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पतंजलि के नाम से दवा बिके तो धन्वंतरि का नाम याद नहीं रहता-हिन्दी व्यंग्य


                                आज भगवान धन्वंतरि का प्रकट दिवस ही धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। धन्वंतरि के नाम का संक्षिप्तीकरण इस तरह किया गया है कि सारे अर्थ ही उलट गये हैं। भगवान धन्वंतरि को आरोग्य का देवता माना गया है जिसका सीधा संबंध आयुर्वेद से है। हमारे यहां अनेक ऋषि अपने कृतित्व से भगवत् प्रतिष्ठ हुए। अगर उनकी सूची बनायें तो बहुत लंबी हो जायेगी।  हमने देखा है कि अनेक आयुर्वेद औषधि की छाप पर भगवान धन्वंतरि की तस्वीर रहती है।  यह सहज स्वीकार्य है पर जब आजकल हम पंतजलि के नाम बिस्कुट, चाकलेट और सौदर्य प्रसाधन बिकते देखते हैं तो आश्चर्य होता है।  मजे की बात यह कि अनेक धर्म के ठेकेदार मौन होकर सब देख रहे हैं। आजकल स्वदेशी और देशभक्ति के नाम पर कोई भी ऐसा काम किया जाता है जिसे सामान्य जनमानस की संवदेनाओं से खेला जा सके।

                  एक योग शिक्षक अब महान पूंजीपतियों की श्रेणी में जा बैठे हैं।  समाज सुधार, स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग की प्रेरणा और समाज में सद्भावना का ठेका लेते हुए वह देश के प्रचार माध्यमों में विज्ञापन नायक भी बन गये हैं। जब वह योग का प्रचार करते हुए विरोधियों के निशाने पर थे अपने उनके समर्थन में हमने अनेक पाठ अंतर्जाल पर लिखे थे।  उन पाठों पर अनेक पाठकों ने हमारे से न वरन् असहमति जताई वरन् हमें उनका पेशवेर प्रचारक तक कह दिया था।  हमने 19 वर्ष पूर्व योग साधना प्रारंभ की थी तब उस योग शिक्षक का नाम तक कोई नहीं जानता था।  दस वर्ष पूर्व उनके प्रादुर्भाव प्रचार जगत में हुआ तो हमें प्रसन्नता हुई। हम सोचते थे चलो कोई तो ऐसा व्यक्ति योग के प्रचार में आया जिससे समाज में जागरुकता आयी है। इसी कारण हमने उनके आलोचकों पर हमने भी प्रहार किये।

            अनेक बार तो अपने परिचितों के साथ भी बहस की जो यह कहते थे कि यह केवल पैसा कमाने आये। एक परिचित ने बताया कि उसने मथुरा तथा वृंदावन में उनको पैदल दवायें बेचते हुंए उन्हें देखा है तो हमने उससे कहा कि ‘‘तो क्या हुआ इससे उसके महान कृतित्व को हल्का तो नहीं माना जा सकता।’

                पांच वर्ष पूर्व योग साधना का सही ज्ञान लेने के लिये हमने पतंजलि योग की किताब खरीदी। उसे पढ़ने पर यह ज्ञात हुआ कि वह बाहरी क्रियाओं से अधिक आंतरिक चिंत्तन पर अधिक आधारित है।  इसमें कोई संशय नहीं है कि उसमें आसन की क्रिया का अधिक विस्तार नहीं है पर शेष सभी अंगों का व्यापक वर्णन है। आज के सुविधाभोगी युग में आसन विषय का विस्तार व्यायाम की दृष्टि से किया गया है और बाह्य सक्रियता के कारण अनेक व्यायाम शिक्षक भी योग के ज्ञाता होने का दावा करते हैं। चलिये यह भी हम ठीक मान लेेते हैं।

                हैरानी होती है यह देखकर भगवान धन्वंतरि के जगह महर्षि पतंजलि का नाम चतुराई से आयुर्वेद की दवाओं में घसीटा जा रहा है।  अगर महर्षि पतंजलि के बताये योग पर चला जाये तो व्यक्ति को कभी बुखार तक नहीं आ सकता तब उनके नाम पर दवाई, बिस्कुट, सौंदर्य प्रसाधन और साबुन बेचा जाये तो एक योग साधक के नाम पर हमें हैरानी होती है।  अगर भगवान धन्वंतरि का नाम जोड़ा जाता तो चल जाता पर महर्षि पतंजलि का इस तरह सम्मान करना ऐसी व्यवसायिक चतुराई का साधन गया है जिसे देशभक्ति और स्वदेशी के नारे की आड़ में जनमानस की संवेदनओं का दोहन करने के लिये उपयोग किया जा रहा है।

                    महत्वपूर्ण बात यह कि कथित योग शिक्षकों ने आज उन भगवान धन्वंतरि का नाम भी नहीं लिया जिनके आयुर्वेद ने उन्हें धन का स्वामी बना दिया।  वह तो हर पल पतंजलि पतंजलि करते रहते हैं क्योंकि उनके लिये वही धन्वंतरि हो गये हैं। महर्षि पतंजलि के नाम पर पर धन मिले तो भगवान धन्वंतरि का वह लोग स्मरण क्यों करना चाहेंगे? वह आरोग्य के देवता हैं जिनकी धन की नहीं वरन् स्वास्थ्य की याचना की जाती है। अंत में हमने 19 वर्ष देश के गिरते स्वास्थ्य के मानक अत्यंत नीचे देखे थे और उन योग शिक्षक के प्रचार के बाद हमने सोचा कि उनमें सुधार होगा पर अब भी आंकड़े जस की तस है तब कहना पड़ता है कि बजाय उन्होंने स्वास्थ्य का स्तर ऊपर उठाने के उसका उपयोग अपने धन कमाने पर ही अधिक किया।

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अरविंद केजरीवाल पर चप्पल फैंकने से अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कमजोर नहीं होगा-हिन्दी लेख (arvind kejariwal par chappal fainkne se anna hazare ka bhrashtachar virodhi andolan kamjor nahin hoga-hindi lekh)


          भारत एक विशाल देश है और इसमें परिवर्तन एक दिन या वर्ष में नहीं आ सकता। ऐसे में परिवर्तन के दौर में तमाम संघर्ष होते हैं। एक बात दूसरी भी है कि संसार में आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक परिवर्तन प्रकृति का नियम है और भारतीय अध्यात्मिक ज्ञानी इस बात को जानते हैं कि यथास्थितियोंवादी अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं। ऐसे में परिवर्तन करने वाले तत्वों से उनका विरोध हिंसा की हद तक चल जाता है। भारत में समाजसेवी श्री अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने व्यापक रूप धारण कर लिया है ऐसे में जिन तत्वों के हित प्रभावित हैं वह प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष रूप से उनके विरोधी हैं। अन्ना के व्यक्तित्व में कोई छिद्र नहीं दिखता पर उनके अनेक सहयोगी पेशेवर रूप से समाज सेवा में लगे रहे हैं, इसलिये उनके आर्थिक और राजनीतिक रिश्ते विवादास्पद हैं। यही कारण है कि यथास्थितियों के लिये वह ऐसे आसन लक्ष्य हैं जिससे अन्ना साहब के आंदोलन को कमजोर कर भारतीय जनमानस में उसकी छवि को खराब किया जा सकता है।
          अन्ना के एक   सहयोगी अरविंद केजरीवाल की तरफ जूता फैंकने की घटना एक मामूली बात है पर उसका प्रचार इस बात को दर्शाता है कि कहीं न कहीं गड़बड़ है। वैसे देखा जाये तो अरविंद केजरीवाल ने कोई ऐसा बयान नहीं दिया है जिससे समग्र देश उत्तेजित हो। जिस तरह उनके एक सहयोगी ने कश्मीर में आत्मनिर्णय का समर्थन कर दिया था इस कारण कुछ युवकों ने उनके साथ मारपीट कर दी थी। उस सहयोगी और अरविंद केजरीवाल पर हमले में बस यही एक समानता है कि प्रचार माध्यमों को दोनों समाचारों पर बहस चलाकर अपने विज्ञापनों के लिये दर्शक जुटाने का अवसर मिल गया।
           यह तो पता नहीं कि अरविंद केजरीवाल पर हमला किसी बड़ी योजना का हिस्सा है या नहीं पर इतना तय है कि अन्ना के जिस सहयोगी पर पहले हमला हुआ था वह एक नियोजित हमला लग रहा था। स्थिति यह है कि लोग उस हमले को भूलकर अब जम्मू कश्मीर पर उनके बयान को लेकर नाराजगी जता रहे हैं। वैसे इस तरह के हमले एकदम बचकाने हैं क्योंकि इससे हमलावर तथा शिकार दोनों को समान प्रचार मिलता है-यह अलग बात है कि हमलावर खलनायक तो शिकार नायक हो जाता है।
          सच बात तो यह है कि हिंसा कभी परिणाममूलक नहीं होती। इतिहास इस बात का गवाह है। इसके बावजूद आज के लोकतांत्रिक समाज में कुछ लोग आत्मप्रचार के लिये हमले करते है तो कुछ लोग अपने ऊपर हुए ऐसे हमलों का आत्मप्रचार के लिये भी करते हैं। श्रीअरविंद केजरीवाल ने अभी तक ऐसा कोई बयान नहीं दिया है जिससे भारतीय जनमानस उद्वेलित हो। यह अलग बात है कि जिन व्यक्तियों या समूहों पर अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से प्रहार करते हैं वह उनसे रुष्ट हो जाता है। हालांकि ऐसे व्यक्ति या समूह प्रतिप्रचार के माध्यम से उनका सामना करने की क्षमता रखते हैं इसलिये उनको ऐसे किसी आक्रमण कराने की आवश्यकता नहीं है पर अगर कुछ सामान्य लोगों को आदत होती है कि वह ऐसी हरकतें कर प्रचार पाना चाहते हैं। जिसने अरविंद केजरीवाल पर जूता या चप्पल फैंकी वह अपने कृत्य के समर्थन में ऐसी कोई बात नहीं कह पाया जिससे लगे कि श्री केजरीवाल के किसी बयान या कृत्य से प्रेरित होकर उसने ऐसा किया। वह तो केवल यही कह रहा था कि केजरीवाल जनता को बरगला रहे हैं। कैसे, यह उसने नहीं बताया। दूसरे उसने आगे यह भी कहा कि वह तो उनकी इज्जत करता है। मतलब निहायत सिरफिरी बात कहकर उसने ऐसी किसी संभावना को समाप्त ही कर दिया कि उसे कोई समर्थन करने वाला मिल जाये। वैसे इस तरह की घटना कोई समर्थन नहीं करता पर जो लोग संवदेनशील विषयों को लेकर सक्रिय रहते हैं वह कभी ऐसी घटनओं को उचित ठहराते नजर आते हैं। इस प्रकरण में ऐसे किसी संभावना को हमलावर ने स्वतः ही समाप्त किया।
         कश्मीर पर विवादास्पद बयान देकर पहले मारपीट का शिकार हो चुके अपने सहयोगी का साथ अन्ना ने एक सीमा तक दिया था पर अरविंद केजरीवाल के साथ बड़ी मजबूती से खड़े नजर आये। अगर सीधी बात कहें तो इस चप्पल फैंकने की घटना ने अरविंद केजरीवाल का कद बड़ा दिया है। अब वह अन्ना की टीम में अन्ना के बाद दूसरे नंबर पर आ गये हैं। उनको तो अन्ना का सेनापति तक कहा जा रहा है। इसके विपरीत कश्मीर पर विवादास्पद बयान देने वाले सहयोगी को तो टीम से बाहर करने की बात तक कही जा रही है। जहां उनके साथ हुई मारपीट ने उनक ाकद गिराया वहीं अरविंद केजरीवाल की पर चप्पल फैंकने की घटना ने लोकप्रियता बढ़ाई। इसका सीधा मतलब यह है कि जनमानस का ख्याल रखकर अपने अभियान चलाने वाले लोगों को समर्थन मिलता है। हमारा मानना है कि अगर किसी मसले पर अन्ना साहब या उनकी टीम से असहमति हो तो उसका तर्क से सामना करना चाहिए। हालांकि इस तरह की घटनाओं को हम फिक्सिंग के तौर से भी देखते हैं पर इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि हमारी बात सौ फीसदी सही है। हम अभी तक अन्ना टीम के आंदोलन के सकारात्मक परिणामों का इंतजार कर रहे हैं। इसकी कोई जल्दी नहीं है पर इतना तय है कि अगर यह आंदोलन कोई परिणाम नहीं दे सका तो भारी निराशा की बात होगी।
              जिन लोगों ने यह हमले किये उनका क्या होगा, यह तो पता नहीं पर इतना तय है कि इनकी वजह से अन्ना हजारे के निवास वाले मंदिर के बाहर मेटर्ल डिटेक्टर  लगा दिये गये हैं उनकी तगड़ी सुरक्षा की जा रही है। तय बात है कि इस पर पैसा खर्च होगा इसका फायदा किसे होगा यह न हमें जानना है न कोई बताये। जब कहीं खतरे का प्रचार होता है तो सुरक्षा उपकरणों की मांग बढ़ती हैं। ऐसे मे लगता है कि सुरक्षा उपकरण बेचने वाले कहीं खतरे का प्रायोजन तो नहीं करते हैं? अन्ना हजारे जी का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जहां अनेक लोगों के लिये चिंता का विषय हो सकता है वहीं भारतीय जनमानस के लिये अभी जिज्ञासा का विषय है। सच बात तो यह है कि अंततः अन्ना की टीम प्रत्यक्ष रूप से राजनीति की तरफ आयेगी-यह बात हम दूसरी बार कह रहे हैं। यह पता नहीं कि पर्दे के पीछे कौन खेल रहा है, पर लगता है कि भारत में राजनीतिक परिदृश्य बदलने की कोई योजना चल रही है। जिस तरह देश में बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन चल रहे हैं उससे तो फिलहाल यही लगता है कि आगामी कुछ वर्षों में राजनीतिक परिदृश्य बदल सकता है। इन दोनों की लोकप्रियता इतनी है कि यह प्रत्यक्ष राजनीति में भाग लिये बिना उसे प्रभावित कर कर सकते हैं। ऐसे मे संभव है कि भविष्य में अपने अनुयायियों को प्रत्यक्ष राजनीति में उतार सकते हैं। भारतीय जनमानस उनका कितना साथ देगा यह बात अभी कहना मुश्किल है पर इतना तय है कि तब उनको वर्तमान राजनीतिक समूहों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में अनेक तरह के नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिलेंगे। कुछ प्रायोजित तो कुछ फिक्स भी होंगे। शायद इसलिये अन्ना हजारे ने अपने समर्थकों से कहा है कि जब समाज के लिये काम करते हैं तो अपमान झेलने के लिये भी तैयार रहना चाहिए। अन्ना हजारे के सबसे निकटतम होने के कारण शायद अरविंद केजरीवाल भी प्रकाशमान हो गये इसलिये उन पर चप्पल फैंकी गयी पर वह उनको फूल की तरह लगी। उन्होंने हमलावर को माफ कर यह साबित किया कि भविष्य में वह एक बड़े कदावर व्यक्ति बनने वाले हैं। हम जैसे आम लेखक और नागरिक तो अच्छी संभावनाओं के लिये उनकी तरफ दृष्टिपात करते ही है और शायद अब पूरा विश्व उनकी तरफ देखने लगेगा। साथ ही उनको यह भी देखना होगा कि उनको अभी लंबा रास्ता तय करना है और भारतीय जनमानस में अपनी छवि बनाये रखने के लिये उनको हमेशा ही इसी तरह आत्मनिंयत्रित रहना होगा।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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शोक, खुशी और नृत्य एक साथ-हिन्दी लेख (mourn, enjoyment and dance with all-hindi lekh)


         हिन्दी समाचार टीवी चैनलों का तो कहना ही क्या? क्रिकेट के भगवान का जन्म दिन, धार्मिक संत का परमधाम गमन दिवस और क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता के प्रचार को को बड़ी चालाकी से विज्ञापनों में एक साथ प्रसारित कर शोक, खुशी और नाच से संयोजित कार्यक्रम प्रसारित किए। क्रिकेट के भगवान को धार्मिक संत का महान शिष्य बता दिया जबकि अभी तक यह बात किसी को पता नहीं थी। दोनों एक साथ काम किये। संत को बड़ा बनाया तो खिलाड़ी को धार्मिक! सभी के हिन्दी समाचार टीवी चैनलों के कार्यक्रमों में गज़ब की एकरूपता है जिसे देखकर लगता नहीं कि उनके मालिक अलग अलग हैं। अगर मालिकों के नाम अलग अलग हों तो फिर लगता है कि उनका प्रायोजक कोई एक ही होना चाहिए जिसके अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष इशारों पर ही उनके कार्यक्रम चलते हैं। अगर किसी फिल्म अभिनेता, अभिनेत्री या क्रिकेट खिलाड़ी का जन्म दिन है तो एक ही समय पर उससे संबंधित कार्यक्रम सभी टीवी चैनलों पर एक साथ आता है। उससे दर्शक के विकल्प नहीं रहता। किसी बड़ी शख्सियत का वार्तालाप अगर एक पर सीधे प्रसारित होता है तो सभी पर वही दिखाई देता है।
         इस तरह की एकरूपता शक पैदा करती है कि कोई एक व्यक्ति या समूह अपने पैसे की दम पर टीवी चैनलों पर प्रभाव डाल रहा है। वरना यह संभव नहीं है। जिन लोगों को पत्रकारिता का अनुभव है वह जानते हैं कि सभी अखबारों में खबरें एक जैसी होती हैं पर उनके क्रम में एकरूपता नहंी होती। कई बार तो प्रमुख खबरों में ही अंतर हो जाता है। इसका कारण यह है कि हर अखबार के संपादक का अपना अपना नजरिया होता है और यह संभव नहीं है कि सभी का एक जैसा हो जाये।
         इन हिन्दी समाचार टीवी चैनलों की व्यवसायिक चालाकियों का भी एक ही तरीका है और संभव है कि एक दूसरे की नकल पर आधारित हो, पर जिस तरह देश के दर्शकों को नादान तथा चेतनाविहीन इन लोगों ने समझा है वह शक पैदा करता है कि ऐसा करने के लिये कोई उनको प्रेरित करता है। वैसे तारीफ करना चाहिए इन लोगों की व्यवसायिक चालाकी की पर मुश्किल यह है कि वह ऐसा कर यह संदेश देते हैं कि उनका अस्तित्व स्वतंत्र नहीं है और वह दृश्यव्य तथा अदृश्व्य धनदाताओं के आधीन ही वह कार्य करते हैं।
क्रिकेट खिलाड़ी का जन्म दिन पड़ा तो धार्मिक संत ने भी उसी दिन देह त्यागी। बताया गया कि क्रिकेट के भगवान उन धार्मिक संत के बहुत बड़े भक्त हैं। वह आज क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में अपना मैच नहीं खेलना चाहते। वह अपना जन्म दिन नहीं मना रहे। बताया तो यह गया कि क्रिकेट के भगवान ने अपने को कमरे में बंद कर लिया है। इस तरह क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का प्रचार हुआ। क्रिकेट खिलाड़ी के जन्म दिन पर कसीदे भी पढ़ते हुए बताया गया कि वह तो सत्य साई के भक्त हैं। क्रिकेट के भगवान के साईं शीर्षक के कार्यक्रम प्रसारित हुए। फिर यह बताना भी नहीं भूले कि उस क्रिकेट के भगवान को लोगों ने जन्मदिन की बधाई दी।
        पुट्टापर्थी के धार्मिक संत सत्य साईं बाबा के निधन पर उनके भक्त दुःखी हैं। उन्होंने अपने क्षेत्र मेें बहुत काम किया। इस पर विवाद नहीं है पर उनके निधन पर घड़ियाली आंसु बहाता हुऐ हिन्दी समाचार चैनल अन्य लोगों के लिये हास्य का भाव पैदा कर रहे हैं। सच कहें तो एक तरह से वह शोक मना रहे हैं जिसमें क्रिकेट खिलाड़ी का जन्म दिन भी शामिल कर लिया तो क्लब स्तरीय क्रिकेट भी शामिल होना ही था। सारी दुनियां जानती हैं कि प्रचार माध्यम किसी के मरने पर कितना दुःखी होते हैं। सत्य साईं के निधन पर दुःख व्यक्त करना यकीनन प्रचार प्रबंधकों की व्यवसायिक मज़बूरी है। उनकी संपत्ति चालीस हजार करोड़ की बताई गयी है जो कि मामूली नहीं है। यकीनन उनके संगठन की पकड़ कहीं न कहीं न वर्तमान बाज़ार पर रही होगी। इसलिये उनके भावी उत्तराधिकारियों  को प्रसन्न करने के लिये यह प्रसारण होते रहे। बाज़ार के सौदागरों ने स्पष्ट रूप से प्रचार प्रबंधकों को इशारा किया होगा कि यह सब होना है। अगर ऐसा नहीं होता तो शोक जैसा माहौल बना रहे इन समाचार चैनलों ने विज्ञापन कतई प्रसारित नहीं किये होते।
              अगर ऐसा नहीं भी हो रहा है तो यह मानना पड़ेगा कि हिन्दी टीवी चैनलों के संगठनों के पास समाचार, विश्लेषण तथा चर्चाओं के लिये विद्वान नहीं है इसलिये वह क्रिकेट, फिल्म और मनोरंजन चैनलों की कतरनों के सहारे चल रहे हैं। इनके मालिक कमा खूब रहे हैं पर अपने चैनल पर खर्च कतई नहंी कर रहे। भले ही देश में ढेर सारे समाचार चैनल हैं पर प्रतियोगिता इसलिये नहीं है क्योंकि उनको विज्ञापन मिलने ही है चाहे जैसे भी कार्यक्रम प्रसारित करें। उनको बड़ी कंपनियां कार्यक्रमों या अपने उत्पाद के प्रचार के लिये प्रचार माध्यमों को विज्ञापन नहीं देती बल्कि उनके दोष सार्वजनिक रूप से लोगों के सामने नहीं आयें इसलिये देती है। यही कारण है कि प्रयोक्ताओं की पसंद नापसंद की परवाह नहीं है और थोपने वाले समाचार और विश्लेषण प्रस्तुत किये जा रहे हैं। अर्थशास्त्र पढ़ने वाले जानते हैं कि भारत में धन की कमी नहीं पर फिर भी लोग गरीब हैं क्योंकि यहां प्रबंध कौशल का अभाव है। पहले यह सरकारी क्षेत्र के बारे में कहा जाता था पर निजी क्षेत्र भी उससे अलग नहीं दिखता यह सब प्रमाणित हो रहा है।

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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
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‘जीवन जीने की कला’ का मतलब है कि कभी विचलित न होना-हिन्दी लेख (meaning of art of living-hindi article


कथित रूप से जीने की कला सिखाने वाले एक संत के आश्रम पर गोली चलने की वारदात हुई है। टीवी चैनलों तथा समाचार पत्रों की जानकारी के अनुसार इस विषय पर आश्रम के अधिकारियों तथा जांच अधिकारियों के बीच मतभेद हैं। आश्रम के अधिकारी इसे इस तरह प्रचारित कर रहे हैं कि यह संत पर हमला है जबकि जांच अधिकारी कहते हैं कि संत को उस स्थान से निकले पांच मिनट पहले हुए थे और संत वहां से निकल गये थे। यह गोली सात सो फीट दूरी से चली थी। अब यह कहना कठिन है कि इस घटना की जांच में अन्य क्या नया आने वाला है।
संतों की महिमा एकदम निराली होती है और शायद यही कारण है कि भारतीय जनसमुदाय उनका पूजा करता है। भारतीय अध्यात्म ग्रंथों के प्रचार प्रसार तथा उनके ज्ञान को अक्षुण्ण बनाये रखने में अनेक संतों का योगदान है वरना श्रीमदभागवतगीता जैसा ग्रंथ आज भी प्रासंगिक नहीं बना रहता है।
मगर यह कलियुग है जिसके लिये कहा गया है कि ‘हंस चुनेगा दाना, कौआ मौती खायेगा’। यह स्थिति आज के संत समाज के अनेक सदस्यों में लागू होती है जो अल्पज्ञान तथा केवल भौतिक साधना की पूजा करते हुए भी समाज की प्रशंसा पाते हैं । कई तो ऐसे लोग हैं कि जिन्होंने पहनावा तो संतों का धारण कर लिया है पर उनका हृदय साहूकारों जैसा ही है। ज्ञान को रट लिया है पर उसको धारण अनेक संत नहीं कर पाये। हिन्दू समाज में संतों की उपस्थिति अब कोई मार्गदर्शक जैसी नहीं रही है। इसका एक कारण यह है कि सतों का व्यवसायिक तथा प्रबंध कौशल अब समाज के भक्ति भाव के आर्थिक् दोहन पर अधिक केंद्रित है जिसे आम जनता समझने लगी है। दूसरा यह कि अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से शिक्षित बुद्धिजीवी अब संतों की असलियत को उजागर करने में झिझकते नहीं। बुद्धिजीवियों की संत समाज के प्रतिकूल अभिव्यक्तियां आम आदमी में चर्चित होती है। एक बात यह भी है कि पहले समाज में सारा बौद्धिक काम संतों और महात्माओं के भरोसे था जबकि अब आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर यह काम ऐसे बुद्धिजीवी करने लगे हैं जो धार्मिक चोगा नहीं पहनते।
ऐसे अनेक बौद्धिक रूप से क्षमतावान लोग हैं जो भारतीय अध्यात्म के प्रति रुझान रखते हैं पर संतों जैसा पहनावा धारण नहीं करते। इनमें जो अध्यात्मिक ज्ञान के जानकार हैं वह तो इन कथित व्यवसायिक संतों को पूज्यनीय का दर्जा देने का ही विरोध करते हैं।
वैसे संत का आशय क्या है यह किसी के समझ में नहीं आया पर हम परंपरागत रूप से देखें तो संत केवल वही हैं जो निष्काम भाव से भक्ति में करते हैं और उसका प्रभाव इतना बढ़ जाता है कि अन्य सामान्य लोग उसने ज्ञान लेने उनके पास आते हैं। पहले ऐसे संत सामान्य कुटियाओं मे रहते थे-रहते तो आज भी कुटियाओं में कहते हैं यह अलग बात है कि वह संगममरमर की बनी होती हैं और उनके वातानुकूलित यंत्र लगे रहते हैं और नाम भी कुटिया या आश्रम रखा जाता है। सीधी बात कहें कि संत अब साहूकार, राजा तथा शिक्षक की संयुक्त भूमिका में आ गये हैं। नहीं रहे तो संत, क्योंकि जिस त्याग और तपस्या की अपेक्षा संतों से की जाती है वह अनेक में दिखाई नहीं देते। यही कारण है कि समाज में उनके प्रति सद्भावना अब वैसी नहीं रही जैसे पहले थी। ऐसे में आश्रम के व्यवसाय तथा व्यवस्था में अप्रिय प्रसंग संघर्ष का कारण बनते हैं पर उनको समूचे धर्म पर हमला कहना अनुचित है।
उपरोक्त आक्रमण को लेकर जिस तरह टीवी चैनलों ने भुनाने का प्रयास किया उसे बचा जाना चाहिए। भारतीय धर्म एक गोली से नष्ट नहीं होने वाला और न ही किसी एक आश्रम में गोली चलने से उसके आदर्श विचलित होने वाले हैं।
बात संतों की महिमा की है तो यकीनन कुछ संत वाकई संत भी हो सकते हैं चाहे भले ही उनके आश्रम आधुनिक साजसज्जा से सुसज्तित हों। इनमें एक योगाचार्य हैं जो योगसाधना का पर्याय बन गये हैं। यकीनन यह उनका व्यवसाय है पर फिर भी उनको संत कहने में कोई हर्ज नहीं। मुश्किल यह है कि यह संत हर धार्मिक विवाद पर बोलने लगते हैं और व्यवसायिक प्रचार माध्यम उनके बयानों को प्रकाशित करने के लिये आतुर रहते हैं। चूंकि यह हमला एक आश्रम था इसलिये उनसे भी बयान लिया गया। .32 पिस्तौल से निकली एक गोली को लेकर धर्म पर संकट दिखाने वाले टीवी चैनलों पर जब वह इस घटना पर बोल रहे थे तब लग रहा था कि यह भोले भाले संत किस चक्कर में पड़े गये। कुछ और भी संत बोल रहे थे तब लग रहा था कि कथित जीने की कला सिखाने वाले संत को यह लोग व्यर्थ ही प्रचार दे रहे हैं। जीवन जीने की कला सिखाने वाले कथित संत की लोकप्रियता से कहीं अधिक योगाचार्य की है और लोग उनकी बातों पर अभी भी यकीन करते हैं। कुछ अन्य संत कभी जिस तरह इस घटना को लेकर धर्म को लेकर चिंतित हैं उससे तो लगता है कि उनमें ज्ञान का अभाव है।
जहां तक जीवन जीने की कला का सवाल है तो पतंजलि योग दर्शन तथा श्रीमदभागवतगीता का संदेश इतना स्वर्णिम हैं कि वह कभी पुरातन नहीं पड़ता। इनके रचयिता अब रायल्टी लेने की लिये इस धरती पर मौजूद नहीं है इसलिये उसमें से अनेक बातें चुराकर लोग संत बन रहे हैं। वह स्वयं जीवन जीने की कला सीख लें जिसमें आदमी बिना ठगी किये परिश्रम के साथ दूसरों का निष्प्रयोजन भला करता है, तो यही बहुत है। जो संत अभी इस विषय पर बोल रहे हैं उनको पता होना चाहिए कि अभी तो जांच चल रही है। जांच अधिकारियों पर संदेह करना ठीक नहीं है। जीवन जीने की कला शीर्षक में आकर्षण बहुत है पर उसके बहुत व्यापक अर्थ हैं जिसमें अनावश्यक रूप से बात को बढ़ा कर प्रस्तुत न करना और जरा जरा सी बात पर विचलित न होना भी शामिल है। 
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संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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सामूहिक ठगी का मतलब-व्यंग्य चिंत्तन (samuhik thagi ka matlab-vyangya lekh)


एक के बाद एक सामूहिक ठगी की तीन वारदातें टीवी चैनलों और समाचार पत्रों की सुर्खियां बन गयी हैं। आप यह कहेंगे कि ठगी की हजारों वारदातें इस देश में ं होती हैं इसमें खास क्या है? याद रखिये यह सामूहिक ठगी की वारदातें हैं और कोई एक व्यक्ति को ठग कर भागने का मामला नहीं है। उन ठगों की आम ठग से तुलना करना उनका अपमान करना है। आम ठग अपनी ठगी के लिये बहुत बुद्धिमानी के साथ दूसरे के पास पहुंचकर ठगी करता है जबकि इन ठगों ने केवल दूसरों की मजबूरियों का फायदा उठाने के इरादे से विज्ञापन का जाल बिछाया बल्कि बाकायदा अपना एजेंट नियुक्त किये। शिकार खुद वह खुद उनके जाल में आया और वह भी उनके वातानुकूलित दफ्तरों में अपने पांव या वाहन पर चलकर।
यह एकल ठगी का मामला नहीं है। हर विषय पर अपना बौद्धिक ज्ञान बघारने वाले बुद्धिमान लोगों के लिये इसमें कुछ नहीं है जिस पर हायतौबा कर अपनी चर्चाओं को रंगीन बना सकें। इनमें समाजों का आपस द्वंद्व नहीं है बल्कि समाजों की छत्र छाया तले रहने वाले परिवारों और व्यक्तियों के अंतद्वंद्वों का वह दुष्परिणाम है जो कभी भी बुद्धिमान लोगों की दृष्टि के केंद्र बिंदु में नहीं आते। जो बुद्धिमान लोग इस पर ध्यान भी दे रहे हैं तो उनका ध्यान केवल घटना के कानूनी और व्यक्तिगत पक्ष पर केंद्रित है। आप सवाल पूछेंगे कि आखिर इसमें ऐसा क्या है जो कोई नहीं देख रहा?

जो लोग ठगे गये हैं वह केवल यही कह रहे हैं कि उन्होंने अपने पैसे अपनी बच्चियों की शादी के लिये रखे थे। यह सोचकर कि पैसा दुगुना या तिगुना हो जायेगा तो वह उनकी शादी अच्छी तरह कर सकेंगे। समाज पर चलती तमाम बहसों में दहेज प्रथा की चर्चा होती है पर उसकी वजह से समाज किस तरह टूट रहे हैं इस पर कोई दृष्टि नहीं डालता। पूरा भारतीय समाज अब अपना ध्यान केवल धनर्जान पर केंद्रित कर रहा है और अध्यात्मिक ज्ञान या सत्संग उसके लिये वैसे ही जैसे मनोरंजन प्राप्त करना। पैसा दूना या चैगुना होना चाहिए। किसलिये चाहिये? बेटे की उच्च शिक्षा और बेटी की अच्छी शादी करने के लिये। सारा समाज इसी पर केंद्रित हो गया है। आखिर आदमी ऐसा क्यों चाहता है? केवल इसलिये कि समाज में वह सीना तानकर वह सके कि उसने अपने सांसरिक कर्तव्यों को पूरा कर लिया और वह एक जिम्मेदारी आदमी है।
कुछ लोगों के बच्चे संस्कार, भाग्य, परिश्रम या किसी दूसरे की सहायता उच्च स्थान पर पहुंच जाते हैं तो उनके विवाह कार्यक्रम भी बहुत आकर्षक ढंग से संपन्न होते हैं जो किसी भी भारतीय नर नारी का बरसों से संजोया एक सपना होता है’-इसी सपने को पूरा करने के लिये वह जिंदगी गुजारते हैं।
जिनके बच्चे शैक्षिक और बौद्धिक क्षमता की दृष्टि से औसत स्तर के हैं उनके लिये यह समस्या गंभीर हो जाती है कि वह किस तरह उनके लिये भविष्य बनायें ताकि वह स्वयं को समाज में एक ‘जिम्मेदार व्यक्ति’ साबित कर सकें। इसके लिये चाहिए धन। आम मध्यम वर्गीय परिवार के लिये यह एक बहुत बड़ी समस्या है। अगर हम उसके जीवन का आर्थिक चक्र देखें तो वह हमेशा ही बाजार के दामों में पिछड़ता है। जब प्लाट की कीमत डेढ़ सौ रुपया फुट थी तब वह पचास खर्च कर सकता था। जब वह डेढ़ सौ खर्च करने लायक हुआ तो प्लाट की कीमत तीन सौ रुपया प्रति फुट हो गयी। जब वह तीन सौ रुपये लायक हुआ तो वह पांच सौ रुपया हो गयी। जब वह पांच सौ रुपया लायक हुआ तो पता लगा कि डेढ़ हजार रुपये प्रतिफुट हो गयी।
इस चक्र में पिछड़ता आम मध्यम और निम्न वर्ग दोगुना और चैगुना धन की लालच में भटक ही जाता है। आज के आधुनिक ठग ऐसे तो हैं नहीं कि बाजार या घर में मिलते हों जो उन पर विश्वास न किया जाये। उनके तो बकायदा वातानुकूलित दफ्तर हैं। उनके ऐजेंट हैं। एकाध बार वह धन दोगुना भी कर देते हैं ताकि लोगों का विश्वास बना रहे। ऐसे में उनका शिकार बने लोग दो तरफ से संकट बुलाते हैं। पहला तो उनकी पूरी पूंजी चली जाती है दूसरा परिवार के सभी सदस्यों का मनोबल गिर जाता है जिससे संकट अधिक बढ़ता है। बहरहाल नारी स्वातंत्र्य समर्थकों के लिये इस घटना में भले ही अधिक कुछ नहीं है पर जो लोग वाकई छोटे शहरों में बैठकर समाज को पास से देखते हैं उन्हें इन घटनाओं के समाज पर दूरगामी परिणाम दिखाई देते हैं जो अंततः नारियों को सर्वाधिक कष्ट में डालते हैं।

कन्या भ्रुण की हत्या रोकने के लिये कितने समय से प्रयास चल रहा है पर समाज विशेषज्ञ लगातार बता रहे हैं कि यह दौर अभी बंद नहीं हुआ। हालांकि अनेक लोग उन माताओं की ममता को भी दोष देते हैं जो कन्या भ्रुण हत्या के लिये तैयार हो जाती हैं पर कोई इसको नहीं मानते। शायद वह मातायें यह अनुभव करती हैं कि अगर वह लड़की पैदा हो गयी तो उसके प्रति ममता जाग्रत हो जायेगी फिर पता नहीं उसके जन्म के बाद उसके विवाह तक का दायित्व उसका पति और वह स्वयं निभा पायेंगी कि नहीं। इसमें हम समाज का दोष नहीं देखते। इतने सारे सामाजिक आंदोलन होते हैं पर बुद्धिजीवी इस दहेज प्रथा को रोकने और शादी को सादगी से करने का कोई आंदोलन नहीं चला सके। उल्टे शादी समारोहों के आकर्षण को अपनी रचनाओं में प्रकाशित करते हैं।
समस्या केवल ठगी के शिकार लोगों की नहीं है बल्कि इन ठगों की भी है। इन ठगों के अनुसार उन्होंने अपना पैसा शेयर बाजार और सट्टे में-पक्का तो पता नहीं है पर जरूर सट्टा क्रिकेट से जुड़ा हो सकता है क्योंकि आजकल के आधुनिक लोग उसी पर ही दांव खेलते हैं-लगाया होगा। अधिकतर टीवी चैनलों और अखबारों में सट्टे से बर्बाद होने वाले लोगों की खबरें आती है पर उसका स्त्रोत छिपाया जाता है ताकि लोग कहीं उसे शक से न देखने लगें। वैसे हमने यह देखा है कि सट्टा खेलने वाले-खिलाने वाले नहीं- ठगने में उस्ताद होते हैं। सच तो यह है कि वह दया के पात्र ही हैं क्योंकि वह मनुष्य होते हुए भी कीड़े मकौड़े जैसे जीवन गुजारते हैं। वह तो बस पैसा देखते हैं। किसी से लूटकर या ठगकर अपने पास रखें तो भी उन पर क्रोध करें मगर वह तो उनको कोई अन्य व्यक्ति ठगकर ले जाता है। ऐसे लोग गैरों को क्या अपनों को ही नहीं छोड़ते। बाकी की तो छोड़िये अपनी बीवी को बख्श दें तो भी उसे थोड़ा बुद्धिमान ठग मानकर उस पर क्रोध किया जा सकता है।

कई तो ऐसे सट्टा लगाने वाले हैं जो लाखों की बात करते हैं पर जेब में कौड़ी नहीं होती। अगर आ जाये तो पहुंच जाते हैं दांव लगाने।
मुख्य बात यही है कि क्रिकेट के सट्टे का समाज पर बहुत विपरीत प्रभाव है पर कितने बुद्धिमान इसे देख पा रहे हैं? इससे देश की अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव भले ही नहीं पड़ता हो पर इतने व्यक्तियों और परिवारों ने तबाही को गले लगाया है कि उनकी अनदेखी करना अपने आप में मूर्खता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ठगी की इन घटनाओं के कानूनी पक्ष के अलावा कुछ ऐसे भी विषय हैं जो समाज पर बुरा प्रभाव डाल रहे हैं पर कितने बुद्धिजीवी इस पर लिख या सोच पाते हैं इस आलेख को पढ़ने वाले इस पर दृष्टिपात अवश्य करें। हालांकि यह भी बुरा होगा क्योंकि तब उनको जो इस देश मेें बौद्धिक खोखलापन दिखाई देगा वह भी कम डरावना नहीं होगा। यह बौद्धिक खोखलापन ठग के साथ उनके शिकार पर ही बल्कि इन घटनाओं पर विचार करने वालों में साफ दिखाई देगा।
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