुरा तथा वृंदावन में उनको पैदल दवायें बेचते हुंए उन्हें देखा है तो हमने उससे कहा कि ‘‘तो क्या हुआ इससे उसके महान कृतित्व को हल्का तो नहीं माना जा सकता।’

                पांच वर्ष पूर्व योग साधना का सही ज्ञान लेने के लिये हमने पतंजलि योग की किताब खरीदी। उसे पढ़ने पर यह ज्ञात हुआ कि वह बाहरी क्रियाओं से अधिक आंतरिक चिंत्तन पर अधिक आधारित है।  इसमें कोई संशय नहीं है कि उसमें आसन की क्रिया का अधिक विस्तार नहीं है पर शेष सभी अंगों का व्यापक वर्णन है। आज के सुविधाभोगी युग में आसन विषय का विस्तार व्यायाम की दृष्टि से किया गया है और बाह्य सक्रियता के कारण अनेक व्यायाम शिक्षक भी योग के ज्ञाता होने का दावा करते हैं। चलिये यह भी हम ठीक मान लेेते हैं।

                हैरानी होती है यह देखकर भगवान धन्वंतरि के जगह महर्षि पतंजलि का नाम चतुराई से आयुर्वेद की दवाओं में घसीटा जा रहा है।  अगर महर्षि पतंजलि के बताये योग पर चला जाये तो व्यक्ति को कभी बुखार तक नहीं आ सकता तब उनके नाम पर दवाई, बिस्कुट, सौंदर्य प्रसाधन और साबुन बेचा जाये तो एक योग साधक के नाम पर हमें हैरानी होती है।  अगर भगवान धन्वंतरि का नाम जोड़ा जाता तो चल जाता पर महर्षि पतंजलि का इस तरह सम्मान करना ऐसी व्यवसायिक चतुराई का साधन गया है जिसे देशभक्ति और स्वदेशी के नारे की आड़ में जनमानस की संवेदनओं का दोहन करने के लिये उपयोग किया जा रहा है।

                    महत्वपूर्ण बात यह कि कथित योग शिक्षकों ने आज उन भगवान धन्वंतरि का नाम भी नहीं लिया जिनके आयुर्वेद ने उन्हें धन का स्वामी बना दिया।  वह तो हर पल पतंजलि पतंजलि करते रहते हैं क्योंकि उनके लिये वही धन्वंतरि हो गये हैं। महर्षि पतंजलि के नाम पर पर धन मिले तो भगवान धन्वंतरि का वह लोग स्मरण क्यों करना चाहेंगे? वह आरोग्य के देवता हैं जिनकी धन की नहीं वरन् स्वास्थ्य की याचना की जाती है। अंत में हमने 19 वर्ष देश के गिरते स्वास्थ्य के मानक अत्यंत नीचे देखे थे और उन योग शिक्षक के प्रचार के बाद हमने सोचा कि उनमें सुधार होगा पर अब भी आंकड़े जस की तस है तब कहना पड़ता है कि बजाय उन्होंने स्वास्थ्य का स्तर ऊपर उठाने के उसका उपयोग अपने धन कमाने पर ही अधिक किया।

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