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पश्चिमी देश आतंकवाद से लड़ने के इच्छुक नहीं


                                   पेरिस पर हमले के बाद पूरे विश्व में उथलपुथल मची है। उस पर कहने से पूर्व हम भारतीय योग सिद्धांत की बात करें। यह सच है कि क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। हम अगर किसी वस्तु, विषय या व्यक्ति से अनुकूल प्रतिक्रिया चाहें तो अपनी किया उसके अनुरूप करनी होगी।  दूसरा कर्म और फल के सिद्धांत को भी ध्यान रखना होगा। यूरोप तथा अमेरिका हथियारों के उत्पादक तथा निर्यातक देश हैं।  पेरिस पर निरंतर हो रहे हमलों को हम धर्म तथा लोकतंत्र के सीमित दृष्टिकोण से उठकर व्यापक चिंत्तन के दायरें में आयें तो पता चलेगा हर व्यापारी अपनी वस्तु का प्रचार करते हुए उसके प्रयोग का भी प्रचार करता है। इसलिये संभव है कि पहले अपराधियों को ऐसे हथियार देकर उनके हमलों से प्रचारित अपने हथियारों के  बेचने का बाज़ार बनाते हों।

                                   हम एशियाई देशों की सेनाओं तथा पुलिस विभागों की स्थिति में नज़र डालें तो उनसे पहले नये हथियार अपराधियों के पास आये।  उससे प्रभावित होकर संबंधित देशों ने उत्पादक देशों से हथियार खरीदे। एक-47 बंदूक इसका प्रमाण है।  एशियाई देशों ने खरीदी पर बाद में पता चला कि उसका नया रूप पहले ही अपराधियों के पास आ गया है।  अमेरिका व यूरोप हथियार निजी क्षेत्र के माध्यम से हथियार बेचते हैं जिन्हें क्रेता के प्रमाणीकरण की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे में संदेह होता है कि हथियारों के मध्यस्थ कहीं आतंकवादियों को प्रचार नायक तो नहीं बनाते? अमेरिका ने सीरिया सरकार के विद्रोहियों की सहायता के लिये हथियार हवाई जहाज से नीचे गिराये थे-जिनके संबंध आतंकी संगठनों से प्रत्यक्ष दिख रहे थे।  अमेरिका मध्यपूर्व में अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये जिन संगठनों को अपना मित्र समझता है उन्हें शेष विश्व आतंकी कहता है। इस तरह विश्व के राज्यप्रबंधकों तथा आतंकवादियों के बीच एक ऐसा रिश्ता है जिसकी व्याख्या करने बैठें तो एक ग्रंथ लिखना पड़ेगा।

                                   मध्यपूर्व में जबरदस्त अस्थिरता फैली है और हमारा अनुमान है कि उसका प्रकोप काम होने की बजाय बढ़ते रहने वाला ही है। आतंकवादी जिन देशों को ललकार रहे हैं वह सभी कहीं न कहीं हथियार के कारखानों की कमाई से अपनी संपन्नता बढ़ाने  वाले रहे हैं।  अब उनके सामने स्वयं के बने हथियार दुश्मन की तरह सामने आने वाले हैं।  मध्यपूर्व से लाखों शरणार्थी इन देशों में गये हैं जिनके साथ आतंकवादी भी हैं।  पेरिस में हुए हमलों से यह जाहिर हो गया है कि इन संपन्न देशों का राज्यप्रबंध के अभेद होने का भ्रम समाप्त हो गया है। जिस तरह इन देशों के राजकीय प्रबंधकों की प्रतिक्रियायें सामने आयी हैं उससे तो नहीं लगता कि वह जल्दी आतंकवादी पर विजय प्राप्त करेंगे।  वैसे जिन लोगों ने पचास वर्षों से लगतार समाचार देखे और पढ़े हों उन्हें पता है कि कोई राजनीतिक, धार्मिक या वैचारिक संघर्ष प्रारंभ होता है तो वह अगले दस वर्ष तक चलता है।  जब थमता भी तो उसके कारण प्राकृतिक होते हैं-राजकीय प्रबंधक बयानबाजी तक ही सीमित रहती है।

                                   अब योग और भारत की बात करें।  कुछ लोगों को चिंता है कि भारत में भी मध्यपूर्व के आतंकवादी संगठन आ सकते हैं। हमारे पास खुफिया संगठन नहीं है पर योगदृष्टि से हमें यह आशंका नहीं लगती।  एक बात तो यह कि भारत ने कोई हथियार योग नहीं किया-उसने बंदूकें तोप या टैंक नहीं बेचे जो उनका मुंह हमारी तरफ होगा।  इसलिये जिन्होंने युद्ध योग किया है उन्हें प्रतियुद्ध भी झेलना ही होगा। अगर इन देशों को प्रतियुद्ध से बचना है तो युद्ध योग से बचते हुए हथियार के कारखाने बंद करने होंगे। जिसकी संभावना नहीं दिखती। उल्टे जिस तरह यह देश मध्यपूर्व देशों में अधिक हमले कर रहे हैं उससे शरणार्थी संकट बढ़ेगा और आतंकी इन्हीं देशों में जायेंगे।  आखिरी सलाह भारतीय प्रचार माध्यमों को भी है कि वह मध्यपूर्व के आतंकी संगठनों का नाम अधिक न लें कहीं ऐसा न हो कि पाकिस्तान कहीं उसके नाम से आतंकी भेजने लगे।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior

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विश्वहिन्दीसम्मेलन और हिन्दी दिवस पर नया पाठ


               भोपाल में 22वां विश्व हिन्दी सम्मेलन हो रहा है।  पूर्व में हुए 21 सम्मेलनों का हिन्दी में क्या प्रभाव हुआ पता नहीं पर इतना तय है कि भारतीय जनमानस की यह अध्यात्मिक भाषा है।  इसलिये उसे रिझाये रखने के लिये बाज़ार ने भाषा को जिंदा रखा है।  इस तरह के सम्मेलन चंद ऐसे विद्वानों का संगम बन कर रह जाते हैं जो  भारतीय जनमानस को यह समझाने के लिये एकत्रित होते हैं कि वह उनके अपने हैं भले ही अंग्रेजी में लिखते हैं।  दूसरी बात यह कि इसमें कागज पर छपी किताबों के प्रति परंपरागत झुकाव रखने वाले पेशेवर हिन्दी विद्वान यह बताने इन सम्मेलनों में आते हैं कि उनके लेखन की वजह से भाषा जिंदा है। पिछले दस वर्ष से अंतर्जाल पर हिन्दी लेखन हो रहा है पर उसके नुमाइंदों को इस सम्मेलन में न बुलाने से यही साबित हो गया है कि इसके लेखक अप्रतिष्ठत यह लघु स्तर के हैं। विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर ट्विटर लिखे जिनकी सामग्री यहां प्रस्तुत है।

               अंतर्जालीय लेखकों की उपस्थिति और उनके लेखन की चर्चा न दिखना रूढ़ता का प्रतीक लगता है। हिन्दी का भविष्य अब अंतर्जाल पर टिका है और वहां के लेखकों की अनुपस्थिति के बिना विश्व हिन्दी सम्मेलन महत्वहीन लगता है। अब स्वप्रायोजित किताबों से नहीं वरन् अंतर्जाल पर लिखने वाले लेखक ही हिन्दी के सारथी हो सकते हैं। अंतर्जालीय लेखकों के प्रति विश्व हिन्दी सम्मेलन में दिखाया गया परायेपन का भाव उसी के लक्ष्य में बाधक होगा। विश्व हिन्दी सम्मेलन में इस पर विचार होना चाहिये कि जनमानस में अंतर्जाल पर मातृभाषा में स्वयं लिखने की प्रेरणा लाने का विषय हो। स्वप्रायोजित किताबों की बजाय अंतर्जाल पर अपने परिश्रम वह निष्काम भाव से सक्रिय लेखक विश्वहिन्दी सम्मेलने में होते तो मजा आता।

                                   भारतीय भाषायें सांसरिक विषयों के विदुषकों से नहीं वरन् अध्यात्मिक ज्ञान के प्रचारकों की शक्ति से अंतर्जाल पर बढ़ेगी यह बात विश्वहिन्दीसम्मेलन में कहना चाहिये। विश्वहिन्दीसम्मेलन में पाठकों में रचनाओं से अध्यात्मिक ज्ञान संदेश मिलने की अपेक्षा पर विचार होना चाहिये।

हिन्दी ब्लॉगर बिन विश्व हिन्दी सम्मेलन लगे सून।

कहें दीपकबापू जैसे सूर्य के ताप बिन माह जून।।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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नये निर्माण से ही इतिहास भूलना संभव-हिन्दी लेख


                                  हमारा मानना है कि इतिहास को केवल कागज या लकड़े के पट्टे पर नहीं दर्ज होता। उसे भुलाना है तो जनमानस मे नयी स्वर्णिम छवि भी आना चाहिये। यह छवि वही लेाग बना सकते हैं जो सामान्यजनों के लिये हितकारक काम करते हुए उसकी रक्षा भी कर सकते हैं।

‎                                   औरंगजेबमार्ग का नाम बदलकर ‪‎अब्दुलकलाममार्ग किया गया है। उम्मीद है ‪इतिहास अब भविष्य में विकास मार्ग पर ले जायेगा। हमने देखा है कि इस तरह अनेक बाज़ारों, मार्गों, इमारतों तथा उद्यानों के नाम बदल गये। क्षणिक रूप से भावनात्मक शांति देने वाले ऐसे प्रयास जनमानस में अधिक दिन तक याद नहीं रखे जाते। अनेक जगह तो लोग उसे बरसों तक पुराने नाम याद रखते हैं।  अनेक जगह तो नये नामों की वजह उस स्थान को  ढूंढने वाले लोगों को  परेशानी होती है।

                                   मुख्य बात यह है कि जब तक जनमानस में इतिहास की जो  अविस्मरणीय छवियां है उसे मिटाना सहज तभी हो सकता है जब उसका वर्तमान काल सुखद और भविष्य आशामय हो।  हमें अब यह विचार भी करना चाहिये कि क्या वाकई हमारे देश के सामान्यजन यह अनुभव करते हैं कि उनके सामने ऐसी छवियां हैं जिनके दर्शन से वह भावविभोर हो उठते हों। अगर इसका जवाब हां है तो यह मान लेना चाहिये इतिहास मिट गया और नहीं तो सारे प्रयास व्यर्थ हो गये, यह समझना चाहिये।  देश में जिस तरह एक बार फिरा निराशा, आशंका, और तनाव का वातावरण बन रहा है वह चिंताजनक है।  पुराने लोग आज भी अंग्रेजों को याद करते हैं इसका मतलब यह है कि वह नये व्यवस्था से प्रसन्न नहीं है। ऐसे में इस तरह के प्रयासों पर अनेक असंतुष्ट सवाल भी कर रहे हैं जिसका साहस उनमें व्यवस्था के प्रति निराशापूर्ण वातावरण से पैदा होता है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

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पाकिस्तान से #सिंधप्रांत प्रथक कराने का प्रयास हों-#हिन्दीलेख


                              गुरदासपुर में हमले से भारत में भारी नाराजगी का वातावरण है अनेक सामरिक विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान का सिंध प्रांत ऐसा है जहां अगर सही रणनीति अपनायी जाये तो भारत उस पर नियंत्रण कर सकता है। पाकिस्तान के सिंधी भाषी मूलतः वहां के पंजाबी भाषियों से सांस्कृतिक दृष्टि से एकरूप हैं पर दोनों के बीच भारी वैमनस्य है। इसका कारण यह है कि पंजाब चूंकि हिमालय के निकट इसलिये वहां से नदियां बहकर सिंध जाती हैं।  पंजाब में उनके जल का इतना दोहन हो जाता है कि सिंध पहंुचते पहुंचते उनमें जल कम रह जाता है। दूसरी बात यह कि प्रभावशाली पंजाबियों ने पाकिस्तान तो ले लिया पर लाहौर से अधिक कराची में भारत से गये उर्दू भाषियों को बसाकर वहां सिंधियों के लिये एक नया विरोधी समुदाय स्थापित किया।  इतना ही नहीं भारत से गये जितने भी अपराधी हैं वह सब कराची में जाकर रहते हैं। कभी लाहौर या मुल्तान में उनका निवास नहीं सुना जाता।

                              आज भी प्रभावशाली पंजाबी समुदाय सिंध, ब्लूचिस्तान और सीमा प्रांत को अपने अनुचर की तरह मानता है।  हम कहते हैं जरूर है कि भारत में कोई स्वयं को पहले भारतीय नहीं मानता पर सच यह है कि भारत शब्द इतना प्राचीन है कि जनमानस में इस कदर बसा है कि उसे स्वयं को भारतीय कहने की आवश्यकता नहीं है। पाकिस्तान की स्थिति अलग हैं।  वहां के जनमानस में भारत शब्द से घृणा भरी गयी है। समस्या यह है कि पाकिस्तान के प्रति वहां कोई वफादार बन नहीं सकता।  ऐसे में पाकिस्तान मानसिक रूप से भी एक विघटित राष्ट्र है।

                              हमारे भारत के रणनीतिकारों को चाहिये कि वह सिंध में पाकिस्तान के विरुद्ध चल रहे आंदोलनों को जीवंत करें। वहां जियो सिंध आंदोलन चलता रहा है जिसके शीर्ष नेता हमेशा भारत की तरफ सहायता के लिये ताकते रहे हैं।  अगर सिंध पाकिस्तान के लिये समस्या बना तो वह आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से लड़खड़ा जायेगा।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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#दर्द के #व्यापारी-#हिन्दीकवितायें


अनजान में भटके

राही को सही रास्ता

सुझा सकते हैं।

जानकर चले तबाही के रास्ते

उसे समझाते हुए अपनी अक्ल के

चिराग बुझा सकते हैं।

कहें दीपक बापू शहर बड़े हैं

हादसों के डर से सहम जाते

एक वहम से बचते

दूसरा साथ लाते

अंग्रेजी में भटके इस तरह

उनको खुश करने के लिये

हिन्दी के चिराग

चाहे जब बुझा सकते हैं।

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दर्द के व्यापारी

कभी अपने चेहरे पर भी

जख्म कर लेते हैं।

खाली बैठे होते

तब भरे बाज़ार रक्त

बहाने की रस्म भी कर लेते हैं।

कहें दीपक बापू खुशी से

जीना नहीं सीखा ज़माना

मस्ती के लिये

झगड़े का ढूंढता बहाना

जज़्बात सजाये बैठे दुकान पर

बेचने के लिये

वह अमन के घर भी

भस्म कर देते हैं।

…………

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

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writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

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माया की शिक्षा देने वाले सहजता से मिल जाते हैं-गुरु पूर्णिमा पर नया हिन्दी पाठ


                    जिस तरह गुरुओं की पूजा हो रही है उससे तो लगता है कि हमारे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार अध्यात्मिक ज्ञान देने वाले को ही गुरु मानने के सिद्धांत की मजाक बन रहा है।  यहां तो सांसरिक विषयों में शक्कर का स्वाद दिलाने वाले गुड़ ही पुज रहे हैं।

          हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार गोविंद यानि परमात्मा और गुरु दो प्रथक विषय है पर सांईबाबा के भक्तों का भय भ्रम पैदा करता है। जब गोविंद का दिन हो तो भी उनके दरबार में समागम करते हैं और गुरु का दिन हो तो भी वही करते हैं।  चमत्कारों के लिये प्रसिद्ध सांईबाबा की भक्ति केवल भौतिक लाभ की चाहत पूरी करने के लिये होती है जो अंततः अध्यात्मिक ज्ञान के धारण करने की बात तो दूर उसे सुनने से भी रोक देती है।

                    फिल्मी कलाकार, क्रिकेट खिलाड़ी तथा लोकप्रिय विषयों से जुड़े लोग जो शीर्ष पर पहंुंच गये हैं अपने शिक्षकों के गुरु होने का बखान इस तरह कर रहे हैं जैसे कि उन्हें कोई अध्यात्मिक रूप से कोई बड़ी सफलता मिली हो।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन संदेशों का अर्थ समझे तो उसके  अनुसार सांसरिक विषयों में हर किसी को भाग्य और परिश्रम के अनुसार सफलता मिलती है पर इसमें सहायक लोग अध्यात्मिक गुरुओं जैसे पूज्यनीय नहीं हो सकते। बहरहाल गुरु पूणिर्मा पर इस तरह के दृश्य गंभीर अध्यात्मिक भाव की बजाय सांसरिक विषयों के प्रति हास्य रस का आनंद दिलाते हैं। हमारे अनुसार सांसरिक विषयों के शिक्षकों की जरूरत तो एक नहीं तो दूसरा पूरा कर देता है पर अध्यात्मिक गुरु बड़ी कठिनाई से ही मिलते है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

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आशा और आशंका में अंतर तो होना चाहिये-हिन्दी संपादकीय


    ‘आज दिल्ली में बादल छाये रहने की आशंका है’-यह वाक्य  एक हिन्दी समाचार टीवी चैनल पर उद्घोषक है। जिन लोगों ने अपनी शिक्षा हिन्दी माध्यम से प्राप्त की है उनके लिये अक्सर इन समाचार टीवी चैनलों पर  आशा, आशंका और संभावना जैसे शब्द दर्शक की गंभीर बुद्धि में चल रही गेयता के दौर में अवरोध पैदा करते हैं।

   इस समय दिल्ली में गर्मी पड़ रही है। अगर बादल छायेंगे तो तापमान कम होगा-यानि वहां के नागरिकों के लिये यह खबर इस आशा के कारण उत्साहवर्द्धक हो सकती है कि वह अपने दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये बाहर निकल सकतेे हैं। यहां हिन्दी भाषा का शब्द ‘संभावना’ का उपयोग देश में रहने वाले अन्य क्षेत्र के लोगों के लिये निरपेक्ष भाव प्रदर्शन में हो सकता है।  गर्मी में बादलों का छाना की आशंका नहीं हो सकती। हां, अगर सर्दी हो तो यह आशंका बन जाती है पर तब भी संभावना शब्द ही उपयोग किया जाना चाहिये।

     हिन्दी की यह खूबी है कि वह जैसी लिखी जाती है वैसी बोली जाती है। हिन्दी पाठकों और दर्शकों में भी एक खूबी होती है कि वह बोलचाल में भले ही वह दूसरी भाषाओं के शब्द स्वीकार करते हैं पर जहां वह पठन पाठन, श्रवण अथवा अध्ययन के लिये तत्पर होते हैं तब शुद्ध हिन्दी उनके लिये अधिक गेय होती है। इस बात को हिन्दी के व्यवसायिक प्रकाशन नहीं जानते यही कारण है कि आज भी अंग्रेजी के संस्थानों से स्तरहीन माने जाते हैं। ऐसा लगता है कि हिन्दी समाचार चैनल वाले अपने यहां नियुक्त कर्मचारियों की भाषाई योग्यता से अधिक किन्ही अन्य योग्यताओं पर दृष्टिपात करते हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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खानपान के विषय में गंभीरता से विचार करें-हिन्दी चिंत्तन लेख


                              हमारे देश में लोग भोजन की बात तो करते हैं पर उसे ग्रहण करने का तरीके और पचाने की शक्ति पर कभी विचार नहीं करते। हम भोजन में कब, क्या और कितना खायें-यह सवाल अनेक लोगों को परेशान करता है। अनेक लोग तो अपने से सवाल पूछकर ही स्वयं से ही कन्नी काट जाते हैं।  हमारा मानना है कि पेट में ऐसे ही भरें जैसे स्कूटर या गाड़ी में उतना ही ईंधन भरवाते हैं जितना टंकी में आता है। अंतर इतना है कि अगर उनकी टंकी में ज्यादा पेट्रोल भरा जाये तो वह बाहर फैल जाता है और उसे कपड़े से साफ किया जा सकता है पर अगर पेट में भरा ईंधन फैला तो वह शरीर में ही इधर उधर फैलता है जिसे साफ करना कठिन है। कालांतर में यही अति भोजन बीमारियों का कारण बनता है।

                              आजकल स्थिति यह हो गयी है कि लोग भोजन के बारे में कम अपने लिये धन संपदा अर्जन पर अधिक मानसिक ऊर्जा नष्ट करते हैं।  परंपरागत घरेलू रोटी सब्जी की जगह बाज़ार में चटकदार मसाले का खाना चाहते हैं। उससे भी ज्यादा मैदे के बने पिज्जा तथा अन्य सामग्री सामान्य लोगों के लिये प्रिय भोजन बनता जा रहा है। परिणाम हम देख ही रहे हैं कि आजकल अस्पताल पांच सितारानुमा बन गये हैं।  उनके बाहर की नामपट्टिका भी संस्कृत के मधुर शब्दों-आस्था, संस्कार, संजीवनी आदि-से सजी हुई हैं।  अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति से किसी  बीमारी का इलाज नहीं होता पर इसके सहारे रहने वाले चिकित्सक भारी पैसा कमा रहे हैं।

                              हर व्यक्ति दावा करता है कि वह स्वयं परिवार तथा रोटी के लिये कमा रहा है पर उसी के प्रति वह गंभीर नहीं दिखता। लोग खाने का बाहरी आकर्षण और स्वाद देखते हैं यह जानना ही नहीं चाहते  कि उनके हाथ से उदरस्थ सामग्री सुपाच्य है कि नहीं।  खासतौर से शादी आदि समारोह  में लोगों की यह दिलचस्पी ही खत्म हो गयी है कि वह जो खा रहे हैं कि उससे उसे वह पचा पायेंगे कि नहीं। कई घंटे पहले रखा सलाद खा लेते हैं जिसके खराब होने की पूरी आशंका रहती है।

                              सबसे बड़ी बात यह है कि खाने के बाद आदमी में जो संतोष का भाव होना चाहिये उसकी अनुभूति करना ही भुला दिया गया है।  कहा जाता है कि भोजन प्रसाद की ग्रहण करना चाहिये। यह भी कहा जाता है कि प्रसाद भोजन की तरह नहीं लेना चाहिये। लोगों खाने पीने में किसी नियम का पालन नहीं कर रहे।  हमारा मानना है कि भोजन शांत भाव से ग्रहण करते हुए सर्वशक्तिमान का इस बात के लिये मन ही मन धन्यवाद देना चाहिये कि उसने हमें न केवल वह दिया वरन् हमें पचाने की शक्ति भी दी।

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अल्पआयु में मृतकों की बढ़ती संख्या चिंताजनक-हिन्दी चिंत्तन लेख


                      आमतौर से बड़ी आयु में मौत होना ही स्वाभाविक माना जाता है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह और अन्य राजरोगों से एक सामान्य मनुष्य एक आयु तक स्वयं ही लड़ लेता है पर बड़ी उम्र होने पर वह हथियार डाल देता है। अब छोटी आयु में मौतें भी अधिक होने लगी हैं जिस पर शायद ही कोई अधिक चिंतित होता हो।  सड़क हादसों में अनेक युवा काल कवलित होते देखे गये हैं।  अगर बड़ी आयु के लोग अपनी स्मरण शक्ति पर बोझ डालें तो उन्हें लगेगा कि अपनी युवा अवस्था से अधिक उम्र के इस पड़ाव अनेक  गोदें सूनी होते देख रहे हैं।   बहरहाल तीस से चालीस के बीच अगर सड़क हादसे की बजाय बीमारी से किसी की मौत हो तो अब भी स्वाभाविक मानना कठिन लगता है पर जिस तरह तंबाकू के पाउचों का प्रचलन हुआ है उस पर अनेक स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंतित हैं। अनेक लोग तो इन पाउचों को धीमे विष जैसा मानते हैं। ऐसे में जागरुक लोगों को इस पर ध्यान देना चाहिये।

                              इस लेखक ने एक चिकित्सक मित्र को एक अस्वस्थ युवक के पिता से यह कहते सुना था कि‘अगर तुम्हारा लड़का इस पाउच का सेवन बंद नहीं करता तो समझ लेना कि वह तुम्हें दुनियां का सबसे बड़ा दर्द देने वाला है।’ अतः यह जरूरी है कि इस विषय पर गंभीरता से अनुसंधान कर लोगों को जानकारी दी जाये।

                              शायद दस वर्ष पूर्व की बात होगी। इस लेखक के एक मित्र न मात्र 42 वर्ष की उम्र में हृदयाघात से दम तोड़ा होगा।  वह ऐसे पाउचों का सेवन करता था।  उससे एक दो वर्ष पूर्व एक लड़के ने इन पाउचों के सेवन का दुष्परिणाम बताया था। उसने पाउच की पूरी सामग्री एक ग्लास में भरते हुए पानी के साथ ही चार आल्पिनें उसमें डाल दीं। सुबह वह चारों आल्पिने गुम थीं।  मित्र की  मौत के बाद इस लेखन ने कम उम्र में हृदयाघात से मरने वालों की जानकारी लेना प्रारंभ किया।  दस में से सात इसके सेवन में लिप्त पाये गये। पिछले बीस पच्चीस वर्ष से यह पाउच प्रचलन में आया है इसलिये अनेक बड़ी आयु के भी इसका शिकार होते हैं तो बड़ी बात नहीं पर चूंकि उनकी मौत स्वाभाविक मानी जाती है इसलिये कोई चर्चा नहीं करतां।

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अभी तक देशी सर्वर स्थापित होना चाहिए था-डिजिटल इंडिया सप्ताह पर चिंत्तन लेख


      हमारे देश में सरकार ने डिजिटल इंडिया सप्ताह का प्रारंभ किया है। डिजिटल इंडिया की सफलता के लिये बहुत सारा पैसा खर्च करने की बात चल रही है। अपना स्वदेशी अंतर्जालीय मस्तक यानि सर्वर बनाया जाना चाहिये। इतनी सारी टेलीफोन कंपनियां हैं पर आज तक एक भी स्वदेशी सर्वर नहीं बन पाया-इस पर अनेक विशेषज्ञों को हैरानी है।

     इतने उद्योगपति भारत में हैं। साफ्टवेयर में भारतीय इंजीनियर दुनियां में झंडा फहरा रहे हैं। फिर भी भारत में एक भी स्वदेशी सर्वर नहीं बन सका जो केवल अपने ही देश का अंतर्जालीय बोझ उठा सके और हम कह सकें कि यह है हमारा भारतीय अंतर्जालीय मस्तक। हैरानी की बात यह है कि यह अभी भी एक सपना लगता है

                              व्यापार सभी करते हैं पर प्रबंध कौशल किसी किसी में ही होता है।  हमारे देश में आबादी सदैव अधिक रही है। प्रकृत्ति की कृपा भी अन्य देशों की अपेक्षा यहां अधिक है।  मानव श्रम और उपभोक्ता  अधिक होने से यहां वणिकों के लिये सदैव एक बाज़ार रहा है पर उन्हें दैनिक उपभोग क्रय विक्रय करने में हमेशा सुविधा उठाने की योग्यता ही रखते हैं।  इसलिये उन्हें प्रबंध कौशल की आवश्यकता नहीं रहती। व्यापार में प्रबंध कौशल का पता सामने उपस्थित वस्तु के विक्रय से नहीं वरन् विक्रय योग्य नयी वस्तु के निर्माण तथा उसके लिये बाज़ार बनाने से ही पता लगता  है। इस मामले में पश्चिमी जगत अपने हमसे आगे है। विदेशी सर्वरों के चलते भारतीय संचार व्यवसायियों ने देश के उपभोक्ताओं का जमकर दोहन किया। वह भी तब जब भारतीय संचार निगम का प्रदर्शन गिराता गया। अपना पैसा देश में रखा या बाहर ले गये यह तो पता नहीं पर उन्होंने यहां संचार के क्षेत्र में किसी नये निर्माण को प्रोत्साहित नहीं किया। स्वदेशी अंतर्जाल मस्तक यानि सर्वर का न होने भारत के कथित पूंजीपतियों के प्रबंध कौशल तथा देश से प्रतिबद्धता रखने के अभाव को पूरे विश्व में दर्शाता है।

      बताया तो यहां तक जाता है कि अमेरिका अंतर्जालीय उपलब्धियों में हमसे आगे है पर ईरान और चीन भी कम नहीं है। एक बात हम यहां स्पष्ट कर दें कि हमारी दृष्टि से भारतीय साफ्टवेयर इंजीनियरों की वैश्विक योग्यता को देखते  उनकी यह अग्रता हो ही नहीं सकती।  चीन तो यह बात स्पष्ट रूप से मान ही चुका है कि भारत की बौद्धिक क्षमता उससे आगे हैं।  ऐसे में यह सवाल उठता ही है कि आखिर हमारे देश के कथित सेठ क्यों नहीं ऐसा कर पाये? क्या यह उनकी इस मानसिकता का प्रमाण नहीं है कि वह अपने समाज या देश के किसी व्यक्ति को  इतना प्रसिद्ध या सफल होते नहीं देखना चाहते जो उनकी सामने खड़े होकर आंखें मिला सके? एक स्वदेश अंतर्जालीय मस्तक या सर्वर का न होना तो यही दर्शाता है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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