परीक्षा परिणाम-हास्य व्यंग्य कविता


उतरा मूंह लेकर फंदेबाज
घर आया और बोला-
‘दीपक बापू,
बड़ा बुरा दिन आया
हाईस्कूल के इम्तहान में
मोहल्ले के बच्चों ने डुबाया नाम
होकर बुरी तरह फेल
आदर्श मोहल्ला बनाने का हमारा इरादा था
पर बिगड़ गया सारा खेल।‘
उसकी बात सुनकर
आंखों और नाक पर लटके चश्में के बीच से
झांकते हुए बोले दीपक बापू
‘’तुम कभी अच्छी खबर भी कहां लाते हो
दर्द उभार कर कविता लिखवाते हो
मगर खैरियत है तुम यहां आये
इम्तहान के परिणाम से दुःखी मोहल्ले वालों ने
नहीं की होगी पाश्च् समीक्षा
इसलिये ही यहाँ पहुंच पाये
वरना तुम भी क्या कम हो
मोहल्ले का पीछा नहीं छोड़ते
हमारी नज़र में तुम वह गम हो
बीस ओवरीय प्रतियोगिता में
देश क्या जीता
बाजार के साथ तुम्हारे हाथ लग गया
जैसे जनता को बहलाने वाला एक पपीता
बच्चों को क्रिकेटर बनने का सपने दिखाने लगे
स्कूल में पढ़ते क्या बच्चे
उनके नाम क्रिकेट कोच के पास लिखाने लगे
एक दिन की बात होती तो समझ में आती
डूबते क्रिकेट में एक छोटे कप की जीत से
फट गयी पूरे देश की छाती
किकेट मैच होता था कभी सर्दियों में
अब तो होने लगा गर्मियों में
कुछ बच्चे खेलते हैं
तो कुछ अपने पैसे का दांव भी पेलते हैं
फिर भारतीय आदर्श प्रतियोगता का
प्रचार माध्यमों में प्रचार
इधर रीयल्टी शो की भरमार
लाफ्टर शो में बेकार की मजाक
समझ कोई नहीं रहा पर सब रहें हैं ताक
तुम भी तो अपने बच्चों को
आदर्श मोहल्ला बनाने के नाम पर
क्रिकेट, संगीत, और नृत्य सीखने के लिये
संदेश दिया करते थे
कहीं जाकर इनाम जीतें
इसलिये रोज उनका प्रगति प्रतिवेदन लिया करते थे
जब बच्चों के पढ़ने की उम्र है
तब उन पर टिका रहे हो
उनके माता पिता और पड़ौसी होने के प्रचार का
कभी पूरा न हो सकने वाला खेल
बिचारे, कैसे न होते फेल।
गनीमत है जिन छोटे शहरों को
अभी बेकार के खेलों की हवा नहीं लगी है
वहीं शिक्षा की उम्मीद बची है
वहीं परिणामों का प्रतिशत अच्छा रहा है
क्योंकि वहां के बच्चों ने आधुनिकता से
परे रहने की कमी को सहा है
पास होकर निकल पड़े तो
ऐसे खेल और खिलाड़ी उनके पीछे आयेंगे
समय के साथ वह भी मजे उठायेंगे
हमारा संदेश तो यही है कि
हर काम और कामयाबी का अपना समय होता है
जिंदगी में बिना सोचे समझे
चल पड़ने से आती है हाथ नाकामी
सेवा करते हुए ही बनता कोई स्वामी
समय से पहले मजे उठाने के लिये
जो खेलते हैं खेल
वही होते हैं हर इम्तहान में फेल।’’

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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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टिप्पणियाँ

  • deepak  On 19/05/2009 at 2:34 पूर्वाह्न

    very good

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