विश्व में आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणाली ब्रिटेन की देन है। भारत ने राजनीतिक रूप से जरूर ब्रिटेेन से स्वतंत्रतता पायी पर मानसिक रूप से कभी यहां राजकीय कर्म में प्रबंध कौशल या व्यवसायिक कला का दर्शन नहीं हुआ। एक बात याद रखने की है कि वर्तमान चुनाव प्रणाली अंग्रेजों के समय में ही विकसित हो गयी थी। यही प्रणाली भारत मे आजादी के बाद भी चली। कहने को हमारे पास अपना संविधान है पर विशेषज्ञ यह बताना नहीं भूलते कि आज भी कानूनों का अधिकतर हिस्सा अंग्रेजों का ही बना हुआ है। कहने का अभिप्राय यह है कि हम आज भी वैचारिक रूप से औपनिवेश राज्य के स्वामी हैं।
हम यहां चुनाव प्रणाली के बारे में विचार नहीं कर रहे बल्कि हम उस जनतंत्र के स्वरूप का आंकलन कर रहे हैं जिसे अंग्रेजों ने बनाया है। जब तक प्रचार माध्यम विकसित नहीं थे हम अमेरिका और ब्रिटेन की जनतांत्रिक व्यवस्था पर मंत्रमुग्ध थे पर अब यह लगने लगा कि यह सब भ्रम था। ब्रिटेन के बारे मेें कहा जाता है कि वहां के लोग अपनी पुरानी परंपराओं के पोषक हैं। इसके दो प्रमाण हैं एक तो यह कि उन्होंने जनतंत्र का अपनाया पर राजतंत्र को छोड़ा नहीं। दूसरा यह कि अपने क्रिकेट खेल को आज भी वह प्राकृतिक पिच पर ही खेलते हैं वहां उन्होंने कृत्रिम घास या टर्फ को कभी स्वीकार नहीं किया। इतना ही लंबे समय तक तो वह दिन में ही क्रिकेट खेल जारी रखा पर रात्रिकालीन दूधिया रौशनी का चमकने नहीं दिया। इधर हम हैं कि अपनी सारी पंरपराओं को दकियानूसी मानकर छोड़ते जा रहे हैं।
बात अगर ब्रिटेन के जनतंत्र की है तो हमें लगता है कि राजतंत्र को उन्होंने भले ही नाममात्र का रहने दिया पर धनतंत्र को राज्य कर्म से ऐसा जोड़ दिया कि किसी को आभास तक नहीं होता कि वहां का जनतंत्र वास्तव में एक ऐसी प्रणाली है जिसमें धनपतियों को राजा जैसा सम्मान मिलता है। उन्होंने भी अपने यहां सर नाम की एक उपाधि चला रखी है जिसे कुछ पूंजीपति प्राप्त कर चुके हैं। इनमें एक भारतीय भी शामिल है। ब्रिटेन तथा अमेरिका के साथ भारत के लोकतंत्र में बस एक ही अंतर है कि वहां धनपति प्रत्यक्ष रूप से राजनेताओं को प्रायोजित करते हैं। अभी अमेरिका के राष्ट्रपति ने चंदा मांगने के लिये गाना भी गाया था। भारत में यह कार्य अप्रत्यक्ष रूप से होता दिखता है।
मूल रूप से ब्रिटेन को पूंजीवादी देश माना जाता है। इसके बावजूद वहां श्रमिक क्षेत्रों से अंसतोष की घटनायें सामने आती हैं। अमेरिका तथा ब्रिटेन में लंबे समय तक वामपंथ का भूत दिखाकर वहां की जनता को डराया गया पर इसके बावजूद वहां वामपंथी विचाराधारा के पोषक तत्व पैदा हुए हैं। यहां तक कि मजदूरों का मसीहा कार्ल मार्क्स तो ब्रिटेन में रहा था। आधुनिक विश्व में ब्रिटेन ने राजतंत्र के साथ धनतंत्र को इस तरह जोड़ा कि वह जनतंत्र हो गया है। पुराने समय धनपति भले ही धन खूब कमाते थे पर उनकी प्रतिष्ठा कभी राजा जैसी नहीं हो पाती थी। ऐसा लगता है कि ब्रिटेन के पूंजीपतियों ने राजतंत्र को कमजोर कर अपने धनतंत्र की आड़ में जनतंत्र के सहारे राज्य पर अपनी पकड़ बनायी। चुनाव चाहे जहां भी हों पैसे के बिना नहीं जीते जा सकते। यह पैसा अंततः धनपतियों के पास से ही आना है। चुनाव लड़ने वालों को धनपति अपने धन से राजा बनाते हैं जो अंततः उनके मातहत होते हैं। इस तरह ब्रिटेन में जनतंत्र प्रणाली के माध्यम से धनतंत्र ने राजतंत्र में अपना हिस्सा प्राप्त किया। जिस वैश्विक आर्थिक उदारीकरण की बात हम करते हैं वह इसी धनतंत्र की देन है। हम हम कहते हैं कि आर्थिक ताकत के कारण भारत की कोई देश उपेक्षा नहीं कर सकता तो इसका कारण यह है कि विश्व अर्थव्यवस्था में कहीं न कहीं भारतीय धनपतियों का प्रभाव इस तरह है कि उसे ब्रिटेन या अमेरिका के राजस पुरुष अनदेखा कर नहीं चल सकते। यह अलग बात है कि हमारे देश के बुद्धिमान लोग इस पर देश का सम्मान बढ़ता बताकर उछलकूदते हैं पर हम जैसे आम लेखक जानते हैं कि यह सब एक छलावा है।
प्रगतिशील तथा जनवादी लेखक अमेरिका और ब्रिटेन का विरोध इस आधार पर करते हैं कि वह पूंजीवादी और साम्राज्यवादी हैं पर वर्तमान समय में जिस तरह धनतंत्र काम कर रहा है उसे वह नहीं समझ पाते। हम तो यह कहते हैं कि अमेरिका और ब्रिटेन भी अब एक स्वतंत्र राजकीय व्यवस्था में नहीं चल रहे बल्कि वह धनतंत्र का उपनिवेश भर रह गये हैं। न हमारे पास आंकड़े हैं न हम वहां कभी गये हैं। समाचार पत्र और टीवी चैनलों पर समाचारों को देखकर उनकी कड़ियां जोड़कर विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि अनेक शक्तिशाली देशों के राजस पुरुष कहीं न कहीं धनपतियों के मुखौटे भर हैं। वह बोलते हैं तो किसी का लिखा लगता है। वह जब चलते हैं तो लगता है कि निर्देशक ने बताया है। उनकी दिनचर्यायें ही अभिनय का हिस्सा लगती हैं। कई शक्तिशाली देशों के शासनाध्यक्ष तो ऐसी हरकतें करते हैं कि कामेडी के महानायक भी शरमा जायें।
भारत में चुनाव सुधारों की मांग उठने लगी हैं। इसका मतलब यह है कि कुछ लोग इस जनतंत्र में छिद्र देख रहे हैं। यह जनतंत्र ब्रिटेन से ही लिया गया है। छिद्र तो वहां भी होंगे। हमें यहां बैठकर नहीं दिखता। जो वहां देखते हैं उनको विश्लेषण नहीं करना आता। हमारी बात से अनेक लोग असहमत हो सकते हैं क्योंकि हमने कभी विदेशी दौरा नहीं किया मगर देश में घूमते घूमते यह अनुभव किया है कि जब यहां की व्यवस्था वहां के सिद्धांतों पर आधारित है तो वह उन समस्याओं से कैसे बच सकते हैं जिनसे हम दो चार होते हैं। राजतंत्र और धनतंत्र के मिले रूप का नाम जनतंत्र है और एक आदमी के रूप में हमें यह अनुभव होता है कि यही हमारी नियति है कि राज्य हमारा आसरा है हम उसका सहारा हों या न हों। जिनको राजतंत्र का सहारा है वह शक्तिशाली लोग राजस बोध के साथ व्यवहार करेंगे। हमें तो अध्यात्मिक रूप से ज्ञान प्राप्त कर सात्विक रहने का प्रयास करना चाहिए। लोकतंत्र में लोकप्रियता का नकदीकरण करने के लिये तमाम तरह के प्रपंच किये जाते हैं और जिनको नकदीकरण नहीं करना वह जनमानस में अपनी उछलकूद नहीं दिखाते। जो कर रहे हैं उनको इसका अधिकार भी है।
गणतंत्र एक शब्द है जिसका आशय लिया जाये तो मनुष्यों के एक ऐसे समूह का दृश्य सामने आता है जो उनको नियमबद्ध होकर चलने के लिये प्रेरित करता है। न चलने पर वह उनको दंड देने का अधिकार भी वही रखता है। इसी गणतंत्र को लोकतंत्र भी कहा जाता है। आधुनिक लोकतंत्र में लोगों पर शासन उनके चुने हुए प्रतिनिधि ही करते हैं। पहले राजशाही प्रचलन में थी। उस समय राजा के व्यक्तिगत रूप से बेहतर होने या न होने का परिणाम और दुष्परिणाम जनता को भोगना पड़ता था। विश्व इतिहास में ऐसे अनेक राजा महाराज हुए जिन्होंने बेहतर होने की वजह से देवत्व का दर्जा पाया तो अनेक ऐसे भी हुए जिनकी तुलना राक्षसों से की जाती है। कुछ सामान्य राजा भी हुए। आधुनिक लोकतंत्र का जनक ब्रिटेन माना जाता है यह अलग बात है कि वहां प्रतीक रूप से राजशाही आज भी बरकरार है।
मूल बात यह है कि हम गणतंत्र में मनुष्य समुदाय पर एक नियमबद्ध संस्था शासन के रूप में रखते हैं। विश्व के जीवों में एक मनुष्य ही ऐसा है जिसे राज्य व्यवस्था की आवश्यकता है। इसकी वजह साफ है कि सबसे अधिक बुद्धिमान होने के कारण उसके ही अनियंत्रित होने की संभावना भी अधिक रहती है। माना जाता है कि राज्य ही मनुष्य का नियंता है जिसके बिना वह पशु की तरह व्यवहार कर सकता है। राज्य करना मनुष्य की प्रवृत्ति भी है। उसमें अहंकार का भाव विद्यमान रहता है। सभी मनुष्य एक दूसरे से श्रेष्ठ दिखना चाहते हैं और राज्य व्यवस्था के प्रमुख होने पर उनको यह सुखद अनुभूति स्वतः प्राप्त होती है। जिन लोगों को प्रमुख पद नहीं मिलता वह छोटे पद पर बैठकर बाकी छोटे लोगों को अपने दंड से शासित करते है। इस तरह यह क्रम नीचे तक चला आता है। वहां तक जहां से आम इंसान की पंक्ति प्रारंभ होती है। इस पंक्ति के ऊपर बैठा हर शख्स अपने श्रेष्ठ होने की अनुभूति से प्रसन्न है पर साथ ही अपने से ऊपर बैठे आदमी की श्रेष्ठता पाने का सपना भी उसमें रहता है। इस तरह यह चक्र चलता है। जो राज्य व्यवस्था से नहीं जुड़े वह भी कहीं न कहीं अपनी श्रेष्ठता दिखाने के व्यसन में लिप्त हैं।
राज्य कर्म अंततः राजस भाव की उपज है। उसमें सात्विकता बस इतनी ही हो सकती है जितना आटे में नमक! इससे अधिक की अपेक्षा अज्ञान का प्रमाण है। राज्य कर्म में ईमानदारी एक शर्त है पर उसे न मानना भी एक कूटनीति है। प्रजा हित आवश्यक है पर अपनी सत्ता बने रहने की शर्त उसमें जोड़ना आवश्यक है। अकुशल राज्य प्रबंधकों के के लिये ईमानदारी और प्रजा हित अंततः गौण हो जाते हैं। राज्य कर्म में एक सीमा तक ही सत्य भाषण, धर्म के प्रति निष्ठा और दयाभाव दिखाया जा सकता है। छल, कपट, प्रपंच तथा क्रूर प्रदर्शन राज्य कर्म करने वालों की शक्ति का प्रमाण बनता है। वह ऐसा न करें तो उनको सम्मान नहीं मिल सकता। न्याय के सिद्धांत सुविधानुसार चाहे जब बदले जा सकते हैं।
सभी राजस कर्म करने वाले असात्विक हैं यह मानना ठीक नहीं है पर इतना तय है कि उनमें एक बहुत वर्ग ऐसे लोगों का रहता है जो अपने लाभ के लिये इसमें लिप्त होते हैं जिसे राजस भाव माना जाता है। आज के समय में तो राजनीति एक व्यवसाय बन गया है। यह अलग बात है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परे बुद्धिमान लोग उसमें सत्य, अहिंसा तथा दया के भाव ढूंढना चाहते है।
विश्व में अधिकतर लोग चाहते हैं कि उन्हें राजसुख न मिल पाये तो उनकी संतान को प्राप्त हो। राजसुख क्या है? यह सभी जानते हैं। दूसरे पर हमारा नियम चले पर हम पर कोई नियम बंधन न हो! लोग हमारी माने पर हम किसी की न सुने। किसी में हमारी आलोचना की हिम्मत न हो। बस हमारी पूजा भगवान की तरह हो। इसी भाव ने राज्य व्यवस्था को महत्वपूर्ण बना दिया है।
राज्य संकट पड़ने पर प्रजा की मदद करता है। गणतंत्र का मूल सिद्धांत है पर यह एक तरह का भ्रम भी है। प्रजा कोई इकाई नहीं बल्कि कई मनुष्य इकाईयेां का समूह है। मनुष्य अपने कर्म के अनुसार फल भोगता है। वह इंद्रियों से जैसे दृश्य चक्षुओं से, सुर कर्णों से, भोजन मुख से तथा सुगंध नासिका से ग्रहण करने के साथ ही अपने हाथ से जिन वस्तुओं का स्पर्श करता है वैसी ही अभिव्यक्ति उसकी इन्हीं इद्रियों से प्रकट होती है। विषैले विषयों से संपर्क करने वालों से अमृतमय व्यवहार की अपेक्षा केवल अपने दिल को दिलासा देने के लिये ही है। मनुष्य को अपना जीवन संघर्ष अकेले ही करना है। ऐसे में वह अपने साथ गणसमूह और उसके तंत्र के साथ होने का भ्रम पाल सकता है पर वास्तव में ऐसा होता नहीं है।
उससे बड़ा भ्रम तो यह है कि गणतंत्र हम चला रहे हैं। धन, पद और अर्थ के शिखर पुरुषों का समूह गणतंत्र को अपने अनुसार प्रभावितकरते हैं जबकि आम इंसान केवल शासित है। वह इस गणतंत्र का प्रयोक्ता है न कि स्वामी। स्वामित्व का भ्रम है जिसमें जिंदा रहना भी आवश्यक है। अगर आदमी को अकेले होने के सत्य का अहसास हो तो वह कभी इस भ्रामक गणतंत्र की संगत न करे। जिनको पता है वह सात्विक भाव से रहते हैं क्योंकि जानते हैं कि सहनशीलता, सरलता और कर्तव्यनिष्ठ से ही वह अपना जीवन संवार सकते हैं। जिनको नहीं है वह आक्रामक ढंग से अभिव्यक्त होते है। वह अनावश्यक रूप से बहसें करते है। वाद विवाद करते हैं। निरर्थक संवादों से गणतंत्र को स्वयं से संचालित होने का यह भ्रम हम अनेक लोगों में देख सकते है।
लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior
writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior
26/01/2012 – 5:43 अपराह्न
Categories: हिंदी
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हैरानी है यह देखकर
कुछ लोगों को
कभी हादसे तो
कभी हमले भी फिक्स क्यूँ लगते हैं।
कहें दीपक बापू
जो जूता मारे और जो खाये
दोनों ही टीवी पर प्रचार पाते,
विज्ञापनों के बीच उनके नाम भी छाते,
सनसनी, हास्य और चिंतन से भरे
सभी समाचार मिक्स दिखते हैं,
गोया पर्दे के पीछे लेखक पहले पटकथा लिखते हैं,
अपनी अपनी पसंद है
लोग देखने के लिए रात भर जगते हैं।
14/01/2012 – 9:30 अपराह्न
Categories: हिंदी
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पोते ने दादा से कहा
‘‘कक्षा की हिन्दी शिक्षिका ने
सभी विद्यार्थियों घर से
भ्रष्टाचार पर निबंध लिखने को कहा है,
आप जरा मदद करो
कुछ जोरदार तर्क भरो
ताकि मेरी श्रेणी सुधर जाये
वरना मैंने फिसड्डी होने का दर्द बहुत सहा है,
पहले तो मेरे यही समझ में नहीं आता कि
भ्रष्टाचार होता किस तरह है,
सभी चेहरे ईमानदार दिखते
फिर बेईमानी होने की क्या वजह है,
आप तो अनेक बार आंदोलन कर चुके हैं,
कई बार अनशन तो हड़ताल कर
इतिहास में अपना नाम भर चुके हैं,
इसलिये भ्रष्टाचार पर निबंध जोरदार लिखायें,
पहले मुझे बाद में समाज के मार्ग दिखायें।’’
सुनकर बोले दादाजी
‘‘बेटा,
कल चलना मेरे साथ स्कूल,
तुम्हारी शिक्षिका को समझाऊंगा
भ्रष्टाचार पर निबंध लिखवाने की बात जायेगी भूल,
तुम चाहे तो अब भी अनशन करा लो,
नौकरी अब करता नहीं
इसलिये सुबह दूध सब्जी लाने के काम से
चाहे हड़ताल धरा लो,
मगर यह भंष्टाचार पर निबंध लिखने में
मदद की बात सोचना भी नहीं,
इस पर पूरा पुराण लिखना पड़ेगा
अपने सिर के बाल नौचना न पड़ें कहीं,
वैसे तुम्हारी शिक्षिका को समझाऊंगा
इस बालपन में भला
हमारे बच्चों को भ्रष्टाचार के विषय से
अवगत क्यों करा रही हो,
सीख जायेंगे सब कुछ
जब बड़े ओहदे पर पहुंच जायेंगे,
नहीं पहुंचे तो भी
इसके परिणाम जरूर समझ पायेंगे,
बड़े बड़े लोग माथापच्ची कर भी
भ्रष्टाचार के आगे हार जाते हैं,
जेब सबसे अधिक वही भरते
जो बहसों में ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं,
हिन्दी में ईमानदारी और नैतिकता पाठ
कभी न पढ़ायें,
भ्रष्टाचार जैसे विषय पर
हमारे बच्चों का खून अभी से न जलाये
बड़े होकर वैसे भी भ्रष्टाचार पर बहस करेंगे,
कहीं देखेंगे फिल्म, कहीं कविता कहेंगे,
इससे अच्छा तो शीला की जवानी को इंगित करती,
बदनाम मुन्नी के नाम में प्रतिष्ठा भरती,
कविता इनको लिखना सिखायें,
संभव है कुछ बालक
भविष्य में हास्य कवि होकर आपका नाम
गुरु के रूप में रौशन कर दिखायें।’’
————
समाज सेवक को धनपति ने
अपनी शराब पार्टी में बुलाकर
अकेले में कहा
‘‘यार, अपनी कमाई बहुत हो रही है,
पर मजा नहीं आ रहा है,
लोगों के कल्याण के नाम पर
तुम्हें चंदा देते हैं
गरीबों की भीड़ कम नहीं हुई
कभी लोग भड़क न उठें
यह डर सता रहा है,
इसलिये तुम भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाओ,
यहां जिंदा कौम रहती है यह
संदेश विदेशों में फैलाओ,
बस इतना ख्यान रखना
भ्रष्टाचार के खिलाफनारे लगाना,
किसी पर आरोप लगाकर
उसकी पहचान मत बताना,
तुम तो जानते हो
हमारा काम बिना रिश्वत
दिये बिना चलता नहीं,
टेबल के नीचे से न दो पैसे
तो किसी का पेन काम के लिये मचलता नहीं,
फिर कई बड़े लोग
तुम्हें जानते हैं,
उनका भी ख्याल रखना
तुमको वह अपना सबसे बड़ा दलाल मानते हैं
इसलिये
हवा में भाषणबाजी कर
अपना अभियान चलाना,
हमें भी है विदेश में
अपने देश की जिंदा पहचान बताना,
अब तुम रकम बताओ,
अपना चेक ले जाओ।
समाज सेवक ने चेक की रकम देखी
फिर वापस करते हुए कहा
‘यह क्या रकम भरते हो,
लड़ा रहे हो उस भ्रष्टाचार नाम के शेर से
जिसका पालन तुम ही करते हो,
पहले से कम से कम पांच गुना
रकम वाला चेक लिखो,
कम से कम हमारे सामने तो
ईमानदार दिखो,
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हुए
जब मैदान में आयेंगे,
भले किसी का नाम लें
पर हमारे कई प्रायोजक
डरकर साथ छोड़ जायेंगे,
बाल कल्याण और स्त्री उद्धार वाले हमारे धंधे
सब बंद हो जायेंगे,
भ्रष्टाचार विरोधी होकर
हमारी कमाई के दायरे तंग हो जायेंगे,
बंद हो जायेगा
शराब और जुआ खानों पर जाना,
बंद हो जायेगा वहां का नजराना,
जब चारों तरफ मचेगा कोहराम,
तुम्हारा बढ़ जायेगा दो नंबर का काम,
इसलिये हमारा चंदा बढ़ाओ,
वरना भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
हम कतई न उलझाओ।’’
————
26/12/2011 – 10:02 पूर्वाह्न
Categories: हिंदी
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जहान चला रहा है सर्वशक्तिमान
मगर कुछ लोगों गलतफहमी है कि
वह उसके रास्ते चांद और सूरज से
सजा सकते हैं,
जिस पर लोग चलते हुए ऐश करेंगे,
बस यूं ही हम फरिश्तों की तरह
अपना नाम इतिहास में भरेंगे।
कहें दीपक बापू
किसी को समझाना मुश्किल है
खुशफहमियों में जिंदा रहने की आदत हो गयी
वह दूर हो गयी तो लाश बन जायेंगे
बहानों में जीने की आदत हैं इंसानों को
वहम तोड़ने का फायदा नहीं
सांसों के कम होने से नहीं
ख्वाब टूटने से ज्यादा लोग मरेंगे।
25/12/2011 – 5:55 अपराह्न
Categories: हिंदी
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हमने पूछा था पता
अपना दिल बहलाने का
उन्होंने शोर की महफिल का रास्ता बता दिया
हम गये थे तसल्ली पाने
लौटे साथ यह दर्द लेकर
कि लोगों ने खौफनाक हादसों
दिल बहलाने के लिये
अपने लफ्जों में सजा लिया।
———
अपने साथ हादसे
हम यूं ही छिपाये जाते हैं,
मालुम है कि कोई हमदर्द नहीं बनेगा
लोगों का शौक हो गया
अपने दर्द का इलाज
दूसरों की तकलीफ मे
दिल बहलाने के लिये ढूंढने जाते हैं।
15/12/2011 – 10:03 अपराह्न
Categories: हिंदी
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त्यौहार के दिन
फंदेबाज घर आया और बोला
‘‘दीपक बापू आज पहली बार दे रहा हूं सात्विक बधाई,
यह पहला मौका है है
जब मैने किसी खास अवसर पर
अपने मुंह से शराब की एक बूंद भी नहीं लगाई।
सोच रहा हूं पीना छोड़ दूं
वरना कहीं कोई पीट पीटकर कर न दे धराशायी,
भ्रष्टाचार के विरोधी अन्ना साहेब ने
शराबियों को हंटर से पीटने की आवाज जो लगाई।
आप तो जानते हैं,
लोग उनको बहुत मानते हैं,
उनके दर्शन में भले लगता नहीं दम है,
पर नारों का वजन नहीं कम है,
आपने पीना छोड़ दिया है,
इसलिये अपने को उनकी मुहिम से जोड़ दिया है,
इसलिये आप भी शराब के खिलाफ लिखो,
उनके कट्टर समर्थक की तरह दिखो,
अभी तक आप रहे फ्लाप हो
संभव हिट हो जाओ
करने लगें लोग आपकी बड़ाई।’’
सुनकर चुप रहे पहले
फिर गला खंखारकर बोले
‘‘दूसरों के मसौदे देखकर अपनी राह बदलें
यह आमजन को बहुत भाता है,
अन्ना की बात सुनकर
शराब छोड़ने के नारे बहुत लोग लगायेंगे
पर देखेंगे कौन इस पर चल पाता है,
हम जानते हैं
अन्ना 74 बरस में भी स्वस्थ हैं
क्योंकि अपनी जिंदगी में शराब नहीं पिये,
अमेरिका में उनसे भी बड़ी उम्र के लोग जिंदा हैं
जिन्होंने एक नहीं बहुत सारे पैग लिये,
बहुत बुरी चीज है शराब,
फिर भी लोग पीते साथ में खाते कबाब,
दुनियां का सच है
जिस बुराई को दबाने का प्रयास करो
बढ़ती जायेगी,
पहले फ्लाप हो रही
क्रिकेट खेलकर
अन्ना ने उसमें अपने प्रशंसकों लगाया
अब उनके मुख से निकली बात
शराब भी शायद वैसा ही प्रचार पायेगी,
हम ठहरे गीता साधक
बुराई से नफरत करते,
मगर बुरे आदमी में ज्ञान के सूत्र भरते,
अरे,
परमात्मा नहीं खत्म कर पाया
तामसी प्रवृत्ति के लोगों को,
भला क्या भगायेंगे अन्ना संसार से ऐसे रोगों को,
सारे संसार को ठीक करने का ठेका लेना
आत्ममुग्ध करने वाली चीज है,
समझ लो इस भाव में ही
अज्ञान से उपजे अहंकार के बीज हैं,
इससे तो अपने बाबा रामदेव का दर्शन सही है,
कपाल भाति करे जो शख्स स्वस्थ वही है,
हमारा मानना है कि श्रीमद्भागवत गीता के साथ
पतंजलि योग में भरा है ज्ञान और विज्ञान,
देश भूल गया पर
बाकी विश्व रहा है मान,
फिर कौन अपने को बाज़ार से
कभी चंदा मिला है,
खुद नहीं पीते
मगर नहीं पीने वालों से गिला,
समझें जो लोग
अपनी वाणी से करना
भूल जाते निंदा और बड़ाई
हम जैसे लोगों के लिये नारे लगाना संभव नहीं है
कर सकते हैं आध्यात्मिक चिंत्तन
फिर जहां मौका मिला वहीं हास्य कविता बरसाई।
24/11/2011 – 9:57 अपराह्न
Categories: हिंदी
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भारत एक विशाल देश है और इसमें परिवर्तन एक दिन या वर्ष में नहीं आ सकता। ऐसे में परिवर्तन के दौर में तमाम संघर्ष होते हैं। एक बात दूसरी भी है कि संसार में आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक परिवर्तन प्रकृति का नियम है और भारतीय अध्यात्मिक ज्ञानी इस बात को जानते हैं कि यथास्थितियोंवादी अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं। ऐसे में परिवर्तन करने वाले तत्वों से उनका विरोध हिंसा की हद तक चल जाता है। भारत में समाजसेवी श्री अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने व्यापक रूप धारण कर लिया है ऐसे में जिन तत्वों के हित प्रभावित हैं वह प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष रूप से उनके विरोधी हैं। अन्ना के व्यक्तित्व में कोई छिद्र नहीं दिखता पर उनके अनेक सहयोगी पेशेवर रूप से समाज सेवा में लगे रहे हैं, इसलिये उनके आर्थिक और राजनीतिक रिश्ते विवादास्पद हैं। यही कारण है कि यथास्थितियों के लिये वह ऐसे आसन लक्ष्य हैं जिससे अन्ना साहब के आंदोलन को कमजोर कर भारतीय जनमानस में उसकी छवि को खराब किया जा सकता है।
अन्ना के एक सहयोगी अरविंद केजरीवाल की तरफ जूता फैंकने की घटना एक मामूली बात है पर उसका प्रचार इस बात को दर्शाता है कि कहीं न कहीं गड़बड़ है। वैसे देखा जाये तो अरविंद केजरीवाल ने कोई ऐसा बयान नहीं दिया है जिससे समग्र देश उत्तेजित हो। जिस तरह उनके एक सहयोगी ने कश्मीर में आत्मनिर्णय का समर्थन कर दिया था इस कारण कुछ युवकों ने उनके साथ मारपीट कर दी थी। उस सहयोगी और अरविंद केजरीवाल पर हमले में बस यही एक समानता है कि प्रचार माध्यमों को दोनों समाचारों पर बहस चलाकर अपने विज्ञापनों के लिये दर्शक जुटाने का अवसर मिल गया।
यह तो पता नहीं कि अरविंद केजरीवाल पर हमला किसी बड़ी योजना का हिस्सा है या नहीं पर इतना तय है कि अन्ना के जिस सहयोगी पर पहले हमला हुआ था वह एक नियोजित हमला लग रहा था। स्थिति यह है कि लोग उस हमले को भूलकर अब जम्मू कश्मीर पर उनके बयान को लेकर नाराजगी जता रहे हैं। वैसे इस तरह के हमले एकदम बचकाने हैं क्योंकि इससे हमलावर तथा शिकार दोनों को समान प्रचार मिलता है-यह अलग बात है कि हमलावर खलनायक तो शिकार नायक हो जाता है।
सच बात तो यह है कि हिंसा कभी परिणाममूलक नहीं होती। इतिहास इस बात का गवाह है। इसके बावजूद आज के लोकतांत्रिक समाज में कुछ लोग आत्मप्रचार के लिये हमले करते है तो कुछ लोग अपने ऊपर हुए ऐसे हमलों का आत्मप्रचार के लिये भी करते हैं। श्रीअरविंद केजरीवाल ने अभी तक ऐसा कोई बयान नहीं दिया है जिससे भारतीय जनमानस उद्वेलित हो। यह अलग बात है कि जिन व्यक्तियों या समूहों पर अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से प्रहार करते हैं वह उनसे रुष्ट हो जाता है। हालांकि ऐसे व्यक्ति या समूह प्रतिप्रचार के माध्यम से उनका सामना करने की क्षमता रखते हैं इसलिये उनको ऐसे किसी आक्रमण कराने की आवश्यकता नहीं है पर अगर कुछ सामान्य लोगों को आदत होती है कि वह ऐसी हरकतें कर प्रचार पाना चाहते हैं। जिसने अरविंद केजरीवाल पर जूता या चप्पल फैंकी वह अपने कृत्य के समर्थन में ऐसी कोई बात नहीं कह पाया जिससे लगे कि श्री केजरीवाल के किसी बयान या कृत्य से प्रेरित होकर उसने ऐसा किया। वह तो केवल यही कह रहा था कि केजरीवाल जनता को बरगला रहे हैं। कैसे, यह उसने नहीं बताया। दूसरे उसने आगे यह भी कहा कि वह तो उनकी इज्जत करता है। मतलब निहायत सिरफिरी बात कहकर उसने ऐसी किसी संभावना को समाप्त ही कर दिया कि उसे कोई समर्थन करने वाला मिल जाये। वैसे इस तरह की घटना कोई समर्थन नहीं करता पर जो लोग संवदेनशील विषयों को लेकर सक्रिय रहते हैं वह कभी ऐसी घटनओं को उचित ठहराते नजर आते हैं। इस प्रकरण में ऐसे किसी संभावना को हमलावर ने स्वतः ही समाप्त किया।
कश्मीर पर विवादास्पद बयान देकर पहले मारपीट का शिकार हो चुके अपने सहयोगी का साथ अन्ना ने एक सीमा तक दिया था पर अरविंद केजरीवाल के साथ बड़ी मजबूती से खड़े नजर आये। अगर सीधी बात कहें तो इस चप्पल फैंकने की घटना ने अरविंद केजरीवाल का कद बड़ा दिया है। अब वह अन्ना की टीम में अन्ना के बाद दूसरे नंबर पर आ गये हैं। उनको तो अन्ना का सेनापति तक कहा जा रहा है। इसके विपरीत कश्मीर पर विवादास्पद बयान देने वाले सहयोगी को तो टीम से बाहर करने की बात तक कही जा रही है। जहां उनके साथ हुई मारपीट ने उनक ाकद गिराया वहीं अरविंद केजरीवाल की पर चप्पल फैंकने की घटना ने लोकप्रियता बढ़ाई। इसका सीधा मतलब यह है कि जनमानस का ख्याल रखकर अपने अभियान चलाने वाले लोगों को समर्थन मिलता है। हमारा मानना है कि अगर किसी मसले पर अन्ना साहब या उनकी टीम से असहमति हो तो उसका तर्क से सामना करना चाहिए। हालांकि इस तरह की घटनाओं को हम फिक्सिंग के तौर से भी देखते हैं पर इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि हमारी बात सौ फीसदी सही है। हम अभी तक अन्ना टीम के आंदोलन के सकारात्मक परिणामों का इंतजार कर रहे हैं। इसकी कोई जल्दी नहीं है पर इतना तय है कि अगर यह आंदोलन कोई परिणाम नहीं दे सका तो भारी निराशा की बात होगी।
जिन लोगों ने यह हमले किये उनका क्या होगा, यह तो पता नहीं पर इतना तय है कि इनकी वजह से अन्ना हजारे के निवास वाले मंदिर के बाहर मेटर्ल डिटेक्टर लगा दिये गये हैं उनकी तगड़ी सुरक्षा की जा रही है। तय बात है कि इस पर पैसा खर्च होगा इसका फायदा किसे होगा यह न हमें जानना है न कोई बताये। जब कहीं खतरे का प्रचार होता है तो सुरक्षा उपकरणों की मांग बढ़ती हैं। ऐसे मे लगता है कि सुरक्षा उपकरण बेचने वाले कहीं खतरे का प्रायोजन तो नहीं करते हैं? अन्ना हजारे जी का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जहां अनेक लोगों के लिये चिंता का विषय हो सकता है वहीं भारतीय जनमानस के लिये अभी जिज्ञासा का विषय है। सच बात तो यह है कि अंततः अन्ना की टीम प्रत्यक्ष रूप से राजनीति की तरफ आयेगी-यह बात हम दूसरी बार कह रहे हैं। यह पता नहीं कि पर्दे के पीछे कौन खेल रहा है, पर लगता है कि भारत में राजनीतिक परिदृश्य बदलने की कोई योजना चल रही है। जिस तरह देश में बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन चल रहे हैं उससे तो फिलहाल यही लगता है कि आगामी कुछ वर्षों में राजनीतिक परिदृश्य बदल सकता है। इन दोनों की लोकप्रियता इतनी है कि यह प्रत्यक्ष राजनीति में भाग लिये बिना उसे प्रभावित कर कर सकते हैं। ऐसे मे संभव है कि भविष्य में अपने अनुयायियों को प्रत्यक्ष राजनीति में उतार सकते हैं। भारतीय जनमानस उनका कितना साथ देगा यह बात अभी कहना मुश्किल है पर इतना तय है कि तब उनको वर्तमान राजनीतिक समूहों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में अनेक तरह के नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिलेंगे। कुछ प्रायोजित तो कुछ फिक्स भी होंगे। शायद इसलिये अन्ना हजारे ने अपने समर्थकों से कहा है कि जब समाज के लिये काम करते हैं तो अपमान झेलने के लिये भी तैयार रहना चाहिए। अन्ना हजारे के सबसे निकटतम होने के कारण शायद अरविंद केजरीवाल भी प्रकाशमान हो गये इसलिये उन पर चप्पल फैंकी गयी पर वह उनको फूल की तरह लगी। उन्होंने हमलावर को माफ कर यह साबित किया कि भविष्य में वह एक बड़े कदावर व्यक्ति बनने वाले हैं। हम जैसे आम लेखक और नागरिक तो अच्छी संभावनाओं के लिये उनकी तरफ दृष्टिपात करते ही है और शायद अब पूरा विश्व उनकी तरफ देखने लगेगा। साथ ही उनको यह भी देखना होगा कि उनको अभी लंबा रास्ता तय करना है और भारतीय जनमानस में अपनी छवि बनाये रखने के लिये उनको हमेशा ही इसी तरह आत्मनिंयत्रित रहना होगा।
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19/10/2011 – 9:55 अपराह्न
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आज सारे देश में दशहरा पर्व मनाया जा रहा है। भगवान श्रीराम की युद्ध में लंकापति रावण पर विजय के रूप के समरण के रूप में मनाये जाने वाले इस दशहरा पर्व से उल्लास से मनाया जाने परंपरा बरसो से इस देश में रही है पर फटाखे जलाकर, घर के सामान पूजकर तथा मिठाई खाकर इस दिन को बेकार कर दिया जाता है जबकि इस विषय पर अध्यात्मिक चर्चा कर मन और विचारों में शुद्धता लाने कप प्रयास किया जाना चाहिए। मूल बात यह है कि ऐसे पर्व आत्ममंथन और सामाजिक चिंतन के लिये उपयोग किये जाने चाहिए। यह अलग बात है कि अनेक कथित धार्मिक विशेषज्ञ इस दिन अपने अनुयायियों को मन का रावण मारने तथा आत्मा रूपी सीता की रक्षा करने का उपदेश भर देते हैं। वैसे देखा जाये तो इसे पर्व का उपयोग बाज़ार अच्छी तरह उपयोग करता है। प्रचार माध्यम जहां तक हो सके उपभोग की वस्तुओं के उपयोग के लिये प्रेरित करते हुए राम राम किये जाते हैं। बीची बीच में रावण की कलुषित गतिविधियों की चर्चा भी होती है। ऐसे में हमारे मूल अध्यात्मिक दर्शन की तरफ किसी का ध्यान जाता ही नहीं।
कुछ लोगों का मानना है कि राम एक मिथक हैं और श्रीबाल्मीकी जी ने उनको इस तरह प्रस्तुत किया है कि वह सत्य स्वरूप प्रतीत होते हैं। इस दृष्टि से श्रीसीता और रावण सहित रामायण के अनेक पात्रों को औपन्यासिक मानने वाले लोग इस बात को नहीं जानते कि इस संसार में सात्विक, राजस तथा तामसी प्रवृत्तियों की उपस्थिति सदैव रही है और हर काल में अच्छे और बुरे लोगों की उपस्थिति रहनी है। ऐसे में अगर श्री राम और रावण को मिथक मानना गलत है। आधुनिक इतिहास में अनेक ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने महान चरित्र से इतिहास में नाम दर्ज कराया। हमारे देश में महात्मा गांधी ने तो अपनी सादगी, उच्च विचार तथा सात्विक कर्मों से ऐसा इतिहास रचा कि अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक अलबर्ठ आइंस्टीन ने उनके बारे कहा था कि हजारों वर्ष बाद कौन इस बात पर यकीन करेगा कि इस दुनियां में ऐसा भी कोई महान आदमी हुआ होगा। यही स्थिति भगवान श्रीराम के बारे कही जा सकती है कि त्याग, संघर्ष तथा आत्मविश्वास के साथ ही ज्ञान का ऐसा विशाल भंडार रखने वाला व्यक्तित्व इस संसार में किसी के पास रहा होगा इस बात पर यकीन करना कठिन है। मगर यह सत्य मानना होगा कि ऐसे अध्यात्मिक पुरुष कभी मिथक नहीं होते क्योंकि यह संभव नहीं है कि कल्पनाओं को इतनी दृढ़ता से विस्तार दिया जाये कि वह सत्य लगने लगें।
बाल्मीकि रामायण में भगवान श्रीराम, श्रीसीता जी, श्रीलक्ष्मण जी, श्रीभरत जी और श्रीशत्रुध्न का जो वर्णन किया गया है हम उनका अध्ययन करें तो पायेंगे कि मनुष्य देह उन प्रकृतियों पर ध्यान जाता है जो उसे नायकत्व का दर्जा दिलाती हैं तो कैकयी और रावण के आचरण से खलनायकत्व का आभास होता है। भगवान श्रीराम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता हैं पर उन्होंने कहीं ऐसा दावा नहीं किया। उसी तरह उनके सेवक हनुमान को भी अवतारी बताते हुए कहानियां हैं पर वह कभी स्वयं उसकी पुष्टि नहीं करते। कुछ लोग मानते हैं कि बाल्मीकी रामायण की रचना के बाद कालांतार में उसे बदल भी गया है जबकि यह मूल रचना भगवान श्रीराम के जन्म तथा राज्याभिषेक तक ही लिखी गयी थी। उत्तर रामायण के पृष्ठ बाद में लाये गये हैं। इसका कारण यह है कि महर्षि बाल्मीकी स्वयं निरंकार राम के भक्त थे और उन्होंने समाज में उनको साकार रूप से स्थापित करने के प्रयास से ही यह रचना की थी इसलिये वह उसमें उत्तर रामायण के भाग की रचना नहीं कर सकते थे जिनके उनके चरित्र के विरोधाभास के दर्शन होते हैं। अगर भगवान श्रीराम के जन्म और राज्यभिषेक तक ही उनकी रचना को मूल माना जाये तो यकीनन सभी पात्रों के अवतारी होने की पुष्टि नहीं होती। कहा जाता है कि भगवान श्रीराम अवतार थे पर उन्होंने अपने अवतारी होने का दावा इसलिये किया ताकि सामान्य मनुष्यों के रूप में उनकी लीला के अलौकिक अर्थ न लिये जायें। ऐसे में श्रीमद्भागवत गीता का स्मरण होता है भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘ मैं धनुर्धरों मे राम हूं’। भगवान श्रीराम की तरह श्रीकृष्ण को भी भगवान श्री विष्णु नारायण का अवतार माना जाता है। इस तरह की चर्चा करने का मतलब यह है कि हम जब अपने अध्यात्मिक नायकों में असामान्य पुरुष की जगह सामान्य रूप ढूंढना चाहिए ताकि हम अपने मन को दृढ़ता प्रदान कर सकें। भगवान श्रीराम को आचरण ऐसा नहीं है कि सामान्य मनुष्य धारण नहीं कर सके। बात केवल यह है कि उसके लिये संकल्प होना चाहिए। त्याग, समाज सेवा तथा संघर्ष की प्रवृत्ति का अनुसरण करें।
इस पावन पर्व पर साथी ब्लॉग लेखकों तथा पाठकों को बधाई। साथ ही यह कामना है कि सभी अपने अंदर मानसिक शुद्धता लाने के साथ ही अपने सद्विचारों पर दृढ़तापूर्वक चलने का व्रत लें।
दीपक भारतदीप
06/10/2011 – 3:29 अपराह्न
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आशिक ज्यादा घूम रहे सड़कों पर
माशुकाओं का बढ़ता जा रहा है अकाल
शहरों में कोहराम मचा है।
कन्या भ्रुण हत्याओं के नतीजे
अब यूं सामने आने लगे
कार वाले कर रहे इश्क की सवारी
आसमान में उम्मीद के लिये ताक रहा
वह आशिक जो खाली बचा है।
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चार आशिक एक माशुका के पीछे
घूमते नजर आते हैं,
किसके प्रेम पत्र का जवाब देगी
इस इंतजार में बरसों इंतजार करते हैं
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एक जवान लड़की घर से निकलेगी
कितने लड़के पीछे लग जायेंगे
पता नहीं,
कन्या भ्रुण हत्याओं के चलते
ऐसे दृश्य नज़र आयेंगे
जवान उम्र की इसमें कोई खता नहीं।
02/10/2011 – 3:36 अपराह्न
Categories: हिंदी
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हिन्दी बोले बिना कान नहीं चलता,
अंग्रेजी में न बोलें तो दिल जलता।
आधी हिन्दी आधी अंग्रेजी बोलकर
हर कोई युवा मन खुद ही बहलता।
भाषा के मिक्चर से गूंगा बना ज़माना
देख कर हमारा दिल हर रोज दहलता।
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अखबार आज का ही है
खबरें ऐसा लगता है पहले भी पढ़ी हैं
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।
ट्रेक्टर की ट्रक से
या स्कूटर की बस से भिड़ंत
कुछ जिंदगियों का हुआ अंत
यह कल भी पढ़ा था
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।
भाई ने भाई ने
पुत्र ने पिता को
जीजा ने साले को
कहीं मार दिया
ऐसी खबरें भी पिछले दिनों पढ़ चुके
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।
कहीं सोना तो
कहीं रुपया
कहीं वाहन लुटा
लगता है पहले भी कहीं पढ़ा है
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।
रंगे हाथ भ्रष्टाचार करते पकड़े गये
कुछ बाइज्जत बरी हो गये
कुछ की जांच जारी है
पहले भी ऐसी खबरें पढ़ी
आज भी पढ़ रहे हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।
अखबार रोज आता है
तारीख बदली है
पर तय खबरें रोज दिखती हैं
ऐसा लगता है पहले भी भी पढ़ी हैं
इसलिये कोई ताज़ा खबर नहीं लगती।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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